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Manuscripts में छिपा है भारत के अतीत का इल्म, जानिए ब्राह्मी, शारदा और प्राचीन देवनागरी का इतिहास

हमारे अतीत की बहुत सी कहानियां किताबों में नहीं, बल्कि Manuscripts (हस्तलिपियां) में लिखी हुई मिलती हैं। तो आइए, सबसे पहले समझते हैं कि हस्तलिपि क्या होती है और इसका इतिहास कितना पुराना है। Manuscripts (हस्तलिपियां), हाथ से लिखा हुआ कोई दस्तावेज़ होता है। भारत में ये हस्तलिपियां ताड़पत्र, भोजपत्र, कपड़े, लकड़ी, धातु और चमड़े जैसी कई चीज़ों पर लिखी गई हैं।

National Mission for Manuscripts के मुताबिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक या कलात्मक तौर पर अहम कम से कम 75 साल पुराने हाथ से लिखे दस्तावेज़ों को हस्तलिपि या Manuscript कहा जाता है। भारत में लिखने के सबसे पुराने सबूतों में से एक सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों पर मिली लिपि है। हालांकि, इस लिपि को आज तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है। लेकिन Manuscripts (हस्तलिपियां) सिर्फ़ धार्मिक किताबों या ग्रंथों तक ही सीमित नहीं हैं। इनमें साहित्य, दर्शन, इलाज, गणित, विज्ञान, भूगोल, खेती, वास्तुकला, संगीत और कला जैसे कई विषयों की जानकारी मिलती है। अब आप सोच रहे होंगे कि हम अचानक हस्तलिपियों की बात क्यों कर रहे हैं?

Source: Wikipedia

दरअसल, हाल ही में संस्कृत साहित्य अकादमी, गांधीनगर और पी. के. पटेल विद्या संकुल, नरोदा ने मिलकर गांधीनगर में सात दिन की एक वर्कशॉप शुरू की है। ये वर्कशॉप 8 अगस्त से आयोजित की जा रही है और National Mission for Manuscripts के तहत हो रही है। इस वर्कशॉप का मक़सद लोगों को भारत की पुरानी लिपियों से रूबरू कराना और उन्हें पढ़ने-समझने की ट्रेनिंग देना है। इसमें ख़ास तौर पर ब्राह्मी, शारदा और प्राचीन देवनागरी जैसी लिपियां सिखाई जा रही हैं। अब ज़रा इन तीनों Manuscripts (हस्तलिपियों) को आसान भाषा में समझते हैं।

सबसे पहले बात ब्राह्मी लिपि की। इसे भारत की सबसे पुरानी और अहम लिपियों में से एक माना जाता है। दक्षिण एशिया की कई आज की लिपियों, जैसे देवनागरी, बंगाली, गुजराती, तमिल और तेलुगु की जड़ें ब्राह्मी लिपि से जुड़ी मानी जाती हैं। सम्राट अशोक के तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के कई शिलालेख भी ब्राह्मी लिपि में लिखे गए है। इसके बाद आती है शारदा लिपि। ये भी ब्राह्मी परिवार की एक पुरानी लिपि है। इसका विकास करीब 8वीं-9वीं शताब्दी के आसपास हुआ। इसका इस्तेमाल ख़ास तौर पर कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब के इलाकों में संस्कृत और कश्मीरी लिखने के लिए किया जाता था।

वहीं प्राचीन देवनागरी, जिसे Proto-Devanagari या शुरुआती देवनागरी भी कहा जाता है, 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच विकसित हुई। इसका रिश्ता कुटिल लिपि से माना जाता है और कुटिल लिपि की जड़ें गुप्त लिपि और उससे आगे प्राचीन ब्राह्मी तक जाती हैं। वर्कशॉप में स्पीकर के तौर पर पहुंचे प्रो. रामजी सावलिया ने कहा कि गुजरात में हस्तलिपियों का बहुत बड़ा और समृद्ध ज़खीरा मौजूद है। उन्होंने कहा कि अब ज़रूरत है कि इन Manuscripts (हस्तलिपियां) की मौजूदा लिस्ट को बेहतर किया जाए और उसमें ज़रूरी सुधार किए जाएं, ताकि रिसर्च करने वाले लोग यानी scholars, इन अनमोल धरोहरों को बेहतर तरीके से पढ़ और समझ सकें।

ये भी पढ़ें: हिरन की खाल पर लिखी 1000 साल पुरानी क़ुरान, सोने से सजी तारीख़ और नायाब Manuscripts

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