1965 की भारत-पाकिस्तान जंग को अक्सर फौजी कार्रवाई, सरहद पर हुई लड़ाइयों और जीत-हार के तौर पर याद किया जाता है। लेकिन इस जंग के पीछे उन फौजियों की निजी ज़िंदगी भी थी, जिनके लिए जंग सिर्फ़ कुछ दिनों या महीनों का वाकया नहीं थी, बल्कि एक ऐसा तजुर्बा थी, जिसका असर पूरी ज़िंदगी पर पड़ा। लेफ्टिनेंट कर्नल A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) भी ऐसे ही एक फौजी थे। 1965 की जंग शुरू हुई, तब उन्हें सेना में आए करीब एक साल ही हुआ था। उनकी उम्र करीब 22 साल थी और फौजी ज़िंदगी शुरू किए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था।
लेकिन सियालकोट सेक्टर के Phillora (फिल्लौरा) में हुई लड़ाई के दौरान एक गोले के छर्रे ने उनकी ज़िंदगी का रुख ही बदल दिया। गोलाबारी में उनकी बांह बुरी तरह ज़ख्मी हो गई। इलाज की पूरी कोशिश के बावजूद उनकी बांह को बचाया नहीं जा सका और आख़िरकार उसे काटना पड़ा। इसके बाद की कहानी सिर्फ़ एक जंग में लगी चोट से उबरने की कहानी नहीं है। ये उस फौजी की कहानी है, जिसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई, लेकिन जिसने मुश्किल हालात के सामने हिम्मत नहीं छोड़ी और मुल्क की खिदमत का रास्ता नहीं छोड़ा।
1965 से पहले ही सेना में जाने का ख़्वाब बन चुका था
अहलूवालिया का सेना से रिश्ता 1965 की जंग से पहले ही बन चुका था। 1962 की भारत-चीन जंग का असर उस दौर के कई नौजवानों की तरह उन पर भी पड़ा। जंग में देश को मिली शिकस्त ने उनके अंदर कुछ करने का जज़्बा पैदा किया। इसी जज़्बे के साथ उन्होंने नेशनल डिफेंस फंड के लिए चंदा जुटाने में हिस्सा लिया और धीरे-धीरे सेना में जाने का फैसला किया। जब उन्होंने सेना जॉइन की, तब शायद उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि ट्रेनिंग पूरी करने के कुछ ही समय बाद उन्हें असली जंग का सामना करना पड़ेगा। लेकिन एक साल के अंदर ही हालात बदल गए।

1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच जंग शुरू हुई और अहलूवालिया 5/9 गोरखा राइफल्स के साथ सियालकोट सेक्टर पहुंच गए। इस ऑपरेशन में फिल्लौरा एक अहम जगह थी।
यहां जंग सिर्फ़ गोलियों और तोपों की आवाज़ तक सीमित नहीं थी। रातों को अगले दिन की कार्रवाई की तैयारी होती थी। टैंक और बाकी फौजी सामान तैयार किए जाते थे। इसी बीच खाना-पानी से लेकर अपनी हिफाज़त तक, हर चीज़ एक चुनौती बनी हुई थी।
जंग के बीच छोटी-छोटी ज़रूरतें भी बड़ी हो जाती हैं
जंग के दौरान फौजियों तक राशन पहुंचाना भी हमेशा आसान नहीं था। पीछे से आने वाली गाड़ियां कई बार गोलाबारी की चपेट में आ जाती थी और उनके साथ रखा खाना भी बर्बाद हो जाता था। ऐसे में फौजियों को इमरजेंसी राशन के सहारे काम चलाना पड़ता था। कई बार आसपास के गांवों से जो कुछ मिल पाता, उसी से गुज़ारा करना पड़ता था। ऐसे मुश्किल वक़्त में सरहदी इलाकों के लोगों की मदद भी A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) की यादों में ख़ास जगह रखती है। कई परिवारों ने अपने घर का खाना तक फौजियों को दिया। उनके लिए भी ख़तरा था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने फौजियों की मदद करने से पीछे कदम नहीं खींचे।
इसी इलाके का एक और वाकया A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) की यादों में रह गया। एक गांव में पहुंचने पर ज़्यादातर घर खाली मिले। एक बंद घर खोला गया तो अंदर से एक बुज़ुर्ग मौलवी बाहर आए। वो डरे हुए थे और अपनी जान को लेकर परेशान थे। लेकिन फौजियों ने उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया और वहां से जाने दिया। जंग के उस तनाव भरे माहौल में ये वाकया एक अहम बात सामने लाता है—हथियार उठाकर लड़ रहे दुश्मन और आम नागरिक के बीच फर्क बनाए रखना भी जंग का एक अहम हिस्सा है।
Phillora (फिल्लौरा) की वो रात
इन सबके बीच असली मोड़ Phillora (फिल्लौरा) की उस रात आया, जब A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) की प्लाटून आर्मर्ड यूनिट के साथ थी। अगले दिन की कार्रवाई के लिए टैंकों को तैयार किया जा रहा था। रात में टैंकों की सफ़ाई, तकनीकी जांच और गोला-बारूद समेत बाकी तैयारियां चल रही थी। टैंकों की हिफाज़त के लिए फौजी भी वहां मौजूद थे। इसी दौरान दुश्मन की तरफ़ से गोलाबारी शुरू हो गई। एक गोले का छर्रा अहलूवालिया की बांह में जा लगा। चोट इतनी गहरी थी कि काफी खून बहने लगा और वो खुद वहां से निकलने की हालत में नहीं थे।

जब गोलाबारी थोड़ी कम हुई, तो आर्मर्ड कॉर्प्स के एक अफ़सर ने टैंक की मदद से उन्हें वहां से निकाला और इलाज के लिए भेजा। अस्पताल में डॉक्टरों ने उनकी बांह बचाने की पूरी कोशिश की। लेकिन चोट की वजह से नसों और हड्डियों को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंच चुका था। हालात ऐसे हो गए कि अगर बांह नहीं काटी जाती, तो गैंग्रीन की वजह से उनकी जान को खतरा हो सकता था। आख़िरकार उनकी बांह काटनी पड़ी। एक जवान फौजी के लिए ये सिर्फ़ जिस्मानी चोट नहीं थी। रोज़मर्रा की ज़िंदगी, चलने-फिरने और आने वाली ज़िंदगी से जुड़े कई सवाल अब नए सिरे से सामने थे। लेकिन A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) की कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई।
बदली हुई ज़िंदगी के साथ सेना में वापसी
इलाज के बाद A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) का रिश्ता सेना से खत्म नहीं हुआ। उन्हें देहरादून के एक ट्रेनिंग सेंटर में तैनात किया गया, जहां उन्होंने ट्रेनिंग और दफ्तर से जुड़े काम संभाले। नई ज़िंदगी के साथ तालमेल बैठाने में वक़्त लगा। दोपहिया वाहन चलाना उनके लिए मुश्किल था और आने-जाने के लिए कई बार उन्हें अपने साथियों की मदद लेनी पड़ती थी। इस दौर में सेना और उनके साथियों ने भी उनका पूरा साथ दिया। धीरे-धीरे ये नया रूटीन उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। बाद में उन्होंने कार चलाना भी सीखा और अपनी फौजी नौकरी जारी रखी। इस पूरे सफ़र की एक बात ख़ास रही उन्होंने अपनी चोट को अपनी पूरी पहचान नहीं बनने दिया।

पंजाब, फौज और बदलता वक़्त
A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) की यादों में 1965 सिर्फ़ जंग का साल नहीं है। ये पंजाब और फौज के उस रिश्ते की भी एक तस्वीर है, जिसे उन्होंने लंबे वक़्त तक करीब से देखा। उनके मुताबिक, उस दौर में पंजाब के लोगों, ख़ासकर सरहदी इलाकों में रहने वालों का फौज पर गहरा भरोसा था। जंग के दौरान लोगों ने फौजियों की जिस तरह मदद की, उसमें इस रिश्ते की झलक साफ दिखाई देती थी। वो ये भी मानते हैं कि वक़्त के साथ नौजवानों की तरजीहें बदली हैं।
आज पढ़ाई और करियर के मौके पहले के मुकाबले काफी बढ़ गए हैं। नौजवानों के सामने अपने मुस्तकबिल के लिए कई रास्ते हैं। लेकिन उनका मानना है कि अपना करियर बनाते हुए मुल्क के लिए अपनी ज़िम्मेदारी को भी याद रखना चाहिए। 1965 की जंग के बाद उनकी ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रही, लेकिन उनकी ज़िंदगी रुकी भी नहीं। एक बांह खोने के बावजूद फौज में उनकी खिदमत जारी रही।

नई ज़िम्मेदारियां मिली और रोज़मर्रा की मुश्किलों के साथ जीने का एक नया तरीका बना। आज उस जंग को छह दशक से ज़्यादा वक़्त गुज़र चुका है। फिर भी A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) की कहानी 1965 को सिर्फ़ इतिहास का एक वाकया मानकर आगे बढ़ने नहीं देती। इसमें उस दौर के फौजियों की तैयारी, सरहद के लोगों का साथ, जंग की कीमत और उसके बाद की ज़िंदगी सब एक साथ दिखाई देते हैं।
शायद इस कहानी की सबसे अहम बात यही है कि जंग ख़त्म होने के साथ उसका असर ख़त्म नहीं होता। किसी के लिए वो एक याद बन जाती है, किसी के लिए जिस्म पर रह गया एक निशान और किसी के लिए ऐसा मोड़, जो पूरी ज़िंदगी को एक नई दिशा दे देता है। लेफ्टिनेंट कर्नल A.P.S. Ahluwalia (ए.पी.एस. अहलूवालिया) के लिए ये तीनों चीज़ें एक साथ हैं एक याद, एक ज़ख्म और ज़िंदगी बदल देने वाला एक मोड़।
लेख: अभिलाषा अग्रवाल
इस लेख को अंग्रेज़ी और पंजाबी में पढ़ें
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