अज़हर इक़बाल उर्दू अदब की दुनिया का एक ऐसा नाम, जो आज किसी तआरुफ़ का मोहताज नहीं। उनकी शायरी में वो नज़ाकत, एहसास और गहराई है जो सीधे दिल में उतर जाती है। चाहे मुशायरे का मंच हो या किसी अदबी महफ़िल का समां, अज़हर इक़बाल की मौजूदगी हर जगह एक ख़ास रौनक बिखेर देती है।
अज़हर इक़बाल का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना कस्बे से है। उन्होंने अपनी तालीम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हासिल की, जहां से उनके अदबी सफ़र को एक नई दिशा मिली। आज वह मेरठ में रहते हुए उर्दू शायरी और अदब की ख़िदमत में लगातार मशगूल हैं।
उनकी पहचान सिर्फ़ एक शायर के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन स्क्रिप्ट राइटर, एंकर और इंटरव्यूअर के रूप में भी है। अज़हर की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह हर उम्र के लोगों से जुड़ जाती है चाहे बुज़ुर्ग हों या नौजवान। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, जुदाई, तन्हाई और ज़िंदगी के तमाम जज़्बात बेहद ख़ूबसूरती से बयान होते हैं।
न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी
तअल्लुक़ात की पाबंदियां निभाते हुए
अज़हर इक़बाल कई बड़े मंचों जैसे जश्न-ए-रेख़्ता, जश्न-ए-बहार और शंकर शाद मुशायरा में अपनी शायरी पेश कर चुके हैं। उनके अंदाज़-ए-बयां में एक सादगी है, मगर वही सादगी श्रोताओं को अपना दीवाना बना देती है। वह सिर्फ़ ग़ज़ल तक ही महदूद नहीं हैं, बल्कि दूसरी शायरी की सूरतों में भी तजुर्बे करते रहते हैं।
2015 में उन्होंने “हरफ़कार फ़ाउंडेशन” की बुनियाद रखी, जिसका मक़सद उर्दू-हिंदी अदब, थिएटर, दास्तानगोई और फनून-ए-लतीफ़ा को बढ़ावा देना है। इस फ़ाउंडेशन के ज़रिए कई अहम अदबी पेशकशें लोगों तक पहुंचाई गई हैं, जो आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।
आज के इस दौर में, जब दुनिया एक अजीब सी ठहराव और बेचैनी से गुज़र रही है, ऐसे में शायरी और फ़न ही हैं जो इंसान को ज़िंदा और मुतहर्रिक रखते हैं। यही वजह है कि डिजिटल मंचों के ज़रिए शायर और श्रोता एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, महफ़िलें अब सिर्फ़ हॉल तक सीमित नहीं रहीं बल्कि ऑनलाइन भी सजने लगी हैं।
तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती
मैं राख होने लगा हूं दिए जलाते हुए
इसी सिलसिले में अज़हर इक़बाल भी अपनी शायरी के ज़रिए लोगों से रूबरू होते रहे हैं, जहां उनके अल्फ़ाज़ सीधे दिल में उतरते हैं और हर सुनने वाला खुद को उन एहसासात से जुड़ा हुआ महसूस करता है।
उनकी शायरी में एहसास की गहराई का अंदाज़ा खुद-ब-खुद हो जाता है.
“तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या
जुदा हुए हैं तो अहद-ए-वफ़ा निभाना क्या”
इस शेर में जुदाई का दर्द और बेबसी बेहद सादगी से बयान हुई है। वहीं उनकी एक और ग़ज़ल में मोहब्बत की शरारत और नज़ाकत कुछ यूं नज़र आती है.
“बात बनाओ बात बनाती अच्छी लगती हो
खाओ झूठी कसमें खाओ खाती अच्छी लगती हो”
अज़हर इक़बाल की शायरी की यही ख़ासियत है कि वो दिल की बात को बहुत आसान लफ़्ज़ों में कह देते हैं, मगर असर गहरा छोड़ते हैं। उनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि एहसासात की एक मुकम्मल दुनिया है।
कुल मिलाकर, अज़हर इक़बाल आज के दौर के उन चुनिंदा शायरों में शामिल हैं, जिन्होंने उर्दू अदब को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम किरदार निभाया है। उनकी शायरी आने वाले वक़्त में भी लोगों के दिलों में यूं ही गूंजती रहेगी।
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