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असदुद्दीन ओवैसी: जब देश पर हमला हो, तो सियासत नहीं, एकता ज़रूरी 

पहलगाम में जो कुछ हुआ, वो सिर्फ़ एक हमला नहीं था वो एक ज़ख़्म था जो पूरे मुल्क की छाती पर लगा। 26 मासूम जिंदगियां, जो लौटकर कभी अपने घरों को न पहुंच सकीं। इस दिल दहला देने वाले वाक़ये के बाद जहां पूरा मुल्क ग़मगीन था, वहीं राजनीति के गलियारों में सन्नाटा भी था, पर इस सन्नाटे को तोड़ा AIMIM के सरबराह असदुद्दीन ओवैसी ने, और इस अंदाज़ में तोड़ा कि उनके आलोचक भी उनके बयान को सलाम करने लगे।

इस बार ओवैसी ने वो रुख़ अपनाया जो शायद कुछ वक़्त पहले तक उनसे तवक़्क़ो नहीं की जाती थी। उन्होंने न सिर्फ़ पाकिस्तान की खुलकर मुख़ालफ़त की, बल्कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को एक ज़रूरी और साहसिक क़दम बताया। उन्होंने साफ़ कहा: “अगर आप आतंकवादी भेजते रहेंगे तो कोई भी देश चुप नहीं बैठेगा।” और यहीं से एक नई सियासी नज़ीर क़ायम होती है कि जब बात वतन की हो, तो हर फ़र्क़ से ऊपर सिर्फ़ मुल्क होता है।

असदुद्दीन ओवैसी का ये बयान कि पाकिस्तान एक “ऑफिशियल भिखमंगा” है, न सिर्फ़ उनकी बेबाक़ी का सबूत है बल्कि ये भी दिखाता है कि वो पाकिस्तान के दोहरे रवैये को बेनक़ाब करने में कोई परहेज़ नहीं रखते। उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि “यूनाइटेड नेशंस चार्टर का अनुच्छेद 51 और भारत के संविधान का अनुच्छेद 355 हमें आत्मरक्षा का पूरा हक़ देता है।” ओवैसी के इन शब्दों में न सियासत थी, न दिखावा सिर्फ़ एक भारतीय की आवाज़ थी, जो अपने देश के ज़ख़्मों से बुरी तरह घायल था।

उन्होंने सरकार के ऑपरेशन सिंदूर के फ़ैसले को न सिर्फ़ सराहा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के पक्ष को मज़बूती से रखने के लिए कई अहम सुझाव दिए। उन्होंने मांग की कि TRF (The Resistance Front), जिसने पहलगाम हमले की ज़िम्मेदारी ली थी, उस पर अमेरिका और ब्रिटेन जैसे भारत के रणनीतिक साझेदारों के ज़रिये प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने कहा, “TRF दरअसल लश्कर-ए-तैयबा का ही दूसरा चेहरा है, और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक आतंकी संगठन घोषित किया जाना चाहिए।”

जब बात वतन की हो, तो सियासत नहीं एकजुटता चाहिए

इतना ही नहीं, ओवैसी ने वक़्फ़ एक्ट जैसे घरेलू मामलों में सरकार से मतभेद ज़ाहिर करने के बावजूद साफ़ कहा कि “ये देश का अंदरूनी मामला है। लेकिन जब देश पर बाहर से हमला हो, तो हमें सियासी सोच से ऊपर उठकर एकजुट होना चाहिए।” उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी इस कानून के ख़िलाफ़ कानूनी लड़ाई जारी रखेगी, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो विरोध को दरकिनार कर देना ज़रूरी है।

मज़हब से ऊपर देश: ओवैसी की आवाज़ में एकता का पैग़ाम

एक और बेहद अहम बात जो ओवैसी ने सर्वदलीय बैठक में उठाई  वो थी इस संकट की घड़ी में देश को एकजुट रखने की। उन्होंने हिमांशी नरवाल का ज़िक्र किया, जो अपने पति को इस हमले में खो चुकी थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने नफ़रत के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की। ओवैसी ने कहा, “हमें इस वक़्त उन तत्वों से भी सतर्क रहना होगा जो इस हमले को बहाना बनाकर समाज में दरारें पैदा करना चाहते हैं।”

ओवैसी का  बेबाक रवैया आज उनकी पहचान बनता जा रहा है  जहां वो सरकार की आलोचना भी करते हैं, लेकिन जब बात वतनपरस्ती की हो, तो वह सबसे आगे नज़र आते हैं। उन्होंने बार-बार इस बात को दोहराया कि “मैं जो कुछ भी कह रहा हूं, वह मैं बहुत पहले से कह रहा हूं। अगर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो यह मेरी गलती नहीं।” ओवैसी की ये बातें एक और अहम पैग़ाम देती हैं  कि देशभक्ति किसी पार्टी या विचारधारा की जागीर नहीं होती। जब देश पर हमला होता है, तो हर हिन्दुस्तानी का फ़र्ज़ होता है कि वह अपने तमाम फ़र्क़ों को किनारे रखकर सिर्फ़ तिरंगे को देखे।

आज जब कई सियासी नेता अपने बयानों में सिर्फ़ वोट-बैंक को साधते नज़र आते हैं, ओवैसी का ये रुख़ उम्मीद की एक किरण की तरह सामने आता है  जहां एक मुस्लिम नेता न सिर्फ़ पाकिस्तान के नापाक इरादों की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि एक मज़बूत भारत के लिए रणनीतिक और व्यावहारिक सुझाव भी देता है।

रणनीति, सुझाव और साहस: एक ज़िम्मेदार विपक्षी की मिसाल

चिनाब और झेलम पर बांध बनाने की उनकी बात सिर्फ़ बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि एक दूरदर्शी सोच है  जो बताती है कि हमें सिर्फ़ जवाब देना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए खुद को तैयार भी करना है।

असदुद्दीन ओवैसी का ये रूप एक नई कहानी कहता है जहां विरोध के साथ-साथ एकजुटता का भी रंग है, जहां  आलोचना के साथ-साथ ज़िम्मेदारी का भी एहसास है, और जहां राजनीति से ऊपर उठकर देश के लिए खड़े होने का जज़्बा है।

ये भी पढ़ें:Fake News की पहचान: क्या है हर नागरिक की ज़िम्मेदारी? अफ़वाहों से आप कैसे बच सकते हैं?

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