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ज़ीशान साहिल: ख़ामोश लफ़्ज़ों का शायर,“वो दास्तान मुकम्मल करे तो…”

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो अपनी सादगी और गहराई से दिलों में बस जाते हैं। ज़ीशान साहिल भी ऐसी ही एक ख़ूबसूरत और नर्मदिल शख़्सियत थे, जिनकी शायरी में ख़ामोशी भी बोलती है और अल्फ़ाज़ भी एहसास बन जाते हैं।

ज़ीशान साहिल की पैदाइश 15 दिसंबर 1961 को हैदराबाद, सिंध में हुयी। उन्होंने अपने कलम से उर्दू शायरी को एक नया रंग दिया. ऐसा रंग जिसमें ज़्यादा बनावट नहीं, बल्कि सादगी, दर्द और सच्चाई की महक थी। वह मुख्य तौर पर नस्री नज़्म (prose poetry) लिखते थे, जो उस दौर में एक अलग और मॉर्डन अंदाज़ माना जाता था।

उनकी सबसे अहम किताब ‘सारी नज़्में’ है, जिसमें उनकी आठ अलग-अलग काव्य संग्रहों को एक ही जगह समेटा गया है। यह किताब उनकी पूरी शायरी की झलक पेश करती है जहां हर नज़्म एक छोटी सी दुनिया लगती है। इसके अलावा, उनका ग़ज़लों का संग्रह ‘वजह-ए-बेगानगी’ 2011 में प्रकाशित हुआ, जो उनके फ़न की एक और ख़ूबसूरत पहचान है।

ज़ीशान साहिल की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उनकी सादगी और संवेदनशीलता थी। वह भारी-भरकम अल्फ़ाज़ के बजाय आम ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातों में गहरी बात कह देते थे। उनकी नज़्मों में तन्हाई, यादें, मोहब्बत और ज़िंदगी की उलझनें बहुत ही ख़ामोशी से सामने आती हैं।


“खिड़की के रस्ते से लाया करता हूं
 मैं बाहर की दुनिया ख़ाली कमरे में।”

इस एक लाइन में ही उनका पूरा अंदाज़ नज़र आता है एक इंसान जो अपने अंदर की दुनिया को बाहर की दुनिया से जोड़ने की कोशिश करता है।

उनकी शायरी में ग़म भी है, लेकिन वह बोझ नहीं लगता, बल्कि एक एहसास बनकर दिल को छूता है। जैसे वह कहते हैं-

“किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को
ख़त्म कर देता है हर उम्मीद हर इम्कान को।”

मोहब्बत पर भी उनका अंदाज़ बहुत अलग था। वह इसे किसी बड़े दावे के साथ नहीं, बल्कि एक सुकून की तरह पेश करते हैं.

 “मैं ज़िंदगी के सभी ग़म भुलाए बैठा हूं
 तुम्हारे इश्क़ से कितनी मुझे सहूलत है।”

उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में यादों की एक हल्की सी परछाईं हमेशा रहती है। जैसे वो कहते हैं.

 “गुज़र गई है मगर रोज़ याद आती है
 वो एक शाम जिसे भूलने की हसरत है।”


यह एहसास हर उस इंसान से जुड़ता है जिसने कभी किसी लम्हे को खोया हो।

ज़ीशान साहिल का कलाम हमें यह भी बताता है कि इंसान अपने ग़मों के साथ कैसे जीता है और उनसे आगे कैसे बढ़ता है.

 “कोई आ के हमें ढूंडेगा तो खो जाएगा
 हम नए ग़म में पुराने से बहुत आगे हैं।”

12 अप्रैल 2008 को कराची में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनका लिखा हुआ आज भी ज़िंदा है। उनकी शायरी आज के दौर में भी उतनी ही ताज़ा और असरदार लगती है, क्योंकि वह इंसान के अंदर के जज़्बात को सच्चाई से बयान करती है।

जीशान साहिल सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक एहसास थे ऐसा एहसास जो ख़ामोशी में भी सुनाई देता है। उनकी शायरी हमें यह सिखाती है कि सादगी में भी गहराई हो सकती है, और कम अल्फ़ाज़ में भी पूरी दुनिया समाई जा सकती है।

ये भी पढ़ें: इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

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