हर साल पतंगबाज़ी के दौरान जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, तो हर तरफ जश्न का माहौल होता है। लेकिन इस रंगीन मंज़र के पीछे एक खामोश दर्द भी छिपा होता है वो दर्द उन बेगुनाह परिंदों का, जिनके पंख उन पतंग के धागों में फंसकर कट जाते हैं। उनकी उड़ान अधूरी रह जाती है, और कई बार उनकी ज़िंदगी भी।
लेकिन दिल्ली के वज़ीराबाद में रहने वाले दो भाई नदीम और सऊद ने इस दर्द को सिर्फ देखा ही नहीं, बल्कि इसे अपनी ज़िम्मेदारी बना लिया। आज Wildlife Rescue के ज़रिए वो हज़ारों पक्षियों की जान बचा रहे हैं। उनका मक़सद है उन परिंदों को फिर से उड़ने का हौसला देना, जो इंसानी लापरवाही की वजह से ज़ख्मी हो जाते हैं।
कैसे शुरू हुआ ये सफ़र?
सऊद बताते हैं कि उनका ये सफ़र किसी बड़े प्लान से नहीं, बल्कि एक छोटे से जज़्बे से शुरू हुआ था। साल 2000 से उन्होंने वाइल्ड लाइफ के लिए काम करना शुरू किया। उस वक्त न कोई बड़ी टीम थी, न कोई फंडिंग, बस एक दर्द और कुछ करने का इरादा था। साल 2003 में उन्होंने अपने घर की छत पर एक छोटा सा केज बनाकर पहला ज़ख्मी परिंदा रखा। उस परिंदे के पंख में फ्रैक्चर था।
उन्होंने एक वेटरनरी डॉक्टर को बुलाया और उसका इलाज करवाया। धीरे-धीरे उनका काम एक परिंदे से शुरू होकर कई परिंदों तक पहुंच गया। साल 2010 में उन्होंने अपने इस काम को एक पहचान दी और इसे बतौर Wildlife Rescue ऑर्गेनाइजेशन नाम से रजिस्टर किया। आज ये सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि एक मिशन बन चुका है।

बचपन की वो घटना जिसने सब बदल दिया
सऊद एक बचपन किस्सा बताते हैं कि 1990 के दशक में एक दिन उन्हें सड़क किनारे एक ज़ख्मी चील पड़ी हुई मिली। वो उसे उठाकर पास के एक बर्ड हॉस्पिटल ले गए, लेकिन वहां इलाज करने से मना कर दिया गया। कारण था वो एक मांसाहारी पक्षी था। इस बात का उन्हे काफी बुरा लगा। “क्या एक परिंदे की ज़िंदगी उसकी खाने की आदत से कम हो जाती है?” उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि वो परिंदों के लिए कुछ करेंगे, जिनके लिए कोई आगे नहीं आता।
कहां से आती हैं ये चीलें हर साल?
नदीम बताते हैं कि दिल्ली में ज़्यादातर दो तरह की चीलें पाई जाती हैं ब्लैक काइट और ब्लैक इयर्ड काइट। इनमें से ब्लैक काइट लोकल प्रजाति है, जिसे आम बोलचाल में ‘गोविंदा’ भी कहा जाता है। वहीं ब्लैक इयर्ड काइट, जिसे ‘लिनियाटस’ भी कहा जाता है, उसी की एक सब-प्रजाति है। दिलचस्प बात ये है कि इन परिंदों का सफ़र भी काफी लंबा होता है। सर्दियों के मौसम में ये भारत आती हैं और यहां कई इलाकों में वक्त गुजारती हैं।
जबकि गर्मियों में ये सेंट्रल एशिया के इलाकों जैसे साउदर्न रशिया, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और मंगोलिया की तरफ लौट जाती हैं, जहां ये ब्रीडिंग करती हैं। यानी, हर साल ये चीलें हजारों किलोमीटर का सफर तय कर हमारे आसमान की मेहमान बनती हैं।

पतंगबाज़ी जश्न या आफत?
पतंगबाज़ी हमारे देश की एक पुरानी रिवायत है, लेकिन आज के दौर में ये कई परिंदों के लिए आफत बन चुकी है। खास तौर पर 15 अगस्त के आसपास मांझे का इस्तेमाल बहुत बढ़ जाता है। ये मांझा इतना तेज़ होता है कि परिंदों के पंख और गर्दन तक काट देता है। सऊद बताते हैं कि सिर्फ अगस्त के महीने में उनके पास 300 से 350 तक ऐसे केस आते हैं, जिनमें परिंदे मांझे से बुरी तरह ज़ख्मी होते हैं।
ये सिर्फ परिंदों के लिए ही नहीं, बल्कि इंसानों के लिए भी ख़तरनाक है। कई बार बाइक सवारों और राहगीरों के गले तक कट जाते हैं। इन परिंदों को लोग अक्सर नज़रअंदाज कर देते हैं, लेकिन ये हमारे पर्यावरण के लिए बेहद ज़रूरी हैं। ये कूड़ा-करकट और सड़ी-गली चीजें खाकर माहौल को साफ रखते हैं और बीमारियों को फैलने से रोकते हैं। यानी ये सिर्फ परिंदे नहीं, बल्कि शहर के खामोश रखवाले हैं।
यहां काम करने वाले लोगों के लिए ये सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि एक जज़्बात है। Wildlife Rescue में काम करने वाले वालंटियर फैसल बताते हैं कि पहले जब वो किसी ज़ख्मी परिंदे को देखते थे, तो दिल दुखता था। लेकिन जब उन्होंने इस ऑर्गेनाइजेशन के साथ काम करना शुरू किया, तो वो हमदर्दी और गहरी हो गई। उनका मानना है कि पक्षियों की तक़लीफ सिर्फ़ वही समझ सकते है।
इलाज से लेकर फिर से उड़ान तक
रेस्क्यू करना सिर्फ़ पहला कदम होता है। असली सफ़र उसके बाद शुरू होता है। जब कोई ज़ख्मी परिंदा यहां लाया जाता है, तो सबसे पहले उसका इलाज किया जाता है। कई मामलों में सर्जरी करनी पड़ती है, ख़ासकर पंखों की। इसके बाद उनकी देखभाल की जाती है जब तक वो पूरी तरह से ठीक न हो जाएं। जब डॉक्टर और टीम को यकीन हो जाता है कि अब ये परिंदा उड़ सकता है, तभी उसे वापस खुले आसमान में छोड़ दिया जाता है। वो पल सबसे ख़ास होता है जब एक परिंदा फिर से अपने पंख फैलाकर उड़ता है।

पॉल्यूशन से जूझते बेबस परिंदे
Wildlife Rescue में काम करने वाले डॉ. जय प्रकाश पांडे बताते हैं कि वो करीब 2014 से उनके साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने DNN24 को बताया कि सिर्फ़ मांझा ही नहीं, बल्कि मौसम और पॉल्यूशन भी परिंदों के लिए ख़तरा बनते जा रहे हैं। सर्दियों और मानसून के दौरान पॉल्यूशन की वजह से परिंदों में सांस से जुड़ी बीमारियां बढ़ जाती हैं। उस समय क्या होता है? बर्ड्स में भी पॉल्यूशन का असर होता है। रेस्पिरेटरी निमोनिया के बहुत ज्यादा केसेस होते हैं।
उस समय जो यंग बर्ड होते हैं, स्पेशली जो हैचरी यंग बर्ड, उनको रेस्पिरेटरी इनफेक्शन बहुत ज्यादा होता है। मतलब जैसे उनको ब्रीथिंग में ट्रबल होना, नेजल डिस्चार्ज होना, इस तरह के केस आते थे। खासतौर पर छोटे बच्चे (यंग बर्ड्स) जल्दी बीमार पड़ते हैं। उन्हें सांस लेने में दिक्कत, नाक से पानी आना और कमजोरी जैसी समस्याएं होती हैं।
कानून, ज़िम्मेदारी और एक ख़्वाब
परिंदों का इलाज करना कितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है कानून का पालन करना। हर परिंदे को कब और कैसे छोड़ना है, ये सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक तय होता है। नदीम और सऊद का सपना है कि उन्हें अगर सरकार की तरफ से ज़मीन मिल जाए, तो वो एक इंटरनेशनल लेवल का रिहैबिलिटेशन सेंटर बना सकें। जहां सिर्फ़ इलाज ही नहीं, बल्कि लोगों को जागरूक भी किया जा सके।

नदीम और सऊद का मानना है कि हर इंसान अगर थोड़ी सी कोशिश करे, तो बहुत बड़ा फर्क आ सकता है। गर्मियों में छत या बालकनी में पानी रखना, परिंदों के लिए दाना डालना, पतंगबाज़ी में सुरक्षित डोर का इस्तेमाल करना और सबसे ज़रूरी थोड़ी सी हमदर्दी रखना ये छोटे-छोटे कदम किसी की ज़िंदगी बचा सकते हैं।
ये कहानी सिर्फ दो भाइयों की नहीं, बल्कि इंसानियत की है। जहां एक तरफ हम अपनी खुशियों के लिए आसमान को रंगीन बनाते हैं, वहीं कुछ लोग उसी आसमान में टूटती हुई उड़ानों को फिर से जोड़ने में लगे हैं। ये लोग हमें ये याद दिलाते हैं कि इस दुनिया में सिर्फ इंसान ही नहीं रहते, बल्कि और भी कई ज़िंदगियां हैं, जिनका हक़ उतना ही है जितना हमारा। शायद अब वक़्त आ गया है कि हम अपनी खुशियों के साथ-साथ दूसरों की ज़िंदगी का भी ख़्याल रखें।
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