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ये हैं लखनऊ के वो शाही फाटक, जिनकी दीवारें खुद कहानियां बयां करती हैं!

अरे भाई, लखनऊ (Lucknow) सिर्फ टुंडे के कबाब और चिकनकारी का नाम नहीं है। ये शहर है तहज़ीब, नज़ाकत और उन दरवाज़ों का जहां इतिहास आज भी साँस लेता है। हम यहां आपको ले चलेंगे उन्हीं फाटकों की सैर कराने, जिनके बारे  में आपने नाम तो सुना होगा, लेकिन उनके पीछे की दिलचस्प कहानियां शायद ही जानते होंगे।

हमने इस सफ़र में लखनऊ की अमीरूद्दौला लाइब्रेरी की एक्स लाइब्रेरियन नुसरत नाहिद से भी बात की, और उन्होंने हमें बताया कि ये फाटक सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि अवध की शानो-शौकत और ग़म के साक्षी हैं। तो चलिए, बिना देर किए, सैर करते हैं लखनऊ के उन अनकहे दरवाज़ों की…

रूमी दरवाज़ा

रूमी दरवाज़ा: भूखे को रोज़ी देने वाला फाटक

बस एक मिनट, क्या आप जानते हैं कि ये शानदार दरवाज़ा अकाल में बनाया गया था? जी हां, 1784 में जब अवध में भीषण अकाल पड़ा, तो नवाब आसफ़-उद्-दौला ने सोचा, ‘रोटी देना खैरात है, लेकिन रोज़गार देना इबादत है।’

उन्होंने 1784 से 1786 के बीच ये दरवाज़ा और इमामबाड़ा बनवाना शुरू किया, ताकि गरीबों को काम मिले। कहते हैं उस ज़माने में एक करोड़ रुपये लगे थे।

  • नाम क्यों पड़ा रूमी? क्योंकि इसका डिज़ाइन Istanbul (जिसे पहले ‘रूम’ यानी रोम कहते थे) के दरवाज़ों से मिलता है।
  • ख़ासियत: तुर्की और अवधी शैली का जबरदस्त मिश्रण। वास्तुकार थे किफ़ायतउल्लाह, जिन्होंने सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि एक पहचान गढ़ी।

लखनवी नज़रिया: ये सिर्फ पुराने शहर का एंट्री गेट नहीं, आज ये पूरे लखनऊ का चेहरा है।

शेर दरवाजें की पुरानी इमेज

शेर दरवाज़ा (नील गेट) : जहां ‘बदला’ की आग भड़की

ये है कैसरबाग महल का वो दरवाज़ा, जिसके ऊपर शेर की डिडा आकृति है। इसलिए नाम पड़ा ‘शेर दरवाज़ा’। लेकिन असली कहानी तो 1857 की क्रांति से जुड़ी है।

26 सितंबर 1857 को, अंग्रेज़ों का कुख्यात अफसर ब्रिगेडियर जनरल नील, जिसने हजारों भारतीयों का कत्ल किया था। यहां ठिकाने लगा था। भारतीय क्रांतिकारियों ने उसे इसी दरवाज़े के पीछे घेरकर मार गिराया।

सिकंदर बाग का फाटक

सिकंदर बाग का फाटक : जहां प्रेम और शहादत एक हो गए

वाजिद अली शाह… नाम ही काफी है। उन्होंने ये बाग 1853 में अपनी बेगम सिकंदर महल के लिए बनवाया था। पांच लाख रुपये उस ज़माने में! इमेजिन.. ये थी नवाबों की नज़ाकत।

लेकिन 1857 में ये प्रेम-प्रसंग का स्थान जंग के मैदान में बदल गया। 16 नवंबर 1857 को सर कोलिन कैंपबेल की अंग्रेज़ फौज ने दरवाज़े तोड़ दिए और 2000 से ज़्यादा क्रांतिकारियों का कत्ल कर डाला।

  • वीरांगना उदा देवी पासी: यहीं पर उन्होंने लड़ते हुए जान दी। आज इसी चौराहे पर उनकी प्रतिमा आसमान की तरफ उठे हाथों से इतिहास को चुपचाप देख रही है।
  • आज: ये NBRI (नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट) के अंदर है, लेकिन इसके फाटक पर चिकनकारी की तरह बनी नक्काशी आपको बता देगी, ये सिर्फ एक इमारत नहीं है।
अकबरी दरवाज़ा

अकबरी दरवाज़ा: जहां मुगलों ने छोड़ी थी ‘मछली की निशानी’

ये नाम तो आपने सुना होगा। चौक, शाहगंज, नक्खास – ये सब इसी दरवाज़े की गवाही देते हैं। लेकिन क्या पता था आपको कि इसे बनवाया था खुद बादशाह अकबर के सम्मान में?

जी हां! अकबर की लखनऊ की पहली यात्रा की याद में इसे बनाया गया था। काज़ी महमूद बिलग्रामी ने इसे लखौरी ईंटों से बनवाया।

  • अनोखी नक्काशी: इस पर मछली की नक्काशी है। क्यों? क्योंकि मछली अवध की तहज़ीब में समृद्धि और नवाबी सल्तनत की निशानी थी।
  • दिलचस्प बात: ये दरवाज़ा फतेहपुर सिकरी से हूबहू मिलता है। और हैरानी की बात? शेरशाह सूरी के ज़माने में यहां टकसाल थी, जहां सिक्के ढलते थे। यानी सिक्कों की खनक और मछलियों की नक्काशी का संगम।

अब बात चौक की गलियों की। यहां छिपा है राजा जिया लाल का फाटक। ये सिर्फ एक दरवाज़ा नहीं, बल्कि एक पूरा दौर है।

कभी यहां ‘दिल आराम की बारादरी’ हुआ करती थी। जो लखनऊ का सबसे पुराना ऑडिटोरियम था। यहां नाच-गाने की महफिलें सजती थीं, रसूख़दार दरबारी आते थे।

  • अंदाज़-ए-बयान: लखनवी अभी भी गर्व से कहते हैं, ‘उस दरवाज़े में अब भी तालीम और सितारों की सी गूंज बसती है।’
  • ख़ासियत: लखौरी ईंटों की बेहतरीन चुनाई। अगर आप वहां खड़े होकर कान लगाएं, तो शायद सुन पाएं, ‘क्या ज़माना था!’
मलका गेटी फाटक

मलका गेती का फाटक: नवाबी बेगमों का सपना

हेविट रोड पर आहाता रसूल बेग में स्थित ये मस्जिद और फाटक नवाब अमजद अली शाह की पत्नी मलका गेती की देन है।

  • कमाल की बात: उस दौर में एक बेगम ने सोचा कि “मैं भी अपनी एक अलग पहचान बनाऊं” और ये मस्जिद उसी सोच की तस्वीर है।
  • वास्तुकला: तीन गुंबद, दो मीनारें, और पुराने लखनऊ का वही अंदाज़। आज ये तंग गलियों के बीच है, लेकिन अब भी अपनी भव्यता के मामले में किसी से कम नहीं।

लखनवी नज़रिया: ये सिर्फ एक मस्जिद नहीं है, ये गंगा-जमुनी तहज़ीब और नवाबी दौर की महिलाओं की दूरदर्शिता का सबूत है।

लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज

रेड गेट (गोला गंज) : लाल ईंटों की चुप कहानी

गोला गंज… जहां लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज और बलरामपुर अस्पताल है। लेकिन इसी इलाके में है ‘रेड गेट’ यानी लाल फाटक।

  • नाम क्यों? क्योंकि ये पूरी तरह लाल ईंटों से बना था, उसी तरह जैसे मुगल और नवाबी दौर में बनते थे।
  • कड़ी: ये कैसरबाग और चौक को जोड़ता था। यानी नवाबों का आना-जाना इसी दरवाज़े से होता था।
  • 1857 में: यहां भी खूनी संघर्ष हुआ था। आज ये इतना मशहूर तो नहीं, लेकिन पुराने लखनऊ के लोग जानते हैं – “ये दरवाज़ा उस दौर की चुप गवाह है।”
आलमबाग फाटक

 आलमबाग का फाटक : आलमआरा से आज़ादी तक

कानपुर रोड पर स्थित आलमबाग महल, जिसे नवाब वाजिद अली शाह ने बेगम आलम आरा के लिए 1847-56 के बीच बनवाया था। 1857 में ये क्रांतिकारियों की सैन्य चौकी बन गया। आज ये पुरातात्विक धरोहर है।

लखनवी कहते हैं: ‘ये वो दरवाज़ा है जहां नवाबों की आरामगाह, गदर की जंग में बदल गई।’

तो ये थे लखनऊ के वो शाही फाटक…

…जिन्हें आप रोज़ क्रॉस करते हैं, लेकिन शायद उनकी रूह को नहीं पहचानते। हर दरवाज़ा यहाँ एक किताब है, जिसे पढ़ने के लिए थोड़ा ठहरना पड़ता है। लखनऊ में और भी कई अहम दरवाजें और फाटक हैं, जिनके बारे में हम आपको अगले पार्ट में बताएंगे।

आलमबाग कोठ

हमारी कोशिश होगी कि हम लखनऊ से जुड़ी हर छोटी और बड़ी बात-हर एरिया, हर अहम जगह के पीछे की अनकही कहानी आप तक पहुंचाते रहें। क्योंकि ये शहर सिर्फ रहने की जगह नहीं, एक एहसास है।

अपने लखनऊ को नई नज़र से देखिए। और हां, अगर कोई दरवाज़ा आपको बुलाए तो मत रुकिए – जाइए, उससे दोस्ती कीजिए।

ये भी पढ़ें: गड़बड़झाले में फंसे तो कहिएगा नहीं, रूमी गेट तो ठीक है,पहले ज़रा बंदरियाबाग़ तो घूम आइये, जब नाम ही बयां करें लखनऊ की दास्तां

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