आग़ा हश्र काश्मीरी को यूं ही “उर्दू का शेक्सपियर” नहीं कहा जाता। इस लक़ब (उपाधि) के पीछे सालों की मेहनत, अटूट जुनून और एक ऐसी तख़लीक़ी शक्ति छुपी है, जिसने उर्दू थिएटर को वह मुक़ाम बख़्शा, जो आज तक मिसाल की तरह याद किया जाता है। उनका नाम सुनते ही उर्दू ड्रामे की पूरी एक सदी आंखों के सामने घूम जाती है।
पैदाइश और शुरुआती ज़िंदगी
आग़ा हश्र का असल नाम आग़ा मुहम्मद शाह था। उनके वालिद ग़नी शाह कारोबार के सिलसिले में कश्मीर से बनारस आए थे और फिर वहीं के होकर रह गए। 3 अप्रैल 1879 को बनारस के मुहल्ला गोविंद कलां, नारियल बाज़ार में आग़ा हश्र की पैदाइश हुई। एक ऐसे शहर में, जो ख़ुद सदियों से इल्म और तहज़ीब का गहवारा रहा है।
बचपन में उन्होंने अरबी-फ़ारसी की तालीम हासिल की और क़ुरआन मजीद के सोलह पारे हिफ़्ज़ भी कर लिए (यानी ज़बानी तौर पर याद)। यह उस ज़माने के लिए एक बड़ी बात थी। इसके बाद एक मिशनरी स्कूल जय नारायण में दाख़िला हुआ, मगर रटी-रटाई किताबी पढ़ाई में उनका दिल नहीं लगा। शायद इसलिए कि उनके अंदर तो कुछ और ही लिखा जाना बाक़ी था। कुछ ऐसा, जो दरसी किताबों के सफ़्हों में समा ही नहीं सकता था।
गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है
होता है पहरों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से
शायरी और ड्रामे का शौक़
बचपन से ही ड्रामा और शायरी से गहरा लगाव था। महज़ 17 साल की छोटी सी उम्र से शेर कहने लगे, और सिर्फ़ 18 साल की उम्र में “आफ़ताब-ए-मुहब्बत” नाम से अपना पहला ड्रामा लिखा। एक ऐसी उम्र में, जब ज़्यादातर लोग अभी अपनी राह ही तलाश रहे होते हैं।
हश्र में इंसाफ़ होगा बस यही सुनते रहो
कुछ यहां होता रहा है कुछ वहां हो जाएगा
एक दिलचस्प वाक़िया भी इसी दौर से जुड़ा है। जब यह ड्रामा उस वक़्त के मशहूर उस्ताद मुंशी अहसन लखनवी को दिखाया गया, तो उन्होंने तंज़न कह दिया कि “ड्रामानिगारी बच्चों का खेल नहीं है।” मगर नौजवान हश्र ने इस बात को दिल पर लेने के बजाय एक चुनौती के तौर पर क़बूल किया। और फिर तारीख़ गवाह है उन्होंने अपनी सृजनशक्ति और मेहनत से वह मुक़ाम हासिल किया कि आज उर्दू ड्रामे की तारीख़ उनके बग़ैर मुकम्मल ही नहीं हो सकती।
तुम और फ़रेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से
तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से
बॉम्बे का सफ़र और शोहरत की बुलंदी
18 साल की उम्र में आग़ा हश्र बॉम्बे चले गए और वहां न्यू अल्फ्रेड थियेट्रिकल कंपनी से महज़ 15 रुपये माहवार की मामूली तनख़्वाह पर बतौर ड्रामा-निगार अपना सफ़र शुरू किया। उनका पहला काम शेक्सपियर के “द विंटर्स टेल” का उर्दू रूपांतरण था, जो इतना कामयाब साबित हुआ कि उनकी तनख़्वाह बढ़कर 40 रुपये माहवार हो गई। उस दौर के हिसाब से यह एक बड़ी तरक़्क़ी थी।
आग़ा हश्र की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि वह अपने ड्रामों में मुहावरों और शायराना रंग के साथ-साथ छोटे-छोटे गीत और असरदार संवाद बड़ी ख़ूबसूरती से पिरो देते थे। यही वजह थी कि उनके लिखे नाटक महज़ कहानी नहीं, बल्कि तमाशाई के लिए एक मुकम्मल जज़्बाती तजुर्बा बन जाते थे।
शेक्सपियर के रंग में ढले नाटक
आग़ा हश्र ने शेक्सपियर के कई मशहूर ड्रामों को उर्दू का जामा पहनाया, जिनमें शामिल हैं:
- शहीद-ए-नाज़ (Measure for Measure, 1902)
- सैद-ए-हवस
- सफ़ेद ख़ून
- ख़्वाब-ए-हस्ती
इनके अलावा उन्होंने रामायण और महाभारत जैसी देसी दास्तानों पर भी नाटक लिखे, जिनमें “सीता बनबास” ख़ासा मक़बूल हुआ। “यहूदी की लड़की” (1913) तो उनका सबसे बड़ा कारनामा साबित हुआ। इतना असरदार कि बरसों बाद इस पर फ़िल्में भी बनीं, जिनमें दिलीप कुमार, मीना कुमारी और सोहराब मोदी अभिनीत “यहूदी” (1958) भी शामिल है।
उनके दूसरे मक़बूल कामों में “बिल्व मंगल” (एक शायर की ज़िंदगी पर मबनी सामाजिक ड्रामा), “आंख का नशा” और फ़ारसी दास्तान पर मबनी “रुस्तम-ओ-सोहराब” जैसे नाटक शामिल हैं। अपने करियर के आख़िरी दौर में उन्होंने ख़ुद की शेक्सपियर थियेट्रिकल कंपनी भी बनाई, मगर यह ज़्यादा अर्से तक चल न सकी।
आग़ा हश्र ने मुख़्तार बेगम से शादी की, जो कलकत्ता की एक मशहूर शास्त्रीय गायिका थीं और पाकिस्तानी गायिका फ़रीदा ख़ानम की बड़ी बहन भी थीं। यह रिश्ता उस दौर के फ़नकारों की एक अलग ही दुनिया की झलक दिखाता है।
आख़िरी सफ़र और विरासत
28 अप्रैल 1935 को लाहौर में आग़ा हश्र काश्मीरी इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। उनके क़रीबी दोस्त और हमअस्र हकीम अहमद शुजा ने अपने अदबी संस्मरणों में उनका तफ़सील से ज़िक्र किया है। दोनों ने मिलकर कई नाटकीय परियोजनाओं पर काम किया था, और यह दोस्ती उस दौर के अदबी हलक़ों में मिसाल समझी जाती थी।
आग़ा हश्र की शायरी और उनके नाटकों का असर आज भी क़ायम है उनके अशआर आज भी उतनी ही शिद्दत से महसूस किए जाते हैं, जितने अपने दौर में थे। यही तो असली फ़नकार की पहचान है जो वक़्त के साथ फ़ना नहीं होता, बल्कि और निखरता चला जाता है।
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