हिंदुस्तान की अदबी और फ़िल्मी दुनिया में अगर किसी एक नाम को “लफ़्ज़ों का जादूगर” कहा जाए, तो वो हैं गुलज़ार साहब। एक ऐसी शख़्सियत, जिसने अपनी क़लम से सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं लिखे, बल्कि एहसासों को शक्ल दी, जज़्बात को ज़ुबान दी और ख़ामोशियों को भी बोलना सिखा दिया।
भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आंखों में
गुलज़ार
उजाला हो तो हम आंखें झपकते रहते हैं
एक ख़ामोश बचपन और बोलती रूह की शुरूआत
गुलज़ार साहब का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा था। 18 अगस्त 1934 को दीना (झेलम) की सरज़मीं पर उनकी पैदाइश हुई। बचपन आसान नहीं था मां का साया सर से बहुत जल्दी उठ गया और सौतेली मां की बेरुख़ी ने उनके दिल में एक ख़ामोशी भर दी।
वो ज़्यादातर वक़्त अपने वालिद की दुकान पर गुज़ारते, जहां दुनिया के शोर से दूर, उनके अंदर एक ख़ामोश शायर पल रहा था। किताबों से ज़्यादा उनका रिश्ता एहसासों से था। पढ़ाई में दिल नहीं लगा, मगर अदब से मोहब्बत हो गई।
बचपन से ही उन्हें Rabindranath Tagore और Sharat Chandra Chattopadhyay की तहरीरों से इश्क़ था। यही इश्क़ आगे चलकर उनकी पहचान बना।
शायरी में बंटवारे का दर्द
1947 का बंटवारा सिर्फ़ सरहदों का नहीं, दिलों का भी था। गुलज़ार का ख़ानदान भी इस दर्द से गुज़रा। अमृतसर से होते हुए वो दिल्ली के सब्ज़ी मंडी इलाक़े में आ बसे।
ज़िंदगी यूंं हुई बसर तन्हा
गुलज़ार
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा
घर के हालात ने उन्हें मजबूर किया कि वो पेट्रोल पंप पर काम करें। मगर दिल में एक चिराग़ जलता रहा—शायर बनने का।
मुंबई- ख़्वाबों की ताबीर
क़िस्मत उन्हें मुंबई ले आई—जहां हर शख़्स अपने ख़्वाबों का पीछा करता है। यहां उन्होंने अदबी महफ़िलों में जाना शुरू किया, “प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन” से जुड़े और अपने दायरे को बढ़ाया।
इसी दौरान उनकी मुलाक़ात शैलेंद्र से हुई, और फिर एक दिन उनकी क़िस्मत ने दरवाज़ा खटखटाया। मशहूर फ़िल्मकार Bimal Roy की फ़िल्म Bandini के लिए उन्हें गीत लिखने का मौक़ा मिला।
उनका पहला गीत—“मोरा गोरा अंग लइ ले…”
ऐसा चला कि हर दिल पर छा गया। यहीं से एक नए सफ़र की शुरुआत हुई।
फ़िल्मी दुनिया में उनकी मुलाक़ात हुई Meena Kumari से। ये रिश्ता लफ़्ज़ों से ज़्यादा ख़ामोशियों का था।
जब मीना कुमारी बीमार थीं और रमज़ान में रोज़ा नहीं रख पा रही थीं, तो गुलज़ार ने उनके बदले रोज़ा रखा। ये मोहब्बत की वो सूरत थी, जो कम ही देखने को मिलती है।
मीना कुमारी ने अपनी डायरी और ग़ज़लें गुलज़ार को सौंप दीं—जिन्हें बाद में उन्होंने दुनिया के सामने पेश किया।
ज़िंदगी का दूसरा सफ़र
1973 में उन्होंने Raakhee से शादी की। उनकी एक बेटी हुई—Meghna Gulzar, जो आज अपने फ़न में कामयाब हैं।
हालांकि वक़्त के साथ दोनों अलग हो गए, मगर रिश्ता कभी टूटा नहीं। ये भी गुलज़ार की शख़्सियत का एक अलग रंग है।
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
गुलज़ार
वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता
गुलज़ार साहब ने फ़िल्मों में भी अपने अल्फ़ाज़ का जादू दिखाया और अदब में भी। उनकी फ़िल्में सिर्फ़ कहानियां नहीं बल्कि एक एहसास थीं।
उनकी शायरी में सादगी है, मगर गहराई भी—जैसे कोई हल्की सी हवा, जो दिल को छू जाए।
एहतराम और अवॉर्ड्स
उनके फ़न को दुनिया ने सराहा— ऑस्कर, ग्रैमी, दादा साहेब फाल्के, पद्म भूषण, साहित्य अकादमी—ये सब उनके नाम हैं। मगर असली इनाम वो मोहब्बत है, जो लोगों के दिलों में उन्हें मिली।
गुलज़ार की शायरी में ज़िंदगी की सादगी और सच्चाई है—
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
गुलज़ार
आदत इसकी भी आदमी सी है
जब भी ये दिल उदास होता है
गुलज़ार
जाने कौन आस-पास होता है
गुलज़ार एक नाम नहीं, एक एहसास हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि, लफ़्ज़ सिर्फ़ लिखे नहीं जाते, उन्हें जिया जाता है।
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