Wednesday, September 2, 2026
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गरीब बच्चों को प्लास्टिक के बदले मुफ़्त शिक्षा दे रहा नीरजा फुटपाथ स्कूल

कहते हैं ज्ञान बांटने से बढ़ता है तो इसी कहावत की जिंदा मिसाल हैं नीरजा सक्सेना। गाज़ियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में पिछले कई सालों से नीरजा फुटपाथ स्कूल चला रही हैं, जहां पर गरीब और बढ़ने की लालसा रखने वाले बच्चों से फीस के बदले प्लास्टिक ली जाती है। एनटीपीसी की रिटायर्ड ऑफिसर नीरजा सक्सेना पर्यावरण प्रेमी होने के नाते प्लास्टिक वेस्ट के खतरे के प्रति भी जागरूक कर रही हैं।

नीरजा सक्सेना ने अपनी लाइफ का एक मकसद बना लिया है और वो है बच्चों को अच्छी शिक्षा देना। नीरजा के फुटपाथ स्कूल में स्टूडेंट्स सुबह 10:30 आ जाते हैं। नीरजा का स्कूल 12:30 तक चलता है, जहां वो अपने स्कूल के बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ हर वो ज़रूरी बातें सिखाना चाहती हैं, जो उनकी लाइफ में काम आ सकें। जिससे बच्चों का पर्सनालिटी डेवलपमेंट हो सके और उनकी जिंदगी में अनुशासन आए।

नीरजा स्कूल के बच्चों को गायत्री मंत्र, राष्ट्रीय गीत, हिंदी और इंग्लिश में प्रेयर, शपथ और राष्ट्रगान करवाती हैं। अगर किसी स्टूडेंट को कुछ समझने में परेशानी होती है तो उसे अलग से टाइम देकर उनकी प्रॉब्लम को सॉल्व भी करती हैं।

कैसे शुरू किया नीरजा फुटपाथ स्कूल

नीरजा सक्सेना साल 2019 में एनटीपीसी से रिटायर हो गई थीं, इसके कुछ महीनों के बाद ही पूरी दुनिया में कोरोना महामारी ने कोहराम मचा दिया था। कोरोना के कारण लोग अपने घरों में कैद हो गये थे। नीरजा ने DNN24 को बताया कि ‘उस वक्त मैं टीवी में देखती थी कि लोग कोरोना टाइम में भी काफी काम कर रहे हैं। इसे देखकर उनको काफी अच्छा लगता था और सोचती थीं कि वो भी कुछ कर सकती हैं।

नीरजा ने बताया कि अन्नदान महादान समूह लोगों को ऑनलाइन खाना उपलब्ध कराता है, लेकिन कोरोना टाइम में अन्नदान महादान बंद हो गया। कोरोना महामारी के दौरान अन्नदान महादान ने लोगों से मिले डोनेशन की हेल्प लेकर लोगों खाना बांटना शुरू किया और वो उनकी इस पहल से जुड़ गईं।

खाना बांटने के साथ बच्चों में पढ़ने की डाली आदत

जब नीरजा ने झुग्गी झोपड़ियों में खाना बांटना शुरू किया तो उन्होंने देखा कि बच्चे खाना तो कहीं न कहीं से जुटा लेते हैं, लेकिन शिक्षा की रोशनी से कोसों दूर हैं। तब उन्होंने अपने खाली वक्त को इन बच्चों को पढ़ाने में इस्तेमाल करने का फैसला लिया। उन्होंने बच्चों के अंदर धीरे धीरे पढ़ने की आदत डाली। जब बच्चे पूरी तरह पढ़ने के लिए तैयार हो गए तो फिर उन्होंने पढ़ाना शुरू किया।

नीरजा ने अपनी सोसाइटी के फुटपाथ पर ही एक छोटा सा स्कूल शुरू किया। स्कूल जैसा माहौल बनाने के लिए उन्होंने ब्लैक बोर्ड, टेबल और सीमेंट की बोरियों को ज़मीन पर बिछा दिया, जिससे बच्चे बैठकर पढ़ सके। नीरजा बताती हैं कि पहले दिन करीब 20 बच्चे उनके स्कूल में पढ़ने आए और ये सिलसिला जारी रहा। उन्होंने बताया कि राहगीरों ने भी उनकी काफी मदद की, बच्चों की पढ़ाई के लिए डोनेशन देना शुरू किया।

इस तरह फीस के बदले प्लास्टिक लेने की शुरुआत हुई

नीरजा ने DNN24 को बताया कि ‘वो पहले फ्री में बच्चों को पढ़ाया करती थी। जब वो सामान बांटती थी तब उस दिन ज्यादा बच्चे आते थे और जिस दिन सामान नहीं बांटा जाता था तो कम बच्चे ही आते थे, फिर उन्होंने सोचा कि बच्चों से 20 रुपये फीस ली जाए और उस फीस का इस्तेमाल भी बच्चों के लिए ही किया जाए। वो बताती हैं कि करीब तीन से चार महीने फीस लेने के बाद उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे फीस नहीं दे पा रहे थे, तब नीरजा ने बच्चों से फीस के बदले प्लास्टिक लेने का फैसला किया।

उन्होंने पहले बच्चों को प्लास्टिक को लेकर जागरूक किया और उसके नुकसान के बारे में समझाया। नीरजा ने बच्चों से प्लास्टिक की बोतलों में टॉफी, चिप्स, कुरकुरे के पैकेट को बोतलों के अंदर भरकर लाने को कहा। छोटे बच्चों से दो बोतल और बड़े बच्चों से तीन बोतल लाने को कहा।

बच्चों को फुटपाथ से पढ़कर प्राइवेट स्कूल में मिल रहा है एडमिशन

नीरजा फुटपाथ स्कूल से पढ़कर आज कई बच्चे दूसरे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। नीरजा के स्कूल में पढ़ी कुमकुम कहती हैं कि ‘नीरजा मैडम पहले उनको खाना देती थी एक दिन उन्होंने पूछा कि क्या हम लोग पढ़ना चाहते हैं तो उन लोगों ने हां में जवाब दिया। कुमकुम बताती हैं कि वो अब एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रही हैं। ’

नीरजा बच्चों को पौधरोपण जैसे कार्यक्रम भी करवाती है। नीरजा का मानना है कि ये बच्चे ही हमारा कल है, इनको बेहतर बनाकर ही हम अच्छा भविष्य बना पाएंगे।

वहीं नीरजा के स्कूल में वंदना श्रीवास्तव करीब एक साल से बच्चों को पढ़ा रही हैं। वो दिल्ली इंटरनेशनल स्कूल की सीनियर टीचर रही हैं। वंदना बताती है कि ‘उन्होंने न्यूज़ पेपर में नीरजा मैडम के ऊपर लिखा एक आर्टिकल पढ़ा था उसे पढ़कर बहुत अच्छा लगा और कुछ दिनों के बाद वो नीरजा मैडम से मिलने आईं। तब उनको ऐसा लगा कि समाज का एक सदस्य होने के नाते अपना योगदान देने के लिए ये जगह सबसे अच्छी है।’

नीरजा फुटपाथ स्कूल के बच्चे अपने ख्वाबों को संजो रहें। कोई फौजी तो कोई टीचर, कोई आर्मी ऑफिसर तो कोई डॉक्टर बड़े होकर बनना चाहता है। अब तक इन बच्चों ने करीब 4000 से भी ज्यादा इको ब्रिक्स बनाकर सैकड़ों किलो प्लास्टिक वेस्ट को लैंडफिल में जाने से बचाया है। बच्चे अब आस-पास के इलाकों में पड़ा कूड़ा इकट्ठा करते हैं। नीरजा चाहती हैं कि वो अपने स्कूल के बच्चों को वृद्धाश्रम और म्यूज़ियम जैसी जगहों पर भी लेकर जाएं।

ये भी पढ़ें: पुलवामा का Wood Carving Center कैसे बना रहा है लड़कियों को आत्मनिर्भर

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1 COMMENT

  1. very nice… बहुत बहुत धन्यवाद नौशीन… तुमने मेरी शाला मे आकर, मेरे बच्चों और मेरे साथ जो समय देने के लिए और फिर उसको अपने शब्दों मे DNN24 publish करने के लिये.. 🙂

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