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जब फ़ारस का कांच,रेगिस्तान की रेत और क़बीलों का हुनर बना दुनिया का सबसे बड़ा फैशन, कच्छ की शीशा-कारी का अनकहा सफ़र

वो चमचमाता शीशा जो फेस्टिवल की रोशनी में झिलमिलाता है, कोई आम फैशन स्टेटमेंट नहीं है। ये तो सदियों पुरानी कहानी है, एक क़बायली शिनाख़्ती कार्ड है, और सच कहूं तो कच्छ की सूखी धरती से निकला जादू (Kutch’s Mirror work) है। यहां के लोकल लोग इसे अभला भरत या शीशा कढ़ाई कहते हैं। और इसका इतिहास जितना पुराना है, उतना ही रोमांचक भी।

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सफ़र शुरू हुआ फ़ारस से

आप सोचेंगे कि ये कला गुजरात में ही जन्मी होगी। मगर नहीं, इसकी जड़ें 13वीं सदी के फ़ारस (ईरान) तक जाती हैं। यहां से ये कारवां (Persian mirror work) के साथ सरहदें पार करती हुई मुग़ल बादशाहों के दरबार तक पहुंची। बादशाहों ने इस शानदार तकनीक को अपने शाही कपड़ों में ढाल लिया।

17वीं सदी में बलूचिस्तान से खानाबदोश क़बीले, जैसे जाट, कच्छ आए। वे अपनी सूई, धागा और अपनी विरासत भी साथ लाए। दिलचस्प बात ये है कि शुरू में कारीगर कांच नहीं, बल्कि जो मिला, उसे इस्तेमाल करते थे। चमकते बीटल के पंख, माइका, पुराने सिक्के और पॉलिश की हुई धातु। आज मशीन से कटा कांच आता है, मगर हाथ से बुनने की वही मेहनत और जज़्बा आज भी ज़िंदा है।

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क़बायली भाषा जो कपड़ों पर लिखी है

सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि ये  कढ़ाई सिर्फ़ सजावट नहीं, एक विज़ुअल कोड है। जानकार नज़र के लिए, एक औरत की भरत-कारी उसकी पूरी पहचान बताती है। उसका गोत्र, इतिहास और समुदाय।

अहीर समुदाय

ये किसान रहे हैं, इसलिए इनकी कढ़ाई थास्सा (उभरी हुई) होती है। इसमें खेती की ज़िंदगी झलकती है। बड़े-बड़े फूल, मोर, और लाल-हरे-पीले रंगों की बहार।

राबारी समुदाय

रेगिस्तानी खानाबदोशों की ये कला हिजरत के रास्ते दिखाती है। भारी टांके और बड़े-बड़े आईने। ताकि धूप में दूर से भी पहचान हो। इनके डिज़ाइन में बिच्छू भी बनते हैं। जो बुरी नज़र से बचाने का तावीज़ है।

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जाट औरतें

इनकी कढ़ाई जियोमेट्रिक होती है। बिना कोई खाका बनाए, सीधे कपड़े पर क्रॉस-स्टिच से मोज़ेक जैसा नमूना बन जाता है। कांच के टुकड़े बिल्कुल बीच में क़ैद होते हैं।

नेरन और नोडे

नेरन (आंख) स्टाइल में छोटी-छोटी आंखों जैसी टांकें लेस जैसी जाली बनाती हैं। वहीं नोडे समुदाय 3D उभार वाले बड़े गोलाकार डिज़ाइन बनाता है।

कभी सोचा है बिना छेद वाले शीशे को कपड़े पर कैसे सीते हैं?

राज़ है टेंशन। असली कारीगर धागों का ऐसा पिंजरा बनाते हैं जो शीशे को कपड़े से कसकर बाँध देता है। कभी वे सितारा-टांका (स्टार स्टिच) लगाते हैं जो सीधे शीशे के ऊपर से क्रॉस हो, या Triangular चौखट जो शीशे के किनारों को पकड़ ले।

शीशा जमने के बाद आसपास सांकड़ी (चेन स्टिच), वाणो (हेरिंगबोन), या बखियो (छाया-टांका) से सजावट होती है।

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बुरी नज़र से बचने का कवच

पहले ये कृतिया बहुत निजी होती थीं। एक औरत सालों ओढ़नी और तोरण (दरवाज़े की सजावट) बुनती थी, अपने दहेज़ के लिए और आईनों का एक पाक मतलब था-

रेगिस्तानी क़बीले मानते थे कि शीशा बुरी नज़र को वापस लौटा देता है और बुरी आत्माओं को फंसा लेता है, पहनने वाले को नुक़सान नहीं पहुंचने देता।

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जब शीशा मुंबई से पैरिस पहुंचा

आज ये प्राचीन कला ग्लोबल ट्रेंड बन चुकी है। हाई-फैशन शो से लेकर बाज़ार की रैक तक। हर जगह शीशा-कारी दिखती है। बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक, डिज़ाइनर इस कला को अपने कलेक्शन में जगह देते हैं।

मगर यहां एक बड़ी समस्या भी है-

असली शीशा-कारी पर संकट है। क्योंकि कारख़ाने में बने नकली कपड़ों में शीशे को चिपका देते हैं। सस्ते गोंद वाले इन कपड़ों में न वो मेहनत है, न वो इतिहास, न वो जादू।

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सिर्फ़ कपड़ा नहीं, हज़ारों सालों का इतिहास

जब भी कोई शीशा-कारी वाला कपड़ा हाथ लगे, धागों को महसूस करो। अगर शीशा हाथ से बुने गए पिंजरे में क़ैद है, तो समझ लो—तुम सिर्फ़ कपड़ा नहीं, हज़ारों सालों का इतिहास पकड़े हो।

ये कच्छ की मिट्टी की महक है, फ़ारस के कारवां की आवाज़ है, रेगिस्तान में भटकते क़बीलों की याद है और एक औरत का वो संघर्ष और सपना है जिसने अपनी सूई से न सिर्फ़ कपड़ा, बल्कि अपनी पूरी पहचान बुनी।

‘शीशा है तो टूटेगा ज़रूर,
मगर उसकी कढ़ाई कभी नहीं।
‘

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