उर्दू अदब और तसव्वुफ़ की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ़ शख़्सियत नहीं बल्कि एक मुकम्मल रूहानी तजुर्बा बन जाते हैं। सय्यद शैख़ैन अहमद हुसैनी शत्तारी ‘कामिल’ हैदराबादी भी ऐसी ही अज़ीम शख़्सियत थे। उनका ताल्लुक़ सादात-ए-हुसैनी के एक मुअज़्ज़ज़ ख़ानदान से था, जिनकी जड़ें अरब की मुक़द्दस सरज़मीं से जुड़ी थीं। उनके आबा-ओ-अज्दाद हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों से गुज़रते हुए गुजरात पहुंचे, और फिर उनके जद्द सय्यद अहमद गुजराती ने 1660 ईस्वी में औरंगाबाद को अपना मस्कन बनाया।
इल्म की तलाश और तालीमी सफ़र
‘कामिल’ की पैदाइश हैदराबाद दकन के मोहल्ला दुईरपुरी में आस्ताना-ए-शत्तारिया में हुई। बचपन से ही उन्हें इल्म से गहरा शौक़ था। उनकी इब्तिदाई तालीम उनके वालिद-ए-बुज़ुर्गवार की निगरानी में घर पर ही हुई। इसके बाद उन्होंने दीदार अहमद से इल्म-ए-मंतिक़ हासिल किया। उनके असातिज़ा में मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीकी ‘हसरत’ हैदराबादी, मौलाना अब्दुल-वासे (उस्मानिया यूनिवर्सिटी के प्रोफे़सर) और मौलाना सय्यद अब्दुल-बाक़ी शत्तारी जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने उनकी शख़्सियत को इल्मी और रूहानी बुलंदी अता की।
पीर-ए-तरीक़त और दानिश्वर शख़्सियत
‘कामिल’ एक साथ आलिम-ए-दीन, पीर-ए-तरीक़त और दूरअंदेश मुफ़क्किर थे। उन्होंने अपने दौर के बदलते हालात को समझते हुए दीन को आसान और असरदार अंदाज़ में पेश किया। उनकी बातों में सादगी थी, लेकिन असर ऐसा कि सुनने वाला देर तक उस कैफ़ियत में डूबा रहता। वे अपने मुरीदों के लिए रहनुमा थे, जो उन्हें इश्क़, सब्र और तौहीद का रास्ता दिखाते थे।
शायरी में रूहानियत और एहसास की गहराई
‘कामिल’ का कलाम उनके रूहानी तजुर्बात का आईना है। उनकी शायरी आज भी बर्र-ए-सग़ीर की ख़ानक़ाहों और महफ़िलों में बड़े शौक़ से पढ़ी और गाई जाती है। उनके अशआर में इश्क़-ए-हक़ीक़ी, वफ़ा, सब्र और तस्लीम-ओ-रज़ा का रंग साफ़ नज़र आता है.
“तमन्ना दो दिलों की एक ही मालूम होती है
अब उन की हर ख़ुशी अपनी ख़ुशी मालूम होती है”
“ज़रा ठहरो मिरे आंसू तो पूरे ख़ुश्क होने दो
अभी आंखों में थोड़ी सी नमी मालूम होती है”
“अपने क़दमों से जुदा कर के तमाशा न बना
तेरा ‘कामिल’ तिरा बंदा तिरा शैदाई है”
“क्या पूछते हो मुझ से मिरे दिल की आरज़ू
अब मेरी हर ख़ुशी है तुम्हारी ख़ुशी के साथ”
“महसूस ये हुआ मुझे एहसास-ए-ग़म के साथ
मैं उस के दम के साथ हूं वो मेरे दम के साथ”
इन अशआर में मोहब्बत, दर्द और रूहानी इत्तिहाद की ऐसी झलक है, जो दिल को छू जाती है।
विसाल और रूहानी विरासत
28 नवंबर 1976 को ‘कामिल’ इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए। मगर उनका इल्म, उनकी तालीमात और उनका कलाम आज भी ज़िंदा है। उनकी ख़ानक़ाह आज भी रूहानी सुकून का मरकज़ है, जहां लोग तसल्ली और रोशनी की तलाश में आते हैं।
सय्यद शैख़ैन अहमद हुसैनी शत्तारी ‘कामिल’ की ज़िंदगी हमें यह पैग़ाम देती है कि जब इल्म और इश्क़ एक साथ हो जाएं, तो इंसान एक रौशन चराग़ बन जाता है। ‘कामिल’ भी ऐसा ही एक चराग़ थे, जिनकी रौशनी आज भी दिलों को मुनव्वर कर रही है।
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