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ज़ायके का सफ़रनामा: दम पुख़्त से दिल की बात, पुरानी रसोई का नया ज़माना

आज के दौर में जब हर गली-मोहल्ले में पिज़्ज़ा, बर्गर और थाई फूड की दुकानें खुली हुई हैं, एक नया चलन तेजी से उभर रहा है। इंडियन फूड लवर्स अब सिर्फ विदेशी व्यंजनों (Exotic recipes) का स्वाद नहीं लेना चाहते, बल्कि अपनी पुरानी रसोई की ओर लौटने लगे हैं। ‘रूट्स की तरफ वापसी’ (Return to the roots) का ये ट्रेंड न सिर्फ खाने के स्वाद को बदल रहा है, बल्कि हमारी सेहत को भी नया आयाम दे रहा है।

सोचिए, एक मिट्टी के हांडी में बंद खाना, धीमी आंच पर घंटों पकता है। ऊपर से आटे की लेप लगी है, भाप अंदर कैद है, और उस बंद दुनिया में मसाले एक-दूसरे में घुल रहे हैं। जब ढक्कन खुलता है, वो खुशबू सिर्फ खाने की नहीं, पूरी विरासत की होती है।

Dum Pukht

Dum Pukht- जब खाना ‘सांस’ लेता है

‘Dum’ का मतलब है सांस, और ‘Pukht’ का मतलब है पकाना। दम पुख़्त यानी खाने को अपनी ही भाप (Dum Pukht) में,अपनी खुशबू में पकाना। ये तकनीक मुगल काल से चली आ रही है, जब Awadh के नवाबों के लिए शाही रसोइये भारी हांडी में गोश्त और चावल भरकर,ऊपर से आटे से सील करके, धीमी आंच पर घंटों पकाते थे। इस सीलिंग को ‘परदह’ कहा जाता है, जो बाद में रोटी की तरह खाया जाता है। जब इस बर्तान को खोला जाता है, तो खुशबू का ऐसा जादू बिखरता है कि पूरा कमरा महक उठता है। कहा जाता है कि यह तकनीक नवाब आसिफ-उद-दौला के दौर में अकाल के समय मजदूरों के लिए खाना पकाने के दौरान खोजी गई थी, और इसका नतीजा इतना शानदार था कि यह शाही रसोई का हिस्सा बन गई ।

इतिहास बताता है कि 1784 में Nawab Asaf-ud-Daulah के काल में, Bada Imambara के निर्माण में लगे हजारों मजदूरों को खिलाने के लिए ये तकनीक अपनाई गई थी। बड़े हांडियों में गोश्त, सब्जियां, चावल और मसाले भरकर धीरे-धीरे पकाए गए। नवाब जब उस खुशबू से मोहित हो गए, तो यही तकनीक शाही दस्तरख्वान तक पहुंच गई। Dum Pukht में पकाया 12 घंटे का Lamb Nihari, ये सिर्फ खाना नहीं, sabr की masterclass है।

आज Delhi के ITC Maurya में स्थित Dum Pukht restaurant जो Asia के 50 Best Restaurants में शामिल है, इसी विरासत को जिंदा रखे हुए है। Murgh Chandi Tikka से लेकर iconic Dum Pukht Biryani तक, हर व्यंजन उस पुरानी रूह को महसूस कराता है।

धुंआर (Dhungar) तकनीक का जादू

वहीं धुंआर (Dhungar) तकनीक खाने में धुएं का स्वाद भरने का सबसे पुराना और अनोखा तरीका है। Dhungar Method यानि धुएं का जादू। Rajasthan की गलियों से निकली ये तकनीक आज London और Paris की fine dining में छा गई है। Dhungar यानी जलते कोयले को एक छोटी कटोरी में रखकर उसपर गर्म घी डालना, और उठते धुएं को पकी हुई दाल, मांस या biryani में बंद कर देना। बस कुछ सेकंड का यह धुआं पूरे पकवान को एक ऐसी smoky खुशबू दे देता है जो कोई artificial flavoring नहीं दे सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि वसा स्वाद की वाहक होती है, और यह धुआं उसी सिद्धांत पर काम करता है, जिससे खाने में एक देहाती और गहरा स्वाद आता है ।

गलावट (Galawat) तरीका

इसके अलावा गलावट (Galawat) तकनीक ने कबाबों (Galawat kabab) की दुनिया बदल दी। नवाबों को ऐसा खाना पसंद था जिसे चबाना न पड़े। इसके लिए कच्चे पपीते या ‘कलमी शोरा’ का इस्तेमाल करके मांस को इतना नरम किया जाता था कि वह मुंह में रखते ही घुल जाए। गलावटी कबाब इसी तकनीक का शानदार नतीजा है।

Galawat kabab

मिट्टी का हांडी-सबसे पुराना Smart Cooker

Non-stick pans और air fryers के इस दौर में, मिट्टी के बर्तन वापस kitchen में अपनी जगह बना रहे हैं और इसकी वजह सिर्फ nostalgia नहीं, बल्कि science है। Clay pots naturally porous होते हैं, जो slow और even heat distribution देते हैं। इनमें पकी दाल या curry में एक subtle earthy aroma आती है जो कोई महंगा cookware नहीं दे सकता।

Eco-friendly भी, nutritious भी: मिट्टी के बर्तन में पकाने से minerals खाने में naturally mix होते हैं। इन्हें electricity नहीं चाहिए, plastic नहीं, ये perfectly sustainable cooking का symbol हैं।

Clay pots biryani

मॉडर्न किचन में प्राचीन स्वाद

दिलचस्प बात ये है कि ये रिवायत सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। फाइव स्टार होटल और फाइन-डाइनिंग रेस्टोरेंट भी अब चारकोल और सिगड़ी पर पकने वाले कबाब और मिट्टी के बर्तन में पकी दाल पेश कर रहे हैं। शेफ अब नए जमाने में पुराने तरीकों को अपना रहे हैं, जैसे ज़मीन दोज़ (Zamin Doz) यानि ज़मीन में गड्ढा खोदकर धीमी आंच पर खाना पकाना। इस तकनीक से मछली या चिकन को छह से आठ घंटे तक पकाया जाता है, जिससे उसका स्वाद शानदार तरीके से लाजवाब हो जाता है।

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