चराग़ हसन हसरत की पैदाइश सन् 1904 में पुंछ (जो उस वक़्त जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था) में हुयी। घर पर ही उन्होंने उर्दू, फ़ारसी और अरबी की तालीम हासिल की। मैट्रिक की पढ़ाई पुंछ में पूरी की और बाद में लाहौर से बी.ए. किया।
स्कूल के ज़माने से ही उन्हें शायरी का शौक़ लग गया था। पढ़ाई के बाद उन्होंने कुछ अरसे तक स्कूलों में उर्दू और फ़ारसी पढ़ाई, मगर उनका असली रुझान सहाफ़त (पत्रकारिता) की तरफ़ था।
जब से तेरा करम है बंदा-नवाज़
सोज़ है सोज़ और न साज़ है साज़
अख़बारों से रिश्ता
1920 में शिमला के एक स्कूल में फ़ारसी उस्ताद की हैसियत से उनकी मुलाक़ात मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से हुई। आज़ाद साहब के अंदाज़ और उनकी सोच से हसरत इतने मुतअस्सिर हुए कि नौकरी छोड़कर उनसे मिलने कलकत्ता जा पहुंचे। यहीं से उन्हें सहाफ़त, सियासत और अदब की गहरी समझ मिली।
1925 में उन्होंने “नई दुनिया” अख़बार जॉइन किया, जहां उन्होंने “कोलंबस” के क़लमी नाम से “कलकत्ते की बातें” नाम का मशहूर कॉलम लिखा। इस कॉलम ने उन्हें रातों-रात शोहरत दिला दी, और मौलाना ज़फ़र अली ख़ान व मुहम्मद अली जौहर जैसे बड़े नाम भी उनके क़ायल हो गए।
क़ुबूल इस बारगह में इल्तिजा कोई नहीं होती
इलाही या मुझी को इल्तिजा करना नहीं आता
इसके बाद उन्होंने “असर-ए-जदीद” में “कूचा गर्द” के नाम से “मताइबात” नाम का मज़ाहिया (हास्य) कॉलम लिखा, जिसने उन्हें एक बेहतरीन हास्य-लेखक के तौर पर भी मशहूर कर दिया।
1926 में उन्होंने कलकत्ते से अपना ख़ुद का अदबी रिसाला “आफ़ताब” निकाला। “इस्तेक़लाल” और “जम्हूर” जैसे अख़बारों के ज़रिए उन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक में भी अपनी आवाज़ शामिल की।
जब से तेरा करम है बंदा-नवाज़
सोज़ है सोज़ और न साज़ है साज़
नेहरू रिपोर्ट का विवाद
1928 में हसरत ने “नेहरू रिपोर्ट” का साथ दिया और इसके हक़ में कई कॉलम लिखे। मगर चूंकि ज़्यादातर मुसलमानों ने इस रिपोर्ट को नामंज़ूर किया था, इसलिए हसरत की यह हिमायत उन्हें मुसलमानों के बीच नाराज़गी का सबब बन गई। नतीजतन उन्होंने कलकत्ता छोड़ दिया और लाहौर आकर ज़फ़र अली ख़ान के अख़बार “ज़मींदार” से जुड़ गए।
लाहौर की ज़िंदगी
1929 में लाहौर पहुंचकर उन्होंने कई अख़बारों के लिए लिखा और 1936 में अपना अख़बार “शीराज़ा” भी शुरू किया। 1940 में वे ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से जुड़ गए।
दूसरी जंग-ए-अज़ीम (द्वितीय विश्व युद्ध) के दौरान वे “फ़ौजी अख़बार” के संपादक भी रहे। इसी दौरान वे ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए और तरक़्क़ी करते हुए मेजर के ओहदे तक पहुंचे। रोज़नामा “इमरोज़” में उन्होंने “सिंदबाद जहाज़ी” के नाम से भी एक मज़ाहिया कॉलम लिखा, जो बहुत पसंद किया गया।
ग़ैरों से कहा तुम ने ग़ैरों से सुना तुम ने
कुछ हम से कहा होता कुछ हम से सुना होता
पाकिस्तान में आमद
बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गए, जहां उन्होंने कई अख़बारों में कॉलम-निगारी जारी रखी और 1950 के दशक की शुरुआत में कुछ अरसे रेडियो पाकिस्तान, लाहौर से भी जुड़े रहे।
हसरत साहब को अक्सर एक जगह ज़्यादा दिन टिककर काम न करने की वजह से “नौकरी बदलने वाला” भी कहा जाता था। आख़िरकार उनकी सेहत गिरने लगी और 26 जून 1955 को लाहौर में उनका इंतक़ाल हो गया।
ज़िंदगी चारा-साज़-ए-ग़म न सही
मौत ही ग़म-गुसार हो जाए
हसरत ने कुल 16 किताबें लिखीं, जिनमें से कुछ मशहूर नाम हैं केले का छिलका, मताइबात, हर्फ़-ओ-हिकायत, दो डॉक्टर और मुर्दा-दीदा। अफ़सोस की बात यह है कि उनकी शायरी का कोई भी मजमुआ (संग्रह) कभी शाया (प्रकाशित) नहीं हो सका।
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