उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ शख़्सियतें ऐसी होती हैं जिनकी ज़िंदगी ख़ुद एक दास्तान होती है मुश्किलों से गुज़रते हुए, ठोकरें खाते हुए, मगर अदब की मोहब्बत में सरशार। अब्र अहसानी गुन्नौरी भी ऐसी ही एक शख़्सियत थे, जिन्होंने अपनी शायरी और अपने शागिर्दों के ज़रिए उर्दू अदब को एक नई पहचान दी।
पैदाइश और शुरुआती ज़िंदगी
अब्र अहसानी गुन्नौरी का असली नाम अहमद बख़्श था। उनकी पैदाइश 1897 में गुन्नौर, ज़िला बदायूं, उत्तर प्रदेश में हुई। उनके वालिद नबी बख़्श गुन्नौर के एक ज़मींदार थे, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था बचपन ही में अब्र के सर से वालिद का साया उठ गया। घर के हालात ने उन्हें वक़्त से पहले ही ज़िम्मेदार बना दिया, और बुनियादी तालीम हासिल करने के फ़ौरन बाद ही उन्हें घर चलाने के लिए काम की तलाश में निकलना पड़ा।
मेहनत की राह से अदब तक का सफ़र
कानपुर की एक जूता फैक्ट्री में मज़दूरी करते हुए अब्र की मुलाक़ात मुंशी सख़ावत हुसैन “सखा” शाहजहांपुरी से हुई। यह मुलाक़ात उनकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ साबित हुई, क्योंकि मुंशी सखा की सोहबत में रहकर उन्होंने अपनी शायरी को निखारना शुरू किया। इसके बाद कुछ अरसे तक उन्होंने छोटे-मोटे कारोबार और कामकाज भी आज़माए, मगर दिल हमेशा इल्म और अदब की तरफ़ ही खिंचा रहा। आख़िरकार वह दोबारा तालीम हासिल करने की तरफ़ लौट आए और अरबी-फ़ारसी में उच्च शिक्षा हासिल की।
इश्क़ में और भी दीवाना बना देती है
मेरी आवाज़ में मिल कर तिरी आवाज़ मुझे
मुलाज़मत और रामपुर की तरफ़ रुख़
तालीम मुकम्मल करने के बाद उन्हें डिस्ट्रिक्ट बोर्ड में नौकरी मिली, और वह 1947 तक बदायूं ज़िले के अलग-अलग मदरसों में तालीम देते रहे। मुल्क की तक़सीम (बंटवारे) के बाद वह रामपुर चले गए, जहां मदरसा आलिया ओरिएंटल कॉलेज में उर्दू और फ़ारसी के उस्ताद मुक़र्रर हुए। यहीं उन्होंने 1947 से 1953 तक माहनामा “अहसन” रामपुर का इदारती फ़र्ज़ भी बख़ूबी निभाया। 1953 में रिटायरमेंट के बाद वह वापस अपने वतन गुन्नौर लौट आए, जहां उनकी ज़िंदगी का सबसे ज़रख़ेज़ अदबी दौर शुरू हुआ।
शायरी का सफ़र
अब्र अहसानी की शायरी का आग़ाज़ महज़ नौ साल की उम्र में हुआ, जब उन्होंने अपनी पहली “नात” ग़ज़ल की सूरत में लिखी। शुरुआत में वह मुंशी सख़ावत हुसैन से इस्लाह लेते रहे, बाद में मशहूर शायर अहसन मारहरवी के शागिर्द हो गए, जो ख़ुद दाग़ देहलवी के शागिर्द थे। इस तरह अब्र अहसानी का सिलसिला-ए-उस्तादी क्लासिकी उर्दू शायरी की एक मज़बूत रिवायत से जुड़ता है।
शायद इस बात पे लब मेरे सिए जाते हैं
आह के साथ निकल जाए न अरमां कोई
रिटायरमेंट के बाद गुन्नौर में उन्होंने 100 से ज़्यादा शायरों को अपनी शागिर्दी में लिया और उन्हें शायरी की बारीकियां सिखाईं। उनके शागिर्दों में फ़रीद सिद्दीक़ी रामपुरी, शौक़ असरी रामपुरी, तसख़ीर फ़हमी, मसूदा हयात, प्रकाश नाथ परवेज़, सैफ़ी प्रेमी और उनवान चिश्ती जैसे नाम शामिल हैं।
अब्र अहसानी की शायरी के तीन मजमुए शाया हुए “नगीने” (1952), “क़रीने” (1963) और “ख़ज़ीने” (1971)। इसके अलावा नज़्मों का एक मजमुआ “सफ़ीने” 1952 में छपा। उन्होंने तनक़ीद (आलोचना) के मैदान में भी अपना लोहा मनवाया। उनकी किताब “इस्लाह-उल-इस्लाह” (1949), जो सीमाब अकबराबादी की “दस्तूर-उल-इस्लाह” (1940) के जवाब में लिखी गई थी, उन्हें उर्दू अदब की दुनिया में रातों-रात मशहूर कर गई। बाद में उन्होंने “मेरी इस्लाहें” नाम से दो जिल्दों में एक और अहम तनक़ीदी काम पेश किया, जिसकी पहली जिल्द 1956 में और दूसरी 1966 में शाया हुई।
तुम क्यों उदास हो गए मैदान-ए-हश्र में
कह दो तो दिल की दिल में मिरी दास्तां रहे
एक अनसुलझा राज़
अब्र अहसानी गुन्नौरी की ज़िंदगी का आख़िर भी उतना ही रहस्यमयी था जितना दिलचस्प उनका सफ़र था। 7 नवंबर 1973 की रात उनका क़त्ल कर दिया गया। न क़ातिल का सुराग़ मिला, न इस संगीन जुर्म की कोई वजह सामने आई। यह मामला आज तक एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। एक ऐसे शायर की मौत, जिसने अपनी ज़िंदगी अदब और शागिर्दों की परवरिश में गुज़ार दी, इस तरह गुमनामी के साये में दब गई। यह उर्दू अदब की दुनिया के लिए एक बड़ा अफ़सोसनाक और नामुकम्मल बाब है।
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