भारत के फौजी इतिहास में 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग का एक ख़ास मुकाम है। इस जंग के दौरान पंजाब के तरनतारन ज़िले के खेमकरण सेक्टर में हुई आसल उत्ताड़ की लड़ाई भारतीय फौज की बेहतर रणनीति, बहादुरी और अदम्य जज़्बे की मिसाल बनी। खेमकरण से कुछ किलोमीटर दूर बसा आसल उत्ताड़ गांव उस ऐतिहासिक जंग का गवाह बना, जहां भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी फौज के मॉडर्न पैटन टैंकों की बड़ी तादाद को तबाह कर दिया और दुश्मन की आगे बढ़ने की कोशिश को नाकाम कर दिया।
इस जंग से जुड़ा सबसे ख़ास नाम कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) का है। उन्होंने सीमित हथियारों और साधनों के बावजूद बेखौफ़ होकर पाकिस्तानी पैटन टैंकों का सामना किया और देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सबसे बड़े युद्ध के सम्मान परमवीर चक्र से नवाज़ा गया। Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की शहादत आज भी भारतीय फौज के इतिहास में वतन से मोहब्बत, फर्ज़ और कुर्बानी की एक मिसाल के तौर पर याद की जाती है।
आसल उत्ताड़ की धरती पर छिड़ी जंग
1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद पाकिस्तानी फौज ने पंजाब के खेमकरण सेक्टर की तरफ़ बड़ा हमला किया। उस वक़्त पाकिस्तान के पास अमेरिका से मिले मॉडर्न पैटन टैंक थे। उस दौर में इन टैंकों को काफी ताकतवर माना जाता था। पाकिस्तानी फौज को उम्मीद थी कि इन भारी टैंकों के सहारे वो खेमकरण इलाके को पार करके भारतीय सीमा के अंदर काफी दूर तक आगे बढ़ सकेगी।
भारतीय फौज ने दुश्मन की इस योजना को समझ लिया और अपनी रणनीति में बदलाव किया। खेमकरण के आसपास के इलाके में पानी और खेतों की हालत को ही फौज ने अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किया। खेतों में पानी भरने और ज़मीन के गीली होने से भारी पैटन टैंकों के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। भारतीय फौज ने दुश्मन के टैंकों को ऐसे इलाके में आने दिया, जहां वो अपनी पूरी ताकत के साथ आगे नहीं बढ़ सकते थे।

इसके बाद भारतीय जवानों ने अलग-अलग दिशाओं से पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाना शुरू किया। लड़ाई इतनी ज़बरदस्त थी कि कुछ ही वक़्त में मैदान में कई पैटन टैंक तबाह हो गए। इसी वजह से आसल उत्ताड़ का ये इलाका बाद में ‘पैटन टैंकों की कब्रगाह’ के नाम से मशहूर हो गया।
अब्दुल हमीद—सादगी से बहादुरी की बुलंदी तक
Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की पैदाइश 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले के धामूपुर गांव में हुई थी। उनके वालिद का नाम उस्मान मोहम्मद था। एक साधारण परिवार में जन्मे अब्दुल हमीद ने ज़िंदगी के शुरुआती दौर में ही मेहनत, अनुशासन और ज़िम्मेदारी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया था।
वो 27 सितंबर 1954 को भारतीय फौज की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती हुए। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने 4 ग्रेनेडियर्स में अपनी सेवा शुरू की। फौज में अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने अलग-अलग इलाकों में तैनात रहकर देश की खिदमत की। Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) सिर्फ़ एक बहादुर सिपाही ही नहीं थे, बल्कि अपने साथियों के बीच अनुशासन, सादगी और फर्ज़ के प्रति लगन के लिए भी जाने जाते थे। उनके लिए फौजी वर्दी सिर्फ़ नौकरी नहीं थी, बल्कि वतन के लिए एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी।

10 सितंबर 1965—बहादुरी का ऐतिहासिक दिन
आसल उत्ताड़ की जंग के दौरान Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की बहादुरी अपने चरम पर पहुंच गई। उनके पास एक जीप पर लगी 106 मिलीमीटर की रीकॉयलेस राइफल थी, जबकि सामने पाकिस्तानी फौज के भारी पैटन टैंक थे। ताकत के मामले में दुश्मन के पास कहीं ज़्यादा मज़बूत टैंक थे, लेकिन अब्दुल हमीद के हौसले और सटीक निशाने ने इस मुश्किल मुकाबले का रुख बदल दिया।
उन्होंने जंग के मैदान की भौगोलिक स्थिति का पूरा फ़ायदा उठाया। वो अपनी जीप को ऐसी जगह ले गए, जहां से पैटन टैंकों पर निशाना लगाना मुमकिन था। जैसे ही दुश्मन के टैंक उनकी मार के दायरे में आए, Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) ने बेखौफ़ होकर उन पर हमला कर दिया।
उनकी सटीक निशानेबाजी से पाकिस्तानी फौज के कई टैंक तबाह हुए। भारतीय फौज के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी बहादुरी के दौरान तीन पैटन टैंकों को तबाह करने का ज़िक्र मिलता है। उनकी कार्रवाई से दुश्मन की आगे बढ़ने की रफ़्तार को बड़ा झटका लगा और भारतीय जवानों का हौसला और बुलंद हुआ।
Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) जानते थे कि वो बहुत बड़े ख़तरे का सामना कर रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटना मंज़ूर नहीं किया। वो लगातार दुश्मन के टैंकों को निशाना बनाते रहे। आख़िरकार 10 सितंबर 1965 को जंग के दौरान वो घायल हुए और देश की हिफाज़त करते हुए शहीद हो गए।
उनकी शहादत ने भारतीय फौज के इतिहास में बहादुरी और कुर्बानी की एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज भी याद किया जाता है। Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की बहादुरी और बड़ी कुर्बानी को देश ने सलाम किया। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सबसे बड़े सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाज़ा। ये सम्मान उनकी बहादुरी की पहचान बना और उनका नाम उन वीर जवानों में शामिल हो गया, जिन्होंने देश की हिफाज़त के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
आसल उत्ताड़ और उसके आसपास का इलाका आज भी Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की शहादत की याद को संभाले हुए है। चीमा गांव के पास उनकी याद में एक स्मारक बनाया गया है। ये जगह सिर्फ़ Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की यादगार नहीं, बल्कि 1965 की जंग में देश के लिए जान कुर्बान करने वाले तमाम सैनिकों को याद करने की जगह भी है।
यहां आने वाले लोगों के लिए ये जगह इतिहास की एक खुली किताब जैसी है। यादगार में रखे गए जंग के सामान और पैटन टैंक की नुमाइश आसल उत्ताड़ की जंग की याद दिलाती है और उस दौर में भारतीय फौज के सामने आई चुनौतियों को समझने का मौका देती है।
इस जगह की एक ख़ास बात ये भी है कि यहां अलग-अलग मज़हब और समुदायों से जुड़े लोग Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) को श्रद्धा से याद करने पहुंचते हैं। उनकी शहादत को लोग मज़हब और जाति की हदों से ऊपर उठकर वतन के लिए दी गई कुर्बानी के तौर पर देखते हैं। यही जज़्बा इस यादगार को आपसी भाईचारे और राष्ट्रीय एकता की एक मिसाल बनाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दी श्रद्धांजलि
11 नवंबर 2015 को दिवाली के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंजाब के सरहदी इलाके में तैनात जवानों के साथ दिवाली मनाई थी। इस दौरान उन्होंने शहीद Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) की यादगार पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। इस मौके पर इस ऐतिहासिक जगह की अहमियत एक बार फिर सामने आई और यादगार के विकास पर भी ध्यान दिया गया। इसके बाद आसल उत्ताड़ और अब्दुल हमीद की शहादत की कहानी देश के अलग-अलग हिस्सों तक और ज़्यादा पहुंची।
बताते चलें कि हर साल 10 सितंबर को अब्दुल हमीद की शहादत की बरसी पर आसल उत्ताड़ और चीमा इलाके में खास श्रद्धांजलि कार्यक्रम होते हैं। इन कार्यक्रमों में शहीद के परिवार के लोगों के साथ पूर्व सैनिक, फौजी अफ़सर, स्थानीय लोग और देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोग शामिल होते हैं।
इस मौके पर शहीदों को फूल-मालाएं चढ़ाई जाती हैं और उनकी कुर्बानियों को याद किया जाता है। स्कूलों और दूसरी संस्थाओं के स्टूडेंट्स को भी 1965 की जंग और अब्दुल हमीद की बहादुरी के बारे में बताया जाता है, ताकि नई पीढ़ी अपने देश के इतिहास और सैनिकों की कुर्बानियों से वाकिफ़ हो सके।
आसल उत्ताड़ की ज़मीन आज सिर्फ़ 1965 की जंग की याद नहीं है। ये भारतीय सैनिकों के हौसले और जंग के दौरान अपनाई गई रणनीति की भी मिसाल है। ‘पैटन टैंकों की कब्रगाह’ के नाम से मशहूर ये इलाका याद दिलाता है कि जंग सिर्फ़ हथियारों की ताकत से नहीं लड़ी जाती। इसके लिए हौसला, अनुशासन, सही रणनीति और वतन के लिए पूरी लगन भी ज़रूरी होते हैं।

अब्दुल हमीद इस बात की एक बड़ी मिसाल हैं। उनके पास दुश्मन के मुकाबले बड़े और ज़्यादा ताकतवर हथियार नहीं थे, लेकिन उनके हौसले ने उन्हें मुश्किल हालात में भी डटे रहने की ताकत दी। कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की शहादत भारतीय इतिहास का वो सुनहरा पन्ना है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी कहानी हमें बताती है कि देश की हिफाज़त करने वाले सैनिक के लिए वतन की सुरक्षा सबसे बड़ा फर्ज़ होता है।
आसल उत्ताड़ के खेतों में लड़ी गई वो जंग आज भी भारतीय फौज की बहादुरी की गवाही देती है। पैटन टैंकों की कब्रगाह बनी ये ज़मीन और अब्दुल हमीद की यादगार आने वाली पीढ़ियों को ये याद दिलाती रहेगी कि देश की हिफाज़त के लिए दी गई कुर्बानी कभी बेकार नहीं जाती।
Abdul Hamid (अब्दुल हमीद) जैसे जांबाज़ आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहादुरी, उनका जज़्बा और उनकी कुर्बानी लोगों की यादों में हमेशा ज़िंदा रहेगी। आसल उत्ताड़ की मिट्टी में लिखी अब्दुल हमीद की शहादत की ये कहानी भारत के फौजी इतिहास में हमेशा फख्र और सम्मान के साथ याद की जाती रहेगी।
लेख: गुरप्रीत सिंह
इस लेख को अंग्रेज़ी और पंजाबी में पढ़ें
ये भी पढ़ें: वीर अब्दुल हमीद बने NCERT के पाठ्यक्रम का हिस्सा
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं



