सच्चखंड श्री हरमंदिर साहिब, श्री अमृतसर साहिब में मौजूद केंद्रीय सिख म्यूज़ियम में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की तस्वीर लगाई गई। पर्यावरण की हिफ़ाज़त के लिए दिए गए ऐतिहासिक फ़ैसलों की वजह से उन्हें ‘ग्रीन जज’ (Green Judge) के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने कौमी हक़ों और इंसानी हक़ों की हिफ़ाज़त के लिए भी अहम भूमिका निभाई।
इस मौक़े पर सिख पंथ की कई प्रमुख शख़्सियतों ने जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की ज़िंदगी, उनकी न्यायिक सेवाओं, इंसानियत के लिए उनके जज़्बे और पर्यावरण की हिफ़ाज़त में उनके योगदान को याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। केंद्रीय सिख म्यूज़ियम सिख इतिहास, गुरु साहिबान की शिक्षाओं, क़ौम की क़ुर्बानियों और सिख पंथ की तरक़्क़ी में योगदान देने वाली शख़्सियतों की यादों को संभालकर रखने की एक अहम जगह है। यहां जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की तस्वीर लगाया जाना, इंसाफ़ के लिए उनकी वफ़ादारी, निडरता और सिख क़ौम के साथ-साथ समाज की भलाई के लिए किए गए उनके कामों का सम्मान है।

उनकी ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग भी अगर इंसाफ़, सच्चाई और इंसानी गरिमा को सबसे ऊपर रखें, तो समाज में बड़ी तब्दीली ला सकते हैं। जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की तस्वीर से पर्दा हटाने की रस्म अरदास के बाद साझा तौर पर निभाई गई। इस मौक़े पर श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार सिंह साहिब ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज, तख़्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार ज्ञानी टेक सिंह, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के प्रधान एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी और सच्चखंड श्री हरमंदिर साहिब के ग्रंथी सिंह साहिब ज्ञानी बलजीत सिंह मौजूद रहे।
बंटवारे का दर्द सहकर हासिल की ऊंची तालीम
जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की पैदाइश 1 जनवरी 1932 को अविभाजित पंजाब के ज़िला झेलम के गांव ढुडियाल में हुई थी। ये जगह अब पाकिस्तान में है। उनका बचपन ऐसे दौर में गुज़रा, जब पंजाब की सामाजिक और सांस्कृतिक ज़िंदगी में बड़े बदलाव आ रहे थे। साल 1947 में देश के बंटवारे के दौरान भड़की सांप्रदायिक हिंसा ने लाखों लोगों की तरह उनके परिवार को भी बेघर होने का दर्द दिया। उनके परिवार को अपना घर-बार छोड़कर पटियाला आना पड़ा।

बंटवारे के बाद पैदा हुई मुश्किलों और आर्थिक-सामाजिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई का अपना ख़्वाब नहीं छोड़ा। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़े एक कॉलेज से बी.ए. और एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वो क़ानून की ऊंची तालीम हासिल करने के लिए लंदन गए। साल 1958 में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन से क़ानून की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद नवंबर 1959 में उन्होंने लिंकन्स इन से बैरिस्टर-एट-लॉ की डिग्री हासिल की। उनका ये सफ़र उनकी मेहनत, लगन और मज़बूत इरादे की कहानी बयां करता है। बंटवारे का दर्द सहने के बाद देश के सबसे बड़े न्यायिक पद तक पहुंचना उनकी क़ाबिलियत और लगातार मेहनत करने के जज़्बे की मिसाल है।
वकालत से सुप्रीम कोर्ट तक का सफ़र
नवंबर 1959 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में वकील के तौर पर अपना नाम दर्ज कराने के बाद जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) ने वकालत के मैदान में अपनी अलग पहचान बनाई। क़ानून की गहरी समझ, मज़बूत दलीलों और इंसाफ़ के लिए उनकी वफ़ादारी ने उन्हें क़ानूनी दुनिया की जानी-मानी शख़्सियतों में शामिल कर दिया। 1960 से 1971 तक उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज में पार्ट-टाइम लेक्चरर के तौर पर भी काम किया।
इस दौरान उन्होंने क़ानून की तालीम के क्षेत्र में भी अपना योगदान दिया। 1971 से 1982 तक वो पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में केंद्र सरकार के सीनियर स्टैंडिंग काउंसल रहे। इसके अलावा, उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और पीजीआई जैसी बड़ी संस्थाओं को भी क़ानूनी सेवाएं दी।

1976-77 में वो पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए। ये उनकी क़ानूनी क़ाबिलियत और साथी वकीलों के बीच उनके सम्मान का सबूत था। मई 1987 से अगस्त 1987 तक उन्होंने पंजाब सरकार के एडवोकेट जनरल के तौर पर काम किया। इसके बाद अगस्त 1987 में उन्हें भारत का एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया।
14 दिसंबर 1988 को वो भारत के सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वकालत करते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट में जज के पद पर नियुक्त होना उनके पेशेवर सफ़र की एक बड़ी कामयाबी थी। वो 21 दिसंबर 1996 को रिटायर हुए।
‘Green Judge’ के तौर पर पर्यावरण की हिफ़ाज़त में ऐतिहासिक योगदान
जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) को देशभर में ‘ग्रीन जज’ (Green Judge) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने पर्यावरण की हिफ़ाज़त को अदालती कामकाज का अहम हिस्सा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। उनके फ़ैसलों ने इस बात को मज़बूती दी कि विकास के नाम पर कुदरती संसाधनों, ऐतिहासिक इमारतों और लोगों की सेहत को नुक़सान पहुंचाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
श्री गुरु नानक देव जी की बाणी की पंक्ति ‘पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु’ इंसान को हवा, पानी और धरती की अहमियत का एहसास कराती है। जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) के पर्यावरण से जुड़े फ़ैसलों में भी कुदरत की हिफ़ाज़त और आने वाली नस्लों के बेहतर भविष्य के लिए ऐसी ही ज़िम्मेदारी दिखाई देती है।
ताजमहल को हवा के प्रदूषण से बचाने के मामले में उनकी अगुवाई में अदालत ने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को कोयले और कोक की जगह साफ़ ईंधन इस्तेमाल करने या तयशुदा इलाके से बाहर जाने के निर्देश दिए। इस क़दम का मक़सद विश्व धरोहर ताजमहल की ख़ूबसूरती और इमारत को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाना था। गंगा नदी में कारखानों का गंदा पानी छोड़ने वाली चमड़ा फैक्ट्रियों के ख़िलाफ़ की गई अदालती कार्रवाई भी पर्यावरण की हिफ़ाज़त के लिए उनके अहम कोशिशों में शामिल रही। इन फ़ैसलों ने उद्योगों को साफ़ संदेश दिया कि आर्थिक फ़ायदे के लिए नदियों और कुदरती संसाधनों को गंदा करना क़बूल नहीं किया जा सकता।

दिल्ली के रिज इलाके की हरियाली और कुदरती जगहों को बचाने, वहां से ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़े हटाने और प्रदूषण रोकने से जुड़े मामलों में भी उनकी भूमिका अहम रही। उन्होंने जनहित याचिकाओं के ज़रिए पर्यावरण की हिफ़ाज़त को आम लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बनाया और इस मामले में जवाबदेही तय करने पर ज़ोर दिया। जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) के कार्यकाल के दौरान जनहित याचिकाओं की अहमियत बढ़ी।
इनके ज़रिए आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण की हिफ़ाज़त के लिए काम करने वाले लोगों को उन मुद्दों पर अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का मौक़ा मिला, जिनका असर पूरे समाज पर पड़ता था। उनके योगदान ने अदालती दख़ल, सरकार की जवाबदेही और आम लोगों के हक़ों की हिफ़ाज़त से जुड़ी बहस को एक नई दिशा दी। उन्होंने अपने फ़ैसलों के ज़रिए ये संदेश दिया कि कुदरत की हिफ़ाज़त सिर्फ़ पर्यावरण से जुड़ा मामला नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगी और आने वाली नस्लों के भविष्य से भी जुड़ी ज़िम्मेदारी है।
इंसानी हक़ों और पीड़ितों की आवाज़ बने
जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की शख़्सियत का एक अहम पहलू इंसानी हक़ों के लिए उनकी वफ़ादारी भी थी। उनका मानना था कि इंसाफ़ का मक़सद सिर्फ़ क़ानून की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि ये भी यक़ीन बनाना है कि किसी के साथ नाइंसाफ़ी न हो और हर इंसान को क़ानूनी हिफ़ाज़त मिले। जेलों में लंबे समय से बंद क़ैदियों और अदालती कार्रवाई में देरी से परेशान लोगों से जुड़े मामलों में उनकी भूमिका को ख़ास तौर पर याद किया जाता है। अदालती कार्रवाई में देरी की वजह से क़ैदियों को होने वाली परेशानियों ने उनका ध्यान इस तरफ़ खींचा कि इंसाफ़ मिलने में देरी भी इंसानी हक़ों से जुड़ा एक गंभीर मसला है।
सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद भी उन्होंने सामाजिक मुद्दों और इंसानी हक़ों से दूरी नहीं बनाई। साल 1996 में उन्होंने चंडीगढ़ में एक ग़ैर-सरकारी ‘पीपल्स कमीशन’ की स्थापना की। इस मंच के ज़रिए 1984 में सिखों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा से प्रभावित परिवारों और पंजाब में पुलिस की कथित ज़्यादतियों का शिकार हुए लोगों को अपनी शिकायतें सामने रखने का मौक़ा मिला। इस पहल की अहमियत इस बात में थी कि प्रभावित लोगों की बातें सुनी जा सकें, उनके तजुर्बों को दर्ज किया जा सके और इंसानी हक़ों के उल्लंघन से जुड़े आरोपों पर खुलकर चर्चा हो सके। इसके लिए एक ऐसा मंच तैयार हुआ, जहां पीड़ित अपनी बात रख सकते थे।
जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की ये पहल दिखाती है कि रिटायरमेंट के बाद भी कोई न्यायिक शख़्सियत समाज में जवाबदेही और इंसाफ़ की भावना को मज़बूत करने के लिए काम कर सकती है। उनके लिए इंसाफ़ सिर्फ़ अदालतों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन लोगों की आवाज़ सुनना भी था, जिन्हें अपनी बात सामने रखने के लिए एक मंच की ज़रूरत थी।

विश्व सिख काउंसिल के ज़रिए पंथ की ख़िदमत
जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) ने सिख पंथ को संगठित करने और दुनिया भर में सिख समुदाय से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाने में भी योगदान दिया। श्री अकाल तख़्त साहिब में हुई पहली विश्व सिख कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्हें सर्वसम्मति से ‘विश्व सिख काउंसिल’ का पहला चेयरमैन चुना गया। इस ज़िम्मेदारी के ज़रिए उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले सिखों को एक साझा मंच से जोड़ने की कोशिश की।
विदेशों में रहने वाले सिख समुदाय के धार्मिक, सामाजिक और कौमी मुद्दों को समझना और उन्हें एकजुट करना इस काम का अहम हिस्सा था। क़ानूनी दुनिया में जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) को जो सम्मान मिला था, उससे पंथ से जुड़े मंचों पर उनकी भूमिका को भी अहमियत मिली। मशहूर सिख विद्वान डॉ. भाई हरबंस लाल के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क में हुए मिलेनियम समारोहों के दौरान ख़ालसा पंथ की नुमाइंदगी करने के लिए जस्टिस कुलदीप सिंह को बुलाया गया था।
लेकिन घुटने का ऑपरेशन होने की वजह से वो ख़ुद वहां नहीं जा सके। ऐसे में उन्होंने अपनी जगह डॉ. भाई हरबंस लाल को पंथ की नुमाइंदगी करने के लिए भेजा। ये घटना सिख पंथ से जुड़े मामलों में उनकी दिलचस्पी और दुनिया भर में सिख समुदाय की आवाज़ पहुंचाने की उनकी कोशिशों को दिखाती है।
हदबंदी आयोग के चेयरमैन के तौर पर अहम ज़िम्मेदारी
साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली सरकार ने जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) को भारत के हदबंदी आयोग का चेयरमैन नियुक्त किया। ये एक अहम ज़िम्मेदारी थी। आयोग का काम देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनावी हलकों की सीमाएं तय नियमों और जनगणना के आंकड़ों के आधार पर दोबारा तय करना था। हदबंदी की प्रक्रिया का सीधा ताल्लुक़ लोगों की सियासी नुमाइंदगी से होता है।
इसलिए इसमें अलग-अलग इलाकों की आबादी, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक ज़रूरतों को ध्यान में रखना ज़रूरी होता है। जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) ने अपने अदालती तजुर्बे और प्रशासनिक समझ के आधार पर इस अहम ज़िम्मेदारी को निभाया। इस काम ने उनकी पेशेवर क़ाबिलियत और मुश्किल मामलों को संभालने की उनकी क्षमता को भी सामने रखा।

परिवार ने भी तालीम और क़ानून के क्षेत्र में दिया योगदान
जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) के परिवार ने भी तालीम और क़ानून के क्षेत्र में अपना योगदान दिया। उनकी पत्नी सरदारनी गुरमिंदर कौर सरकारी कॉलेज, मोहाली में प्रिंसिपल के तौर पर सेवाएं देने के बाद रिटायर हुई। उनके बड़े बेटे परमजीत सिंह पटवालिया ने भी क़ानून के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। वो पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जज और भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं।
इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट के तौर पर अपनी सेवाएं जारी रखी। उनके छोटे बेटे ने भी वकालत के पेशे में काम किया और पंजाब के एडवोकेट जनरल की ज़िम्मेदारी संभाली। इस तरह जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की विरासत सिर्फ़ उनकी अपनी कामयाबियों तक महदूद नहीं रही, बल्कि उनके परिवार ने भी क़ानून और तालीम के क्षेत्र में योगदान दिया।
इंसाफ़ और इंसानियत की मिसाल बनी ज़िंदगी
गौरतलब है कि 25 नवंबर 2024 को चंडीगढ़ में 92 साल की उम्र में जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) के इंतक़ाल से देश ने एक ऐसी शख़्सियत को खो दिया, जिन्होंने इंसाफ़, पर्यावरण और इंसानी हक़ों के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी ज़िंदगी संघर्ष, तालीम, मेहनत, निडरता और लोगों की भलाई के लिए काम करने की एक प्रेरणादायक मिसाल है।
उन्होंने साबित किया कि जज के पद की अहमियत सिर्फ़ अदालत के अंदर किए जाने वाले काम तक महदूद नहीं होती। एक संवेदनशील जज अपने फ़ैसलों के ज़रिए समाज में बदलाव ला सकता है, पर्यावरण की हिफ़ाज़त कर सकता है और उन लोगों को उम्मीद दे सकता है, जिनकी आवाज़ अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती।
केंद्रीय सिख म्यूज़ियम में जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की तस्वीर लगना उनकी सेवाओं को याद करने का एक अहम मौक़ा है। ये सम्मान सिख क़ौम की उस परंपरा को भी आगे बढ़ाता है, जिसमें इंसानियत की ख़िदमत करने वालों, सच का साथ देने वालों और नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को इज़्ज़त दी जाती है। श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार के शब्दों में, “जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) जैसी शख़्सियतें किसी भी क़ौम का सरमाया होती हैं।”
केंद्रीय सिख म्यूज़ियम में जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) की तस्वीर लगाए जाने के बाद श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने कहा कि जस्टिस कुलदीप सिंह जैसी निडर, समझदार और ऊंचे नैतिक किरदार वाली शख़्सियतें किसी भी क़ौम का सरमाया होती हैं। उन्होंने अपने न्यायिक सफ़र के दौरान क़ानून की मर्यादा बनाए रखने के साथ-साथ उन लोगों की आवाज़ बनने का अहम काम किया, जो अपने हक़ों से महरूम थे।
जत्थेदार श्री अकाल तख़्त साहिब ने कहा कि जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) ने इंसानी हक़ों, कौमी हक़ों और पर्यावरण की हिफ़ाज़त के लिए अपनी अलग पहचान बनाई। उनके अदालती फ़ैसलों और सामाजिक मुद्दों से जुड़ाव ने साबित किया कि इंसाफ़ का मतलब सिर्फ़ क़ानून लागू करना नहीं, बल्कि समाज के कमज़ोर तबक़ों को इंसाफ़ दिलाना भी है। उनकी सेवाएं आने वाली नस्लों को सच्चाई और निडरता के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के प्रधान एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि केंद्रीय सिख म्यूज़ियम सिख क़ौम के इतिहास, संघर्षों, क़ुर्बानियों और महान सेवाओं की यादों को संभालकर रखने की एक अहम जगह है। यहां उन शख़्सियतों की तस्वीरें लगाई जाती हैं, जिन्होंने ज़िंदगी के अलग-अलग क्षेत्रों में अहम योगदान देकर क़ौम और इंसानियत का नाम रोशन किया है।
एडवोकेट धामी ने कहा कि क़ानून के क्षेत्र में ऊंचा मुक़ाम हासिल करने के बावजूद जस्टिस कुलदीप सिंह (Kuldeep Singh) ने सामाजिक ज़िम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने इंसानी हक़ों की हिफ़ाज़त और इंसाफ़ दिलाने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की। म्यूज़ियम में उनकी तस्वीर लगाया जाना उनके योगदान को सम्मान देने के साथ-साथ नौजवान पीढ़ी को भी लोगों की भलाई के कामों से जुड़ने का पैग़ाम देता है।
लेख: गुरप्रीत सिंह
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
ये भी पढ़ें- मुग़नी तबस्सुम: उर्दू अदब का वो नाम, जिसकी शायरी में छिपे अनकहे जज़्बात
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सब्सक्राइब कर सकते हैं।



