जनाब-ए-आली, उर्दू शायरी के फ़लक पर यूं तो बेशुमार सितारे चमके, मगर कुछ ऐसे हैं जिनकी चमक ज़माने की गर्दिश के बावजूद फीकी नहीं पड़ती। इन्हीं अज़ीम शख़्सियतों में एक नाम है सैयद रियाज़ अहमद ‘रियाज़’ ख़ैराबादी का। उन्हें उर्दू शायरी में ‘ख़ुमरियात का इमाम’ कहा जाता है। ज़रा सोचिए, ‘इमाम’ – यानी लीडर, पेशवा! यह ख़िताब उन्हें यूं ही नहीं मिला। उनकी शायरी में शराब, साग़र, जाम और उस से जुड़ी कैफ़ियत का जो रंग मिलता है, वो अपनी मिसाल आप है। ऐसा लगता है जैसे उन्होंने पूरी मयख़ाने को अपनी क़लम की नोक पर उतार दिया हो, और मय के उस नशे को अपनी रूह में घोल लिया हो।
रियाज़ को किसी ने उर्दू का ख़य्याम कहा, तो किसी ने हाफ़िज़-ए-शीराज़ी से उनकी तुलना की। हिन्दी के मशहूर शायर हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ से भी उनकी शायरी का मुक़ाबला किया गया। लेकिन हक़ीक़त यह है कि रियाज़, न तो ख़य्याम की फ़लसफ़ियाना उलझनें थे, न हाफ़िज़ की रस्म-ओ-रिवाज़ तोड़ती सूफ़ी शायरी। वो बस ‘रियाज़’ थे। एक ऐसी शख़्सियत, जिनके लिए मीर तक़ी मीर का यह शेर सच मालूम होता है।
“उम्र भर हम रहे शराबी से
रियाज़ ख़ैराबादी
दिल-ए-पुर-ख़ूं की इक गुलाबी से”
मगर कमाल की बात तो यह है कि उन्होंने कभी ‘दुख़्तर-ए-रज़’ (अंगूर की बेटी यानी शराब) को मुंह तक नहीं लगाया था।
बादा-ए-हस्ती की मस्ती
रियाज़ की शायरी में जो मस्ती है, जो सरूर है, वह महज़ शराब का नशा नहीं था। यह था बादा-ए-हस्ती की मस्ती यानी ज़िन्दगी के वजूद का नशा। यह उनके अंदरूनी कैफ़ियत की झलक थी, जिसे मस्ती से ज़्यादा ‘पूर्णता’ या ‘कमाल-ए-कैफ़’ कहना मुनासिब होगा।
वह ख़ुद एक बेहद हसीन और दिलकश इंसान थे, लिहाज़ा उन्हें दुनियावी सुंदरियों के नख़रे उठाने की ख़ास ज़रूरत महसूस नहीं हुई। उनकी नज़र में, ये सुंदरियां बस उनकी अंदरूनी मस्ती और समर्पण को ‘दो आतिशा’ (दोगुना) बनाने का एक ज़रिया थीं।
रियाज़ की ख़ुमरियात, दरअसल, उनके जीवन दर्शन का हिस्सा थी। डॉ. ख़लील-उल-ल्लाह के अल्फ़ाज़ में, उनका दर्शन ये था कि हमें ‘हाल की ज़िंदगी में मस्त रहना चाहिए’ और ‘दुनिया की जादूगरी की सुंदरता में अनादिकाल के साक़ी की सुंदरता को पहचानने की कोशिश करना चाहिए’। उन्होंने शराब और उस से जुड़े प्रतीकों को अपने गहरे चिंतन और भावनाओं को व्यक्त करने का ज़रिया बनाया। उनकी शराब, ‘मजाज़ी’ (दुनियावी) भी है और ‘शराब-ए-मार्फ़त’ (ईश्वर-ज्ञान की शराब) भी।
लखनऊ स्कूल का असर और इश्क़िया शायरी
रियाज़ ख़ैराबादी बुनियादी तौर पर लखनऊ स्कूल के शायर थे। इस स्कूल की शायरी की ख़ास पहचान है: नारी सौंदर्य का तफ़सील से बयान और हुस्न-ओ-इश्क़ के नाज़ुक चोंचले का ज़िक्र। रियाज़ की ग़ज़लों में भी यह रंग नुमायां है। ख़ुमरियात को एक तरफ़ रखें, तो उनकी शायरी में मशहूर शायर ‘दाग़ देहलवी’ जैसी शोख़ी और हुस्न परस्ती दिखाई देती है। हालांकि, रियाज़ के यहां ‘दाग़’ जैसी नग्न कामुकता (Sensuality) नहीं, बल्कि एक अलग तरह की मर्दाना कशिश है।
उनकी इश्क़िया शायरी में लखनऊ की रंगीनियत साफ झलकती है।
‘ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते
रियाज़ ख़ैराबादी
क्यूं बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते’
रियाज़ का जीवन सफर: अफ़सर से अदीब तक
सैयद रियाज़ अहमद ‘रियाज़’ की पैदाइश 1853 ई. में उत्तर प्रदेश के क़स्बा ख़ैराबाद, ज़िला-सीतापुर में हुआ था। ये क़स्बा शुरू से ही बेहतरीन ज़हीन लोगों को पैदा करने के लिए जाना जाता रहा है।
बचपन और तालीम: उनके वालिद, सैय्यद तुफ़ैल अहमद, पुलिस इंस्पेक्टर और काफ़ी रसूख़ वाले आदमी थे। रियाज़ की तालीम का आग़ाज़ फ़ारसी से हुआ। जब वो 10 साल के थे, तो वालिद के तबादले की वजह से गोरखपुर चले गए, जहां अरबी की तालीम हासिल की। हालांकि, उनका दिल पढ़ाई में ज़्यादा नहीं लगा और उन्होंने ‘सय्यद नबी बख़्श के मदरसा अरबिया’ से जल्द ही उचाट होकर तालीम छोड़ दी।
‘मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से वो
रियाज़ ख़ैराबादी
मुट्ठी में उन की दे दे कोई दिल निकाल के’
अदबी आग़ाज़: तालीम छोड़ने के कुछ ही अरसे बाद उन्होंने ख़ैराबाद से ही अपनी अदबी ज़िंदगी का आग़ाज़ किया। उन्होंने फौरन ही ‘रियाज़-उल-अख़बार’ (यह बाद में उनकी पहचान बन गया), रोज़नामा ‘तार बर्क़ी’ और ‘गुल कद-ए-रियाज़’ जैसे रिसाले जारी कर दिए।
उस्ताद और तख़ल्लुस: इसी ज़माने में शायरी से गहरी दिलचस्पी पैदा हुई। पहले ‘आशुफ़्ता’ और फिर ‘रियाज़’ तख़ल्लुस इख़्तियार किया। उन्होंने पहले अपने ज़माने के मशहूर उस्ताद ‘असीर’ से शागिर्दी ली, लेकिन बाद में अमीर मीनाई से इस्लाह लेने लगे, और हक़ीक़ी मायनों में वही उनके उस्ताद बने।
सरकारी मुलाज़मत और इस्तीफ़ा: 1870 ई. में वालिद साहब का तबादला दुबारा गोरखपुर हुआ, तो रियाज़ भी वहीं चले गए। वालिद ने अपने रसूख़ का इस्तेमाल करके उन्हें पुलिस सब इंस्पेक्टर की नौकरी दिलवा दी। उन्हें सुपरिंटेंडेंट पुलिस मिस्टर डेविस के पास पेशकारी में लिया गया। डेविस एक गर्म मिज़ाज अफ़सर था। रियाज़ का दिल वहां नहीं लगा और उनकी साहित्यिक रुचियों ने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया, लिहाज़ा 1872 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया।
बच जाए जवानी में जो दुनिया की हवा से
रियाज़ ख़ैराबादी
होता है फ़रिश्ता कोई इंसां नहीं होता
इश्क़ और अजीब ज़िन्दगी
रियाज़ ख़ैराबादी ख़ुद एक हसीन-ओ-जमील शख़्सियत के मालिक थे और सौंदर्य के बड़े पुजारी थे। उनके हुस्न-ओ-शख़्सियत पर शहर की कई सुंदरियां मरती थीं। इश्क़ के मामले में रियाज़ को दूसरों की तरह पापड़ नहीं बेलने पड़े।
शादियां: उन्होंने चार शादियां की, दो ख़ानदान के अंदर और दो बाहर। उनकी एक बीवी गोरखपुर की एक तवायफ़ थी। हालांकि वह बाद में उनसे अलग हो गई, लेकिन उनका संबंध बना रहा। इस रिश्ते की वजह से रियाज़ को ज़िंदगी में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
दिल-जलों से दिल-लगी अच्छी नहीं
रियाज़ ख़ैराबादी
रोने वालों से हंसी अच्छी नहीं
एक दर्दनाक इश्क़: रियाज़ का एक इश्क़ एक ग़ैर मुस्लिम लड़की से भी हुआ, जिससे शादी की कोई उम्मीद नहीं थी। यह इश्क़ इतना गहरा था कि वह लड़की रियाज़ के ग़म में घुल-घुलकर टी.बी. (तपेदिक) का शिकार हुई और चल बसी।
पत्रकारिता और अनुवाद: नौकरी छोड़ने के बाद, उन्होंने अपने अख़बार ‘रियाज़-उल-अख़बार’ को ख़ैराबाद से गोरखपुर ले आए। वहां से उन्होंने एक और रिसाला ‘सुलह-ए-कुल’ और हास्य-व्यंग्य की पत्रिका ‘फ़ित्ना-ओ-इत्र-ए-फ़ित्ना’ भी जारी की। इसके अलावा, उन्होंने ‘गुल कदा-ए-रियाज़’ और ‘गुलचीं’ का भी प्रकाशन किया। उन्होंने प्रसिद्ध उपन्यासकार रेनॉल्ड्स के कई नाविलों का उर्दू में अनुवाद भी किया।
रियाज़ की ज़िंदगी के आख़िरी 30 साल कभी लखनऊ और कभी ख़ैराबाद में गुज़रे। उनका दिल हमेशा गोरखपुर में ही रहा, जहां उनकी ज़िंदगी की सबसे हसीन यादें जुड़ी हुई थीं। उन्हें आर्थिक परेशानियों की वजह से गोरखपुर छोड़ना पड़ा था। राजा महमूदाबाद के आग्रह पर वह लखनऊ आ गए, जहां राजा साहब उन्हें 40 रुपये मासिक वज़ीफ़ा (Stipend) दिया करते थे।
मय-ख़ाने में क्यूं याद-ए-ख़ुदा होती है अक्सर
रियाज़ ख़ैराबादी
मस्जिद में तो ज़िक्र-ए-मय-ओ-मीना नहीं होता
लखनऊ आते वक़्त एक अफ़सोसनाक वाक़िया पेश आया: उनका एक बॉक्स चोरी हो गया, जिसमें उनका दीवान (कलाम का संग्रह) भी था। इस तरह उनकी चालीस साल से ज़्यादा की शायरी का सरमाया उनके हाथ से निकल गया।
मुश्किलों का दौर: उधर, उनकी पहली बीवी क़त्ल के एक मुक़द्दमे में फंस गई। उसे क़त्ल के इल्ज़ाम से बरी कराने और फांसी से बचाने की कोशिशों ने रियाज़ को अंदर तक निचोड़ दिया। इस थकान और मुश्किलों की वजह से वह 1910 ई. में ख़ैराबाद वापस आने पर मजबूर हो गए और वहीं हमेशा के लिए बस गए।
‘मय-ख़ाने में मज़ार हमारा अगर बना
रियाज़ ख़ैराबादी
दुनिया यही कहेगी कि जन्नत में घर बना’
आख़िरी वक़्त में वह राजा महमूदाबाद के वज़ीफ़े पर गुज़ारा करते थे। अपने मकान के एक ख़ामोश कोने में आरामदेह कुर्सी पर लेटे-लेटे डाक और अपनी मौत का इंतज़ार करते रहते थे। आख़िरकार, 1928 ई. में सू-ए-हज़म की शिकायत के सबब उनका देहांत हो गया।
रियाज़ ख़ैराबादी की अहमियत और ख़ासियत एक ऐसे उर्दू शायर की तरह सामने आती है, जिसने मय और मयख़ाने से जुड़ी सारी बारीकियों को अपने कलाम में इस ख़ूबी से समेटा कि वो “इमाम-ए-ख़ुमरियात” कहलाए। उन्होंने साबित किया कि शराब सिर्फ़ बोतल, जाम या ठोकर की बात नहीं। बल्कि इंसान के वजूद, उसके इश्क़, दर्द और नज़रिए की एक रूहानी ताबीर भी हो सकती है।
उनका कलाम ये एहसास दिलाता है कि मयख़ाना दरअसल ज़िंदगी का वह आईना है जिसमें आदमी अपना असल चेहरा देखता है कभी रौशन, बे-करार, इश्क़ के नशे में चूर।
रियाज़ सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि अपने दौर की तहज़ीब, तजरबों और रूहानी मस्ती का ज़िंदा-जागता अक्स थे, जिसकी सुर्ख़ नशा-आफ़रीन रवानी आज भी उर्दू शायरी के सर पर एक ताज की तरह जगमगाती है।
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