उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी पहचान सिर्फ़ शायरी तक महदूद नहीं रहती, बल्कि उनका पूरी ज़िंदगी ही ज़ुबान, तहज़ीब और इल्म की ख़िदमत में गुज़रता है। अज़रा नक़वी भी ऐसी ही एक शख़्सियत हैं। वे एक मशहूर उर्दू शायरा, अफ़साना निगार (कहानीकार), मुतर्जिम (अनुवादक) और अदबी सरगर्मियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली सक्रिय अदबी कारकुन(साहित्यिक कार्यकर्ता) है।
दिलचस्प बात यह है कि 73 साल की उम्र में भी अज़रा नक़वी उसी ताज़गी और इत्मीनान के साथ ज़िंदगी बसर कर रही हैं। कुछ साल पहले अपने हमसफ़र को खो देने के बावजूद उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। आज वे नोएडा में रहती हैं और पूरे शौक़ और शिद्दत के साथ अल्फ़ाज़ की अपनी दिलकश दुनिया में मशगूल हैं।
उनकी आवाज़ में ऐसी गरमाहट और ज़िंदगी की रवानी है कि सुनने वाला भी अल्फ़ाज़ की उस दिलकश दुनिया में खुद-ब-खुद खो सा जाता है।
“बचपन कितना प्यारा था जब दिल को यक़ीं आ जाता था
मरते हैं तो बन जाते हैं आसमान के तारे लोग”
किताबों और अदब के बीच
अज़रा नक़वी का बचपन एक ऐसे घर में गुज़रा जहां किताबों और इल्म की बहुत कद्र थी। उनके परिवार में पढ़ने-लिखने का माहौल था और यही माहौल आगे चलकर उनकी शख़्सियत की बुनियाद बना। उनकी मां एक पढ़ी-लिखी और ज़हीन महिला थीं, जो अक्सर उर्दू में अनूदित क्लासिक पढ़ा करती थीं। घर में साहित्य और भाषा पर चर्चा होती रहती थी।
अज़रा नक़वी बताती हैं कि बचपन में ही उन्हें किताबों से गहरा लगाव हो गया था। यही वजह थी कि धीरे-धीरे शब्दों और शायरी की दुनिया उन्हें अपनी तरफ़ खींचने लगी। उनका पारिवारिक रिश्ता भी शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा रहा। उनके नाना जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक थे। इस तरह अज़रा नक़वी के जीवन में शिक्षा और अदब की विरासत पहले से मौजूद थी।
अलीगढ़ का दौर और तालीम
अज़रा नक़वी के पिता की नौकरी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में थी। इसी वजह से साल 1957 में उनका परिवार अलीगढ़ आकर बस गया। अलीगढ़ का माहौल उस दौर में भी तालीम और सक़ाफ़त का अहम केंद्र माना जाता था। यही माहौल अज़रा नक़वी के व्यक्तित्व को और निखारने में मददगार बना।
उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई अब्दुल्ला गर्ल्स हाई स्कूल से की, जो आज एएमयू का हिस्सा है। स्कूल के दिनों में ही उनकी रुचि साहित्य और भाषाओं की ओर बढ़ने लगी थी। वे पढ़ाई के साथ-साथ कविता और लेखन में भी दिलचस्पी लेने लगीं।
विज्ञान की पढ़ाई, लेकिन दिल उर्दू में
दिलचस्प बात यह है कि अज़रा नक़वी ने अपनी तालीम का सफ़र विज्ञान के मैदान में तय किया। पारिवारिक दबाव और हालात के चलते उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से एडेप्टिव बायोलॉजी में एमफिल की डिग्री हासिल की।
मगर इसके बावजूद उनका दिल हमेशा उर्दू अदब के क़रीब ही रहा।
खुद अज़रा नक़वी इस बारे में कहती हैं “हालांकि मुझे फ़्रेंच ज़बान से भी बेहद मोहब्बत है, जिसे मैंने कनाडा में रहते हुए सीखा, लेकिन मैं सोचता उर्दू में हूं, महसूस उर्दू में करता हूं और अपने जज़्बात को सबसे बेहतर उर्दू में ही बयान कर पाता हूं।”
यही उर्दू से उनका वह गहरा और रूहानी रिश्ता है, जो उनकी पूरी ज़िंदगी और शख़्सियत में साफ़ झलकता है।
शादी और दुनिया का सफ़र
साल 1976 में, जब अज़रा नक़वी क़रीब पच्चीस साल की थीं, उनकी शादी एक कंप्यूटर साइंटिस्ट से हुई। शादी के बाद उनकी ज़िंदगी कई मुल्कों के सफ़र से गुज़री। वे अपने शौहर के साथ इराक़ और कनाडा जैसे देशों में रहीं और वहां के अलग-अलग समाजों और तहज़ीबों को क़रीब से देखा।
दिलचस्प बात यह है कि पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने वहां एक किंडरगार्टन (बालवाड़ी) में बच्चों को पढ़ाने का काम भी किया। यह दौर उनके लिए सीखने और समझने का एक अहम मरहला साबित हुआ।
सामाजिक काम और महिलाओं को सशक्त बनाना
अज़रा नक़वी सिर्फ़ शायरी तक महदूद नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने सामाजिक और इंसानी सरोकारों के मैदान में भी अहम काम किए।
कनाडा में अपने 12 साल के क़याम के दौरान उन्होंने दक्षिण एशियाई ख़वातीन के साथ मिलकर काम किया। उन्होंने इन महिलाओं को फ़्रेंच ज़बान सिखाई और साथ ही टैक्स लिटरेसी के बारे में भी जागरूक किया, ताकि वे कनाडा के सामाजिक और प्रशासनिक निज़ाम को बेहतर तरीक़े से समझ सकें।
इसके अलावा उन्होंने रियाद की किंग सऊद यूनिवर्सिटी के साथ भी काम किया और अलग-अलग शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया।
दिल हमेशा उर्दू के साथ
दुनिया के कई मुल्कों में रहने, अलग-अलग पेशों और तजुर्बों से गुज़रने के बावजूद अज़रा नक़वी का दिल हमेशा उर्दू ज़बान के साथ ही धड़कता रहा। वे उर्दू को सिर्फ़ एक ज़बान नहीं बल्कि अपनी पहचान, अपनी सांस और अपने ख़ून में बसी हुई तहज़ीब मानती हैं।
उनकी शायरी में भी यह मोहब्बत साफ़ झलकती है। उनके एक शेर में यह एहसास कुछ यूं सामने आता है
आने वाले कल की ख़ातिर हर पल क़ुर्बान किया
हाल को दफ़्ना देते हैं हम जीने की तैयारी में
रेख़्ता फ़ाउंडेशन से जुड़ाव
साल 2017 में जब अज़रा नक़वी दिल्ली लौटीं तो उन्हें अपने शौक़ और रुचि के मुताबिक़ एक नया मौक़ा मिला। वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन से जुड़ गईं और वहां सलाहकार संपादक (Consulting Editor) के तौर पर काम करने लगीं।
BANAT : ख़वातीन अदबी तंज़ीम
अज़रा नक़वी का एक और अहम कारनामा है BANAT (बैनलक़वामी निस्साई अदबी तंजीम)। यह क़रीब दो सौ उर्दू महिला लेखिकाओं का एक अदबी मंच है, जो अपनी तरह की अनोखी पहल मानी जाती है।
अज़रा नक़वी इस तंज़ीम की बानी अरकान (संस्थापक सदस्यों) में से एक हैं और इस वक़्त इसकी नायब सदर (Vice President) की ज़िम्मेदारी निभा रही हैं।
BANAT व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के ज़रिये महिला लेखिकाओं को जोड़ने, उनकी तहरीरों को सामने लाने और एक मज़बूत अदबी बिरादरी तैयार करने का काम कर रही है।
किताबें और अदबी ख़िदमत
अज़रा नक़वी ने उर्दू ज़बान को आसान और दिलचस्प अंदाज़ में लोगों तक पहुंचाने के लिए कई अहम किताबें भी लिखी हैं।
1. उर्दू शब्दों का गुलदस्ता
यह किताब उर्दू लफ़्ज़ों और उनकी सही समझ को आसान बनाने के लिए लिखी गई है। इसमें सलाम-दुआ, मोहब्बत, रिश्ते, बाज़ार, सफ़र, रंग, घर-गृहस्थी और शायरी जैसे कई मौज़ुओं पर लफ़्ज़ों का ख़ज़ाना पेश किया गया है। इस किताब के ज़रिये पाठक उर्दू के सही उच्चारण, वर्तनी और बुनियादी व्याकरण को भी समझ सकते हैं।
2. उर्दू शायरी का शब्द संसार
यह किताब उर्दू शायरी की दुनिया को समझने का एक ख़ूबसूरत ज़रिया है। इसमें अलग-अलग मौज़ुओं पर चुनिंदा शेरों के ज़रिये उर्दू के अहम लफ़्ज़ों, तर्ज़-ए-बयान और उनके मआनी को बड़े दिलचस्प अंदाज़ में समझाया गया है।
शायरी का अंदाज़
अज़रा नक़वी की शायरी में सादगी, एहसास की गहराई और इंसानी जज़्बात की गर्मी साफ़ महसूस होती है।
फैलते हुए शहरो अपनी वहशतें रोको
मेरे घर के आँगन पर आसमान रहने दो
हक़ीक़तें तो मिरे रोज़-ओ-शब की साथी हैं
मैं रोज़-ओ-शब की हक़ीक़त बदलना चाहती हूं
उलझे-उलझे रेशम की डोर से बंधे रिश्ते
हर घड़ी मोहब्बत का इम्तिहान रहने दो
अज़रा नक़वी की ज़िंदगी सिर्फ़ एक शायरा की कहानी नहीं, बल्कि ज़बान, तहज़ीब और इल्म से मोहब्बत की एक ख़ूबसूरत दास्तान है। उन्होंने विज्ञान पढ़ा, दुनिया के कई मुल्क देखे, अलग-अलग पेशों में काम किया, मगर उनके दिल की धड़कन हमेशा उर्दू अदब के लिए धड़कती रही।
आज भी 70 से ज़्यादा बरस की उम्र में वे पूरे जज़्बे के साथ उर्दू की ख़िदमत में लगी हुई हैं और नई नस्ल को इस ख़ूबसूरत ज़बान से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। यही वजह है कि अज़रा नक़वी का नाम उर्दू शायरी की दुनिया में इज़्ज़त, मोहब्बत और एहतिराम के साथ लिया जाता है।
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