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हिरन की खाल पर लिखी 1000 साल पुरानी क़ुरान, सोने से सजी तारीख़ और नायाब Manuscripts

आपने क़ुरान तो देखी होगी, लेकिन क्या कभी देखी है,हिरन की खाल पर लिखी हुई क़ुरान? (Quran written on deerskin) वो क़ुरान जो करीब एक हज़ार साल पुरानी है, फिर भी उसके हर्फ़ आज भी वैसे ही रोशन हैं जैसे उस वक़्त थे, जब कोई ख़ुशनवीस कातिब बड़ी नाज़ुकी से उसे लिख रहा था। ये अनमोल पांडुलिपी (Manuscript) रखी है पटना की ख़ुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी (Khuda Bakhsh Oriental Public Library, Patna) में। भारत के सबसे बड़े क़ुरानी ख़ज़ानों में से एक में।

यहां पर सोने की स्याही से सजा तैमूर का जंगनामा, नाखूनों से उकेरी गई उर्दू शायरी, केले और खजूर के पत्तों पर लिखी पांडुलिपियां और ऐसे चार नुस्ख़े जिनकी एक भी प्रति दुनिया में कहीं मौजूद नहीं। ये सब कुछ मौजूद है। 

भारत के सबसे बड़े पांडुलिपि संरक्षण और शोध केंद्रों (Manuscript conservation and research centres) में गिनी जाने वाली इस लाइब्रेरी ने अपनी स्थापना के 135वें साल में क़दम रख दिया है। यहां लगभग 21 हज़ार पांडुलिपियां (Manuscripts ) अरबी, फ़ारसी, उर्दू, तुर्की, पश्तो, संस्कृत और हिंदी भाषाओं में मौजूद हैं।

Image-Toi

हिरन की खाल और फ़रिश्तों सी नज़ाकत

इस क़ुरान की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसका चमड़ा। जो हिरन की नर्म और मुलायम खाल पर लिखी गई है। उस ज़माने में ऐसा चमड़ा तैयार करने में सालों लग जाते थे। इसकी स्याही भी आम नहीं, बल्कि ऐसी ख़ास स्याही है जो सदियों तक न उड़ी, न धुली।

सोने से भी कीमती-क्योंकि ये कलाम है ख़ुदा का

ख़ुदा बख़्श लाइब्रेरी में सोने से लिखी पांडुलिपियां भी मौजूद हैं, तैमूर का जंगनामा हो या फ़ारसी मसनवी ख़ुसरो-ओ-शिरीन। लेकिन इस क़ुरान की कीमत उन सबसे ज़्यादा है।

क्यों?

क्योंकि सोना तो चमकता है, लेकिन यह क़ुरान रूह को रोशनी देती है।
सोना ख़रीदा जा सकता है, लेकिन हिरन की खाल पर लिखी यह क़ुरान बेकीमती है।

तस्वीरों के अंदर छुपी आयतें-जब कला और इबादत एक हो जाएं

इस लाइब्रेरी में रखी गई कुछ क़ुरानों में सबसे हैरान करने वाली चीज़ है, आयतों का छुपना।
जी हां। कुछ क़ुरानों की कलाकारी इतनी बारीक और जटिल है कि क़ुरान की आयतें फूलों, बेलों, ज्यामितीय डिज़ाइनों और तस्वीरों के अंदर इस तरह पोशीदा (छिपी) हैं कि उन्हें देखने के लिए आंखों को बहुत ग़ौर करना पड़ता है।

मोहम्मद ज़ाकिर हुसैन आगे बताते हैं :

“बहुत से लोग सोचते हैं कि ये सिर्फ़ तस्वीर है, लेकिन जब वो गौर से देखते हैं, तो अचानक उन्हें आयतें नज़र आने लगती हैं। वो चुप हो जाते हैं। क्योंकि समझ जाते हैं, ये कोई खेल नहीं, ये इबादत है।”

क़ुरान की हिफ़ाज़त – 135 साल की निगरानी

क़ुरान के लिए लाइब्रेरी में Specialized temperature और  humidity control का इंतज़ाम है। अब तक 52 हज़ार पांडुलिपियों को फ्यूमिगेट किया जा चुका है। यानी कीड़ों और सीलन से बचाया जा चुका है। 15 हज़ार से ज़्यादा पुराने पन्नों का chemical treatment हो चुका है।

चार ऐसी क़ुरानें जिनकी दुनिया में कोई दूसरी कॉपी नहीं

सबसे हैरतअंगेज़ बात यह है कि इस लाइब्रेरी में चार ऐसी क़ुरानें हैं, जिनकी दुनिया में कोई दूसरी कॉपी नहीं है। ये इकलौती नुस्ख़े हैं। अगर ये यहां न होतीं, तो ये क़ुरान की तिलावत और कला की कुछ विधाएं हमेशा के लिए खो जातीं।

भारत सरकार ने 76 पांडुलिपियों को राष्ट्रीय ख़ज़ाना घोषित किया है, और उनमें क़ुरान के कई नुस्ख़े शामिल हैं।

Image-wikipedia

हर साल हज़ारों लोग आते हैं सिर्फ़ इस क़ुरान को देखने

पिछले साल अकेले 8,960 विद्वानों ने इस लाइब्रेरी का दौरा किया। उनमें से ज़्यादातर ख़ुसूसन इस क़ुरान को देखने और उस पर रिसर्च करने आए।  ईरान, तुर्की, मलेशिया, यूरोप और अमेरिका से लोग यहां आए।

कोई क़ुरान की लिपि पर काम कर रहा है, कोई उसकी चमड़े की तैयारी पर, तो कोई उस Artistry पर जिसमें आयतें छुपी हैं।

आख़िर में सिर्फ़ इतना…

यह क़ुरान सिर्फ़ एक पांडुलिपि नहीं है। यह एक हज़ार साल पहले किसी बुज़ुर्ग का इमान, किसी ख़ुशनवीस का जुनून, किसी दरगाह की ख़ुशबू, और ख़ुदा के कलाम का एक अद्भुत जश्न।

अगर आप कभी पटना जाएं, तो ख़ुदा बख़्श लाइब्रेरी ज़रूर जाइए। उस हिरन की खाल पर लिखी क़ुरान के सामने दो मिनट खामोश बैठिए। आपको एक ऐसा सुकून मिलेगा, जो शायद आपने पहले कभी महसूस नहीं किया।

ये भी पढ़ें:   ‘ऐब-ए-रवां’ से ‘बाफ़्त-हवा’ तक : वो भारतीय शान जिसने मुगलों को दीवाना बनाया, मलमल जिसे देख यूरोप हैरान रह गया

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