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ख़ुशबू की नगरी कन्नौज : जब महक की सल्तनत को मिला GI पहचान का ताज

उत्तर प्रदेश का कन्नौज शहर सदियों से खुशबुओं की दुनिया का सेंटर रहा है। यहां की मिट्टी, यहां का पानी और यहां की हवा सब कुछ महकता है। जब हम इत्र या अत्तर की बात करते हैं, तो कन्नौज का नाम सबसे पहले ज़ुबान पर आता है। लेकिन अब यह सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि एक Geographical Indication (GI) रजिस्टर प्रोडक्ट बन चुका है, जिसने इसकी पहचान को कानूनी मज़बूती दी है।

कन्नौज का इत्र (Image-pexels.com)

जीआई टैग की कहानी: एक ऐतिहासिक उपलब्धि


9 फरवरी 2009 को उत्तर प्रदेश सरकार के निर्यात आयुक्त ने कन्नौज इत्र के लिए GI Application दाखिल किया। पांच साल के लंबे प्रोसेस के बाद, 31 मार्च 2014 को इसे ऑफिशियली तौर पर Certificate Number 203 के तहत GI Registration मिला। अब ये रजिस्ट्रेशन 8 फरवरी 2029 तक वैलिड है। यानी, कन्नौज के इत्र की पहचान अब क़ानूनी तौर पर सेफ है।

देग-भापका: वह पुरानी तकनीक जो आज भी ज़िंदा है


कन्नौज के इत्र की रूह है देग-भापका विधि (Pot-still method) जो पानी और भाप के ज़रिए खुशबू निकालने की प्राचीन तकनीक है। इसमें तांबे के बड़े-बड़े देग (बर्तन) और भापका (भाप देने वाला यंत्र) इस्तेमाल होते हैं।

कन्नौज का इत्र (Image-pexels.com)

फूल, जड़ी-बूटियां, मसाले, चंदन, केवड़ा, गुलाब, हर चीज़ को इन्हीं देगों में उबाला जाता है और उसका अर्क (रुह) उतारा जाता है। ये प्रोसेस कैमेस्ट्री से कम और Sadhana से ज़्यादा है। हर इत्र बनाने वाले उस्ताद को ये ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिला है कि कब आंच बढ़ानी है, कब घटानी है, कब मिलाना है और कब छानना है।

GI Tag  का क्या मतलब?

जीआई टैग का मतलब यह नहीं कि हर कोई इस नाम का इस्तेमाल कर सकता है। यह एक कानूनी ढाँचा है जो केवल उन्हीं उत्पादकों को यह अधिकार देता है जो कन्नौज की पारंपरिक विधि से इत्र बनाते हैं। यह उपभोक्ताओं के लिए गुणवत्ता और मौलिकता का प्रमाण है—कि वह असली कन्नौजी इत्र खरीद रहे हैं। और उत्पादकों के लिए यह एक सुरक्षा कवच है, ताकि कोई बाहरी व्यक्ति उनकी सदियों पुरानी मेहनत का नाम न चुरा सके।

कन्नौज का इत्र (Image-pexels.com)

एक ज़िला एक ODOP Scheme की पहल

उत्तर प्रदेश सरकार की ODOP Scheme के तहत भी कन्नौज के इत्र को Special Priority दी गई है। इससे स्थानीय कारीगरों को बाज़ार तक पहुंचने में मदद मिली है। अब कन्नौज का इत्र सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी पहचान बना रहा है।

कन्नौज का इत्र (Image-pexels.com)

आज का दौर, कल की ख़ुशबू

Modern chemical perfumes  के इस दौर में भी कन्नौज की यह पारंपरिक इत्र-कला अपनी जगह बनाए हुए है। जीआई टैग ने इस कला को एक नई ऊंचाई दी है। जहां एक तरफ़ ये परंपरा सेफ है, वहीं दूसरी तरफ़ यह युवा पीढ़ी को भी अट्रैक्ट कर रही है।

कन्नौज का इत्र (Image-pexels.com)

महकती विरासत


कन्नौज का इत्र सिर्फ़ एक प्रोडक्ट नहीं, ये एक इतिहास, एक संस्कृति, एक तहज़ीब है। जब आप कन्नौजी अत्तर की एक बूंद अपनी कलाई पर लगाते हैं, तो आप सिर्फ़ खुशबू नहीं बल्कि सैकड़ों सालों की मेहनत, लगन और कारीगरी की महक अपने साथ रखते हैं। 2029 तक इसकी जीआई सुरक्षा बढ़ा दी गई है, जिससे यह महकती विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित और सम्मानित रहेगी।

ये भी पढ़ें- चौमहल्ला पैलेस: हैदराबाद की शान, निज़ामों की विरासत

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