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भगत कबीर और शेख फरीद की बाणी: सच, बराबरी और नाम का पैग़ाम

श्री गुरु ग्रंथ साहिब पूरी इंसानियत के शब्द गुरु हैं। पूरी कायनात की भलाई के लिए पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी ने गुरुओं, भगतों और गुरु घर से जुड़े श्रद्धालु सिखों के इलाही कलाम को भाई गुरदास जी की मदद से ग्रंथ में संकलित किया। गुरमत के उसूलों पर पूरी तरह खरी उतरने वाली और मज़हब, जात, इलाक़ा, ज़बान, ग़रीबी, अमीरी जैसी तमाम तंग हदों से आज़ाद भगतों की बाणी को ग्रंथ में शामिल किया गया।

भगत बाणी ने उन लोगों को, जिन्हें सिर्फ़ जन्म के आधार पर हक़ीर समझा जाता था, बराबरी, इज़्ज़त और ख़ुद्दारी का एहसास कराया। इसने पूरी इंसानियत को एक मानने का पैग़ाम दिया साथ ही जात-पात और मज़हब के नाम पर होने वाले ग़ैर-इंसानी सुलूक के ख़िलाफ़ एक मज़बूत फ़िक्री इंक़िलाब की बुनियाद रखी।

गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल 15 भगतों ने हिंदू और इस्लाम, दोनों मज़ाहिब में फैल चुकी रस्मपरस्ती, अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ लोगों को बेदार किया। उन्होंने समाज में फ़िक्री गुफ़्तगू और इस्लाह की शुरुआत की, ताकि लोग सच और इंसाफ़ का रास्ता अपनाएं।

भगत बाणी ने उस दौर में समाज में आई गिरावट को दूर करने के लिए समाजी, मआशी, सियासी और तहज़ीबी सतह पर बड़े बदलाव की सोच पेश की। इसने इंसान को बुरी ख़सलतों से दूर रहकर अच्छे अख़लाक़, इंसाफ़, मोहब्बत और इंसानियत पर आधारित समाज बनाने का पैग़ाम दिया। भगतों की बाणी ने सदियों से ज़िल्लत, तिरस्कार और भेदभाव का शिकार लोगों में इंसानी वक़ार, ख़ुद्दारी और बराबरी का एहसास पैदा किया। इसका मक़सद ऐसे समाज की तामीर करना था, जहां न कोई ऊंचा हो, न कोई नीचा, बल्कि हर इंसान को बराबर की इज़्ज़त, हक़ और मुकाम हासिल हो।

गुरु साहिबानों में से छह गुरुओं— गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमरदास जी, गुरु रामदास जी, गुरु अर्जन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी की बाणी को गुरु ग्रंथ साहिब जी में ख़ास मुकाम दिया गया है। इनके अलावा 15 भगतों की बाणी भी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है। इनमें भगत जयदेव, बाबा शेख फरीद, भगत सधना, भगत त्रिलोचन, भगत नामदेव, भगत सैन, भगत रामानंद, भगत रविदास, भगत कबीर, भगत बेणी, भगत धन्ना, भगत पीपा, भगत सूरदास, भगत भीखन और भगत परमानंद के नाम शामिल हैं।

इसके साथ ही 11 भट्टों— कल्ह, नल्ह, गयंद, भिखा, सल्ह, कीरत, भल्ह, मथुरा, बल्ह, जालप और हरिबंस की रचनाएं भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। गुरुओं, भगतों और भट्टों के अलावा गुरु घर से जुड़े चार क़रीबी सिखों भाई मरदाना, राय बलवंड, सत्ता डूम और बाबा सुंदर के शब्द भी ग्रंथ में शामिल किए गए हैं। सिख समाज में इन चारों को ख़ास एहतिराम हासिल है।

ग्रंथ के संकलन से पहले बाबा फरीद, भगत कबीर जी और गुरु रविदास जी ने अपनी बाणी के ज़रिए पूरी इंसानियत को सही राह दिखाने की कोशिश की। उन्होंने समाज में फैले ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी, ऊंच-नीच, तफ़रीक़ और भेदभाव जैसी बुराइयों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और लोगों को बराबरी का पैग़ाम दिया।

भगत रविदास जी गुरु नानक देव जी के हमअसर थे, लेकिन बाबा फरीद और भगत कबीर जी गुरु नानक देव जी से पहले ही अपनी तालीम और कलाम के ज़रिए समाज की इस्लाह का फ़र्ज़ अदा कर चुके थे। इतिहासकारों के मुताबिक, गुरु नानक देव जी से पहले हिंदुस्तान में सूफ़ी मत का काफ़ी असर था। सूफ़ी मत इस्लाम की एक रूहानी विचारधारा है। इसका आग़ाज़ अरब से हुआ और बाद में पंजाब में इसका पहला बड़ा मरकज़ लाहौर बना।

‘सूफी’ लफ़्ज़ ‘सफ़’ से निकला माना जाता है, जिसका मतलब कतार है। कहा जाता है कि जो लोग इबादत के दौरान सबसे आगे की सफ़ में खड़े होते थे, उन्हें सूफ़ी कहा जाता था। सूफ़ी लोग शरीअत के सख़्त पाबंद होते थे और खुदा की रज़ा में रहना उनका सबसे अहम उसूल था।

मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्गों में बाबा फरीद, दाता गंज बख्श और बू अली कलंदर के नाम ख़ास तौर पर लिए जाते हैं। सूफ़ी मत में मुरशिद को सबसे बुलंद मक़ाम हासिल था।
सूफ़ी मत के चार मशहूर सिलसिले थे—

चिश्ती
सुहरावर्दी
कादरी
नक्शबंदी

इनमें चिश्ती सिलसिले का मरकज़ दिल्ली, सुहरावर्दी सिलसिले का मरकज़ मुल्तान और नक्शबंदी सिलसिले का मरकज़ सरहिंद था। गुरु ग्रंथ साहिब में बाबा फरीद की बाणी इसलिए शामिल की गई क्योंकि उन्होंने समाज और पूरी इंसानियत की इस्लाह के लिए अहम कोशिशें की। उन्हें पंजाबी ज़बान का पहला सूफी शायर भी कहा जाता है।

बाबा फरीद का की पैदाइश 1173 ईस्वी में मुल्तान ज़िले के खोतवाल गांव में जमालुद्दीन सुलेमान और बीबी करसूम के घर हुई। उनका विसाल 1266 ईस्वी में हुआ। उन्हें चिश्ती सिलसिले का दसवां ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) माना जाता है। उनके मुरशिद ख्वाजा बख्तियार काकी थे, जबकि उनके बाद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया इस सिलसिले के अहम रहनुमा बने। बाबा फरीद की दरगाह आज पाकिस्तान के पाकपटन में मौजूद है।

गुरु ग्रंथ साहिब जी में बाबा फरीद जी के नाम से 130 सलोक दर्ज हैं। इनमें 112 सलोक बाबा फरीद जी के हैं, जबकि 18 सलोक गुरु साहिबानों के हैं। इनमें—

गुरु नानक देव जी के 4 सलोक
गुरु अमरदास जी के 5 सलोक
गुरु रामदास जी का 1 सलोक
गुरु अर्जन देव जी के 8 सलोक शामिल हैं।

इसके अलावा बाबा फरीद जी के चार शब्द भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। इनमें दो शब्द राग आसा और दो शब्द राग सूही में संकलित हैं। इन रचनाओं में बाबा फरीद ने इश्क़-ए-हक़ीक़ी, रूहानियत, इंसानी अख़लाक़, सब्र और खुदा की मोहब्बत का गहरा पैग़ाम दिया है। राग आसा में बाबा फरीद जी के ये शब्द दर्ज हैं—

“दिलहु मुहब्बत जिन्ह सेई सचिआ।
बोले शेख फरीदु प्यारे अलह लगे॥”

राग सूही में उनके ये शब्द दर्ज हैं—

“तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ।
बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला॥”

बाबा फरीद के चार शब्द गुरु ग्रंथ साहिब जी में शामिल हैं। इनमें दो शब्द राग आसा और दो शब्द राग सूही में दर्ज हैं। शेख फरीद जी के कुछ मशहूर सलोक इस तरह हैं—

“उठ फरीदा सुतिया, सुबह निवाज़ गुज़ार।
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु दीजै डारि ॥”

इसका मतलब है कि इंसान को ग़फ़लत छोड़कर खुदा की इबादत करनी चाहिए। जो सिर अपने मालिक के आगे नहीं झुकता, उसकी कोई अहमियत नहीं।

“कंधी उतै रुखड़ा, किचरकु बंनै धीरु।
फरीदा कचै भंडै राखिए किचार थाई नीर ॥

इस सलोक में बाबा फरीद समझाते हैं कि जैसे कच्चे बर्तन में पानी ज़्यादा देर तक नहीं ठहरता, वैसे ही ये दुनिया और इंसान की ज़िंदगी भी हमेशा रहने वाली नहीं है। इसलिए इंसान को अच्छे कर्म करने चाहिए। बाबा फरीद जी ने अपनी बाणी के ज़रिए उस दौर के समाज और उसके हालात को बख़ूबी बयान किया। उन्होंने पूरी इंसानियत को ये पैग़ाम दिया कि समाज में बराबरी, अमन, स्थिरता और आज़ादी का होना बेहद ज़रूरी है।

उन्होंने अपनी बाणी में कई जगह खुद को ही मुख़ातिब करते हुए समाज में फैली कुरीतियों, नाइंसाफ़ी, भेदभाव और बुराइयों को दूर करने की कोशिश की। उनकी तालीम इंसान को मोहब्बत, ख़ुलूस, सच्चाई और नेक रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है।

जिस तरह बाबा फरीद जी ने गुरु नानक देव जी और गुरु ग्रंथ साहिब के संकलन से पहले समाज की इस्लाह और उसे एक बेहतर निज़ाम देने की कोशिश की, उसी तरह भक्ति तहरीक में भगत कबीर जी ने भी अहम किरदार अदा किया।

भक्ति तहरीक की शुरुआत 8वीं सदी में दक्षिण भारत से हुई थी। ये तहरीक शैव और वैष्णव परंपराओं से निकली। भक्ति मार्ग में इल्म (ज्ञान) और कर्म से ज़्यादा परमात्मा से मोहब्बत, इख़लास और रूहानी रिश्ता क़ायम करने पर ज़ोर दिया गया। इस तहरीक का सबसे बड़ा पेशरवा (प्रवर्तक) भगत रामानंद को माना जाता है। भक्ति काव्य की दो अहम धाराएं थी निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति। भगत कबीर जी को निर्गुण भक्ति का सबसे बड़ा नुमाइंदा माना जाता है।

भगत कबीर जी की पैदाइश 1398 ईस्वी में मानी जाती है। उन्होंने 1518 ईस्वी तक अपनी ज़िंदगी समाज की इस्लाह, बराबरी, आज़ादी और इंसानियत के लिए वक़्फ़ कर दी। उन्होंने जात-पात, ऊंच-नीच, छुआछूत और दूसरी सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ खुलकर आवाज़ बुलंद की। भगत कबीर जी, भगत रामानंद के शागिर्द थे और उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। मान्यता है कि उनका जन्म बनारस के क़रीब एक ब्राह्मण विधवा के गर्भ से हुआ था।

बाद में उनका पालन-पोषण जुलाहा (बुनकर) परिवार में हुआ, इसलिए उनका ताल्लुक़ जुलाहा बिरादरी से माना जाता है। उनकी अहलिया (पत्नी) का नाम लोई था। उनके एक बेटे का नाम कमाल और बेटी का नाम कमाली था।

भगत कबीर जी ने अपने मशहूर कलाम “हिंदू मुसलमान का साहिब एक” के ज़रिए ये पैग़ाम दिया कि ख़ुदा एक है और सभी इंसान उसी की औलाद हैं। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बढ़ती दूरियों, नफ़रत और तफ़रीक़ को मिटाकर मोहब्बत, भाईचारे और यकजहती का पैग़ाम दिया। यही वजह है कि उन्हें हिंदू और मुस्लिम, दोनों मज़ाहिब में बराबर एहतिराम हासिल हुआ।

भगत कबीर जी अवतारवाद और देवी-देवताओं की परस्तिश के हामी नहीं थे। उनका मानना था कि इंसान को सीधे परवरदिगार से रिश्ता क़ायम करना चाहिए। हालांकि, उन्होंने वेदों की अहमियत को भी तस्लीम किया और अपनी बाणी में उनका ज़िक्र किया है।

भगत कबीर जी अपनी बाणी में फ़रमाते हैं—

“बेद कतेब कहहु मत झूठे, झूठा जो न बिचारै॥”

इसका मतलब है कि वेद और किताबें (कुतुब) झूठी नहीं हैं। झूठा वो शख़्स है, जो उनके असली मफ़हूम को समझने और उस पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र नहीं करता। भगत कबीर जी पहले ऐसे सूफ़ी मिज़ाज शायर-संत माने जाते हैं, जिन्होंने बादशाहों और हुक्मरानों की अंधी तारीफ़ करने के बजाय उनकी सत्ता पर सवाल उठाए और हक़ की बात बेख़ौफ़ होकर कही।

उनकी मशहूर रचनाओं में बीजक, कबीर ग्रंथावली, साखी कबीर और अनुराग सागर शामिल हैं। इनमें बीजक को भगत कबीर जी की सबसे मुअतबर (प्रामाणिक) तस्नीफ़ माना जाता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल सभी भगतों में सबसे ज़्यादा बाणी भगत कबीर जी की दर्ज है। उन्होंने 17 रागों में 225 शब्द उचारे। इसके अलावा बावन अखरी, वार सातवीं और ‘सलोक भगत कबीर जी’ के उनवान के तहत 243 सलोक भी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं।

भगत कबीर जी की बाणी जिन 17 रागों में दर्ज है, उनका तफ़सील इस तरह है—

राग सिरी – 2 शब्द
राग गौड़ी – 74 शब्द
राग आसा – 37 शब्द
राग गुजरी – 2 शब्द
राग सोरठ – 11 शब्द
राग धनासरी – 5 शब्द
राग तिलंग – 1 शब्द
राग सूही – 5 शब्द
राग बिलावल – 12 शब्द
राग गौड़ – 11 शब्द
राग रामकली – 12 शब्द
राग मारू – 12 शब्द
राग केदारा – 6 शब्द
राग भैरव – 20 शब्द
राग बसंत – 7 शब्द
राग सारंग – 3 शब्द
राग प्रभाती – 5 शब्द

इन तमाम रागों में भगत कबीर जी की बाणी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है।

भगत कबीर जी की कुछ मशहूर पंक्तियां इस तरह हैं—

“अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरत के सभ बंदे॥
एक नूर ते सभु जगु उपज्या कउन भले को मंदे॥”

इस शबद में कबीर जी फ़रमाते हैं कि सबसे पहले अल्लाह ने अपना नूर पैदा किया और उसी नूर से पूरी कायनात और तमाम इंसान वजूद में आए। जब सब एक ही नूर से पैदा हुए हैं, तो फिर किसी को ऊंचा और किसी को नीचा कैसे कहा जा सकता है? यही बराबरी और इंसानियत का असली पैग़ाम है।

“गगन दमामा बाजिओ, परिओ नीसानै घाउ॥
खेतु जु मांडिओ सूरमा, अब जूझन को दाउ॥”

इस शब्द में कबीर जी हक़, इंसाफ़ और सच्चाई की ख़ातिर डटकर खड़े होने का पैग़ाम देते हैं। उनका कहना है कि जब जंग-ए-हक़ का वक़्त आ जाए, तो पीछे हटने के बजाय पूरे हौसले के साथ मैदान में उतरना चाहिए।

“सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत॥
पुरजा-पुरजा कटि मरै, कबहू न छाडै खेत॥”

कबीर जी के मुताबिक़ असल बहादुर वही है, जो दीन, यानी मज़लूमों, इंसाफ़ और हक़ की ख़ातिर लड़ता है। चाहे उसके जिस्म के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं, लेकिन वो अपने उसूल, हौसले और मक़सद से कभी पीछे नहीं हटता। यही सच्ची बहादुरी और इंसानियत की पहचान है।

ये शब्द उस दौर के समाज में फैले भेदभाव, ऊंच-नीच, ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी को देखकर लिखे गए थे। भगत कबीर जी ने अपनी बाणी के ज़रिए समझाने की कोशिश की कि जब पूरी इंसानियत एक ही परवरदिगार की बनाई हुई है, तो फिर कोई इंसान ऊंचा या नीचा कैसे हो सकता है। अगर सभी इंसान एक ही नूर से पैदा हुए हैं, तो किसी को अच्छा या बुरा कहना सही नहीं है।

कबीर जी ने ये भी पैग़ाम दिया कि इंसान को अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। ज़ुल्म को ख़ामोशी से सहना नहीं, बल्कि उसके ख़िलाफ़ डटकर खड़ा होना चाहिए। बाबा फरीद जी और भगत कबीर जी दोनों ने अपनी बाणी के ज़रिए समाज को नई राह दिखाई। उन्होंने समाज में फैली जात-पात, ऊंच-नीच, तफ़रीक़ और भेदभाव जैसी बुराइयों को ख़त्म करने की कोशिश की और इंसानियत, मोहब्बत और बराबरी का पैग़ाम दिया।

इतिहासकारों के मुताबिक़, श्री गुरु नानक देव जी, जो सिखों के पहले गुरु थे, अपनी उदासियों (धार्मिक यात्राओं) के दौरान बाबा फरीद जी और भगत कबीर जी से जुड़े मुक़ामों पर गए। वहां से उन्होंने उनकी बाणी को इकट्ठा किया और अपनी बाणी के साथ उसे सुरक्षित रखा। बाद में ये बाणी गुरु अंगद देव जी को सौंपी गई।

गुरु अंगद देव जी ने अपनी बाणी इसमें शामिल करके इसे गुरु अमरदास जी को सौंपा। इसके बाद ये विरासत गुरु रामदास जी और फिर गुरु अर्जन देव जी तक पहुंची। पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी ने भाई गुरदास जी से पांचों गुरुओं की बाणी को आदि ग्रंथ में लिखवाया। इसके साथ ही उन्होंने भगतों, भट्टों और गुरु घर से जुड़े अन्य सिख भक्तों की बाणी को भी आदि ग्रंथ में शामिल किया।

सबसे अहम बात ये है कि गुरु अर्जन देव जी ने कभी ये नहीं देखा कि कोई भगत या भट्ट किस मज़हब से ताल्लुक़ रखता है। उन्होंने यह नहीं सोचा कि वह सिख है, हिंदू है या मुसलमान है। उन्होंने सिर्फ़ उस बाणी को जगह दी, जो सच, इंसानियत, बराबरी और रूहानियत का पैग़ाम देती थी। इसी वजह से आदि ग्रंथ ऐसा मुक़द्दस ग्रंथ बना, जिसमें जात-पात, ऊंच-नीच, भेदभाव और तफ़रीक़ जैसी तमाम सामाजिक बुराइयों के लिए कोई जगह नहीं रही।

गुरु अर्जन देव जी ने भगतों, भट्टों और गुरु घर से जुड़े सिख भक्तों की बाणी को गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल करके न सिर्फ़ इस मुक़द्दस ग्रंथ की अज़मत को बढ़ाया, बल्कि पूरी इंसानियत के सामने धार्मिक सद्भाव, बराबरी और भाईचारे की एक बेमिसाल मिसाल भी पेश की।

इसी वजह से सिख धर्म अपनी शुरुआत से लेकर आज तक हर मज़हब का एहतिराम करता आया है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में हिंदू और मुस्लिम संतों की बाणी शामिल होने के कारण ये ग्रंथ सिर्फ़ सिखों का ही नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत की साझा रूहानी विरासत माना जाता है।

स्टोरी– अस्सिटेंट प्रोफ़ेसर रविंद्र सिंह

इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: इमदाद इमाम असर: उर्दू अदब के आलिम, नाक़िद और दानिशवर शख़्सियत

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