योगेश प्रवीण, इतिहासकार और ‘लखनऊ नामा’ के रचनाकार, ने एक बार कहा था कि लखनऊ को महलों और बागों का शहर कहा जाता था। ये वो ज़मीनें थीं जहां नवाबों ने अपने इश्क, अपनी तबीयत और अपने जुनून को हरियाली के क़तारों में पिरोया था।
लेकिन जब नवाबों के हाथ से ताज़ीर छिन गई, तो इन बागों को संभालना मुश्किल हो गया। ज़्यादातर बाग बिक गए, पर उनके नाम नहीं मिटे। चलिए आज हम आपको लखनऊ के उन्हीं बागों की सैर कराते हैं, जिनके बारे में आप नाम से तो जानते हैं मगर उनकी असली कहानी शायद ही जानते हों।

सिकन्दरबाग: मोहब्बत का बाग़, जहां खून से सींची गई आज़ादी
आपने कभी नेशनल बॉटनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NBRI) का नाम सुना होगा, मगर क्या आप जानते हैं कि ये ज़मीन कभी सिकन्दरबाग़ थी? ये बाग नवाब वाजिद अली शाह ने अपनी माशूका सिकन्दर बेगम के नाम बनवाया था। दिलचस्प बात ये है कि नवाब ने उनसे शादी तब की, जब बेगम मौत के बिस्तर पर थीं।
1853 में 5 लाख रुपये की लागत से बने इस बाग में एक खूबसूरत महल, तीन गुंबद वाली मस्जिद और ऐसी बारादरी थी जो आज भी किसी नायाब कारीगरी की कहानी सुनाती है।
मगर 1857 की क्रांति ने इस बाग की रौनक को खून में बदल दिया। 16 नवंबर 1857 को सर कॉलिन कैम्पबेल की अगुवाई में अंग्रेज़ों ने यहां हमला कर दिया। 2000 से ज़्यादा आज़ादी के दीवानों को इसी धरती की गोद सुला दिया गया।
आज जब आप NBRI में घूमें, तो इन शहीदों की दास्तान ज़रूर याद करना।

जब मूसाबाग़ लखनऊ की शान था
मूसाबाग हार्डोई रोड पर बसा ये इलाक़ा, जहां से गुजरते हुए आपने सैकड़ों बार ‘मूसाबाग’ का बोर्ड पढ़ा होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये नाम कहां से आया? एक चूहे से? या फिर किसी फ्रांसीसी शख़्स से? चलिए जानते हैं-
जाने-माने इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीण (जिन्होंने ‘लखनऊ नामा’ जैसी अनमोल किताब लिखी) ने अपनी किताब में साफ लिखा है:
‘मूसाबाग को ‘मोसियो मार्टिन’ ने नवाब आसफ़ुद्दौला के लिए बनवाया था।’
‘मोसियो’ (Monsieur) यानी फ्रांसीसी भाषा में ‘महाशय’। जनरल क्लॉड मार्टिन एक फ्रांसीसी सिपाही और Intelligence थे, जो लखनऊ आकर बस गए। उनके ‘मोसियो’ से ही बिगड़ते-बिगड़ते ये नाम ‘मूसा’ हो गया। और ‘बाग’ लगा दिया, तो बना मूसाबाग।
थोड़ा सोचिए: लखौरी ईंटें उस दौर में सबसे मज़बूत और नायाब ईंटें हुआ करती थीं। यानी मूसाबाग कोई मामूली बाग नहीं, बल्कि एक शाहकार था।
और ये सब कुछ था यहां-
- तहख़ाने के महल:गर्मियों में ठंडी हवाओं के लिए बने ये तहखाने अवधी बादशाहत की चालाकी दिखाते हैं।
- 32 दरवाज़े:एक भवन में 32 दरवाज़े! सोचिए कितना विशाल रहा होगा ये परिसर।
- आलीशान बारादरियां और हरियाली के ऐसे नज़ारे कि आंखें ठंडी हो जाएं।

आलमबाग़: ग़ज़लों का बाग़, फिर तोपों का मोर्चा
नवाब वाजिद अली शाह ने अपनी पहली बीवी आलम आरा के लिए ये बाग बनवाया। दोनों बहुत ग़ज़ल गाते थे।..सुनिए, दो प्यार करने वाले आम के पेड़ों की छांव में शेर बुन रहे हैं, कोई सल्तनत उनके क़दमों में दौड़ती हुई आ रही है… लेकिन दौर बदला।
1857 में अंग्रेज़ों ने आलमबाग़ को किले में तब्दील कर दिया। सर जेम्स आउट्रम मार्च 1858 तक इसे फतह नहीं कर पाए, आखिरकार सर कॉलिन कैंपबेल ने इसे कब्ज़ा लिया।
आज आलमबाग पैलेस, लखनऊ-कानपुर हाईवे पर कोठी आलमआरा के नाम से मौजूद है। इसका विशाल गेट जिसे ‘छोटे खान’ ने डिज़ाइन किया था, अब चंदर नगर कॉलोनी के मेन गेट की तरह इस्तेमाल होता है।

कैसरबाग: बादशाह की पसंद, या राजा का बाग?
वाजिद अली शाह ने कैसरबाग को एक विशाल परिसर बनवाया, जहां छोटे-छोटे बाग़ एक दूसरे से लिपटे थे। पर इस नाम की दो कहानियां हैं:
कहानी: ‘कैसर’ यानी ‘बादशाह’ (फ़ारसी में सीज़र से) यानी ‘बादशाह का बाग’।
दूसरी कहानी: एक ख़ूबसूरत ख़ातून को ‘कैसर पसंद’ (बादशाह की चुनिन्दा) कहा जाता था। उसी के नाम पर ये बाग बना।
आज ख़ुर्शीद बाग फाटक, कैसरबाग गेट्स में से एक, उसी गौरव के अवशेष के रूप में खड़ा है। 1857 के गदर के दौरान यहां खूब लूटपाट हुई, और लखनऊ के सुनहरे स्थापत्य के बड़े हिस्से तहस-नहस हो गए। ये गेट चुपचाप खड़ा है जैसे कोई बूढ़ा दरबारी कह रहा हो- ‘हमें क्या पूछते हो, हमने ज़माना देखा है।’

बादशाहबाग़: आज लखनऊ यूनिवर्सिटी है
नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने बादशाहबाग़ को अपनी रानी कुदसिया बेगम के लिए ‘लेडीज़ गार्डन’ बनवाया। यहां तक कि माली भी औरतें थीं। नवाब खुद छतर मंज़िल (जो आज CDRI है) से स्टीमर पर सवार होकर अपनी रानियों के पास आते थे।
फ्रांसीसी महिला फैनी पार्क्स ने 1831 में यहां का दौरा किया और लिखा कि ये ‘मिनी ज़ू’ की तरह था। जहां खास तरह के परिंदे और जंगली जानवर रखे जाते थे।
1857 के गदर के बाद अंग्रेज़ों ने यहां खूब नरसंहार किया। फिर कपूरथला के महाराजा ने ये सारी ज़मीन सिर्फ 35,000 रूपये में ख़रीद ली। उन्होंने 90 एकड़ ज़मीन कैनिंग कॉलेज को सिर्फ़ 3 रूपये सालाना किराए पर दे दी। और यही कैनिंग कॉलेज 1922 में लखनऊ विश्वविद्यालय बना।
तो अगली बार जब आप लखनऊ यूनिवर्सिटी के गेट में दाखिल हों, तो याद करना, ये ज़मीन कभी ‘लेडीज़ गार्डन’ हुआ करती थी।

विलायती बाग़: विदेशी बेगमें, या विदेशी फूल?
अगर आपने कभी कैन्टोनमेंट इलाक़े में दिलकुशा के पास ‘विलायती बाग’ का नाम सुना हो, तो जान लीजिए कि ये नाम दो बातों से जुड़ा है:
- नवाब गाज़ीउद्दीन हैदर की दो विलायती बेगमें (एक ईसाई, एक अर्मेनियाई) यहां रहती थीं।
- या फिर यहां के फूलों की सारी क़िस्में विदेशी थीं, इसलिए ‘विलायती’।
दिलकुशा महल से सटा ये बाग जैसे लखनऊ की कोस्मोपॉलिटन रूह का आइना है।

बनारसी बाग़: आमों से चिड़ियाघर तक का सफर
अब इसे ‘नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान’ कहते हैं, लेकिन लखनऊ के असली लोग आज भी ‘बनारसी बाग’ बुलाते हैं। 18वीं शताब्दी में नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने इसे आम का बाग बनवाया था – एक आम बाग, जहाँ शाम को बारादरी में बैठकर अवधी रंगीनियाँ होती थीं।
29 नवंबर 1921 को इसे प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत में चिड़ियाघर बना दिया गया। गवर्नर सर हारकोर्ट बटलर ने इसकी नींव रखी।
लेकिन आज भी, जब आप वहाँ बारादरी को बीचोंबीच खड़ा देखें, तो समझिए – वो आम की वो बारादरी, जहाँ नवाब की बेगमें बैठा करती थीं, अब बंदरों और परिंदों के साथ ख़ामोश है।
लखनऊ की रूह अब भी ज़िंदा है

योगेश प्रवीण ने सही कहा था: नवाबों के हाथ से ताज़ीर छिन गई, लेकिन नाम नहीं मिटे। आज ये बाग शायद संस्थानों, कॉलेजों, और बस्तियों में बदल गए हैं,लेकिन जब ध्यान से सुनो, तो हर पत्ता एक किस्सा कहता है, हर गुम्बद एक नवाबी ज़माने की आह भरता है।
“हम लोग लखनऊ से जुड़ी हर छोटी और बड़ी बातों को बताते रहेंगे क्योंकि ये शहर सिर्फ़ इमारतों का कचहरा नहीं, ये एक एहसास है।”
क्या आपने कभी इन बागों में से किसी एक की असली रूह महसूस की है? तो हमें बताइए। और जानना चाहते हैं लखनऊ का और कोई भूला-बिसरा क़िस्सा तो बस आवाज़ दीजिए नवाबी अंदाज़ में… ‘हुक्म हो’
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