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बॉलीवुड के जाने माने एक्टर सूरमा भोपाली उर्फ इश्तियाक अहमद ज़ाफरी से जुड़े अनसुने किस्से

मध्य प्रदेश का एक छोटा सा शहर दतिया, लेकिन ये शहर काफी ख़ास है क्योंकि इस शहर का नाता रहा है हिंदी सिनेमा के दमदार एक्टर और कॉमिक किरदारों से फेमस होने वाले और स्क्रीन पर अपनी ख़ास पहचान बनाई। 400 से भी ज्यादा फिल्में कर चुके बॉलीवुड के सूरमा भोपाली उर्फ जगदीप ज़ाफरी को लोगों का बहुत प्यार मिला। 1975 में आई शोले में निभाए गए सूरमा भोपाली के किरदार ने उन्हें बॉलीवुड में मशहूर कर दिया था। जाफरी की कर्मभूमि मुंबई रही लेकिन उनका जन्म दतिया में 29 मार्च 1939 को हुआ था। आइये जानते हैं दतिया से जुड़े सैयद इश्तियाक अहमद ज़ाफरी, उर्फ जगदीप, उर्फ सूरमा भोपाली के अनसुने किस्से।

इश्तियाक अहमद जाफरी कब गए मुंबई

दतिया शहर के जाने माने शायर और वकील इतरत अली ज़ैदी बताते हैं कि जगदीप ज़ाफरी के वालिद यावर अली ज़ाफरी बहुत ही नामी वकील थे। वो हर तरह के केस डील किया करते थे। उनका परिवार रईस परिवारों में गिना जाता था। इनके तीन भाई हसन अहमद ज़ाफरी, सुल्तान ज़ाफरी, नकी अहमद ज़ाफरी और एक बहन तनवीर फातमा थीं।

सैयद इश्तियाक अहमद ज़ाफरी एक्टर जगदीप का असली नाम है। जब हिंदी सिनेमा में गए तब उन्होंने अपना नाम जगदीप रखा। और आज भी ‘जगदीप’ के नाम से जाने जाते हैं। 1947 में जब विभाजन हुआ उस वक्त लोग असमंजस में थे कि किस देश को चुने। उस दौरान ही वालिद यावर अली ज़ाफरी का इंतकाल हो गया और उन्हें दतिया में दफ़नाया गया। पिता जब गुज़रे तब जगदीप की उम्र करीब आठ साल की थी। कुछ समय के बाद वो अपनी मां के साथ मुंबई चले गए।

मुंम्बई में जाने के बाद की मज़दूरी

मुंबई में जाने के बाद उनके आर्थिक हालात ठीक नहीं थे। तब जगदीप साहब ने मज़दूरी की, खिलौने बेचे। उनकी मां ने भी मज़दूरी की और कुछ पैसे कमाये। छोटी सी जगह में रहने से लेकर आलीशान मकान में रहने तक का सफर शुरू किया। दतिया से जाने के बाद जब उनके आर्थिक हालात खराब थे तब उन्हें इक्तेफ़ाक से एक फिल्म डायरेक्टर मिले। उन्होंने जगदीप साहब को फिल्मों में काम करने का मौका दिया। जब उन्होंने पहली बार फिल्मों में काम करना शुरू किया तो उन्हें 50 रुपये दिन का मेहनताना देने की बात कही गई लेकिन उन्हें सिर्फ 25 रुपये ही दिए गए। इस बात का उन्हें काफी अफसोस हुआ था।

इसी बीच उन्हें फेमस डायरेक्टर महबूब ख़ान मिले,उन्होंने अपनी फिल्म में काम करने का मौका दिया, उनको काम करने के लिए पचास रुपये मिलने की बात पक्की की। इतरत अली ज़ैदी ने DNN24 को बताया कि ‘उन्होंने रोने और कॉमेडी की एक्टिंग की। अपने करियर में उन्होंने इतना नाम कमाया कि जगदीप साहब लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।’

वापस मुंबई बुलाने के लिए ड्राइवर को लिखा ख़त

दतिया शहर में आज भी जगदीप जाफरी और उनके परिवार की यादें और उनके नामों निशान मौजूद हैं। उनका परिवार 1949 तक दतिया में रहे और उसके बाद मुंबई चले गए। मुंबई जाने के बाद एक दो बार ही आना हुआ।

जैदी साहब ने ऐसे कई अनसुने किस्सों का जिक्र किया जिनके बारे में शायद ही कोई जानता हो। जगदीप साहब के घर पर बतौर ड्राइवर काम करने वाले ज़ाकिर हुसैन के छोटे भाई ने एक किस्सा बताया कि सबसे बड़े भाई ज़ाकिर भाई थे। उनको सूरमा भोपाली अपने साथ उन्हें मुंबई ले गए। ज़ाकिर भाई ने वहां ड्राइविंग का काम किया,लेकिन कुछ समय बाद उन्हें महसूस हुआ कि दतिया मुंबई से काफी दूर है तो वो कुछ समय बाद दतिया वापस आ गए। और उन्होंने अपना मन दतिया में रहने का बना लिया।

ये बात जब जगदीप साहब और उनके परिवार को पता चली तो उन्होंने ज़ाकिर को वापस आने के लिए ख़त लिखे। जब उन्होंने वापस आने के लिए मना कर दिया तो जगदीप साहब की मां मुंबई से दतिया आईं और ज़ाकिर को अपने साथ चलने को कहा। उस दौरान ज़ाकिर की मां ने कहा कि अब हम यहीं रहना चाहते हैं।

कोरोना काल के दौरान 8 जुलाई 2020 में जगदीप जाफरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन वो आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा है।

ये भी पढ़ें: नेशनल अवॉर्ड विजेता रियाज़ अहमद ख़ान की पेपर मेशी कला क्यों है ख़ास

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