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पिछोड़ा, नाथ और पहुंची: उत्तराखंड की वो ‘रवायत’ जो फैशन की दुनिया में भी नहीं हारी

फैशन की दुनिया में हर साल नए अंदाज आते हैं, और पुराने गायब हो जाते हैं। मगर उत्तराखंड (Uttarakhand) की पहाड़ियों में एक ऐसी रवायत है, जो वक़्त के तूफ़ानों में भी नहीं डगमगाई। आज भी शादियों, त्योहारों और कुनबे की खुशियों में लोग अपनी मिट्टी की पोशाक इस नाज़ो-अंदाज़ के साथ पहनते हैं, गोया वो शहरों की चकाचौंध में भी अपने गांव की महक को संजोए हुए हैं।

ये कपड़े और गहने सिर्फ़ ज़ीनत नहीं हैं। ये तो यादों की बातें हैं, जज़्बातों का समंदर हैं, और अपनी अस्ल जड़ों से मोहब्बत का पैगाम हैं। आइए, इस कशिश के पीछे छिपी वो हक़ीक़त (सच्चाई) समझें, जो इसे आज भी जां-ए-जहां बनाए हुए है।

पिछोड़ा: मां-बाप की दुआओं का आंचल

पिछोड़ा (Pichhauda) सिर्फ़ एक पीला-नारंगी कपड़ा नहीं, बल्कि कुमाऊंनी तहज़ीब (Kumaoni Tehzeeb) यानी संस्कृति का वो ताज है, जो हर दुल्हन की शान बढ़ाता है। ये उस बरकत की निशानी है, जो सदियों से बड़ी-बुज़ुर्गों की बोली और दुआ के साथ बहुओं तक पहुंची है। जब कोई महिला इसे ओढ़ती है, तो ऐसा लगता है मानो उसने अपनी दादी-नानी की रूह को अपने कंधों पर बिठा लिया हो। ये पीला रंग नूर है, तो लाल बेलें ख़ुशहाली की मुस्कान हैं।

Image-Artist Clicks

नाथ: नाक का वो गहना जो ‘इज़्ज़त’ कहलाता है

उत्तराखंड की नाथ (Nath) यानी नाक का आभूषण देखकर कोई भी हैरान हो उठे। ये सिर्फ़ चांदी-सोने का टुकड़ा नहीं, ये तो उस ज़माने की पहचान है, जब औरतें बिना कुछ कहे अपनी हैसियत बता देती थीं। शादी के दिन दुल्हन की नाक पर सजी ये नाथ, उसके ख़्वाबों को सोने की तरह चमकाती है। ये उन मेहनत-कश कारीगरों की कारीगरी का नतीजा है, जिन्होंने पीढ़ियों तक इसे बनाने में अपनी जान लगा दी।

मांगटीका: माथे की वो ‘रोशनी’ जो दिल को सुकून दे

माथे पर सजा मांगटीका (Maang Tikka), जैसे किसी दिल-नशीं चित्रकारी का आखिरी कलाकारी हो। हिंदुस्तानी रिवाज में माथे को रूह का दरवाज़ा माना गया है, और यहां सजी मांगटीका उस दरवाज़े की कुंजी है। ये सिर्फ़ शादी का गहना नहीं है, ये तो परिवार की वो अमानत है, जो दादी-मां से बेटी तक पहुंचती है, और हर बार पहनने पर एक नया एहसास देती है। ये नारीत्व और सांस्कृतिक गैरत की ज़िंदा मिसाल है।

Image- Exotic Uttarakhand

गलोबंद: गले का वो ‘हार’ जो मोहब्बत की रखवाली करे

काले मोतियों की इस हार को ‘गलोबंद’ (Galoband/Choker) कहते हैं, जिसके बीचों-बीच सोने का पेंडेंट दिल-अफ़ज़ा लगता है। हमारी रिवायत (परंपरा) में काले मोतियों को बुरी नज़र (बला) से बचाने वाला माना गया, यानी ये उस औरत के इमान और उसकी शादी की सलामती की दस्तान कहता है। आज भी, चाहे ज़माना कितना भी बदल जाए, एक विवाहिता के गले में गलोबंद की चमक उसे सदियों पुरानी उस तेहज़ीब से मिलाती है, जहां हर लहरा अपनी अलग कहानी रखता था।

Image-Saim makeup artist

पहुंची: जब कलाइयां बोलती हैं

लाल मखमल और सोने की बेलों से सजी पहुंची को देखकर ऐसा लगता है जैसे कलाईयों ने कोई जश्न मना लिया हो। ये वो तोहफा है, जो पति या मां-बाप अपनी जिगर-ए-तुंद (बेटी) को उसकी विदाई पर देते हैं। कारीगरों ने इसे बनाने में जो मेहनत और मुहब्बत डाली है, वो इसके हर नक़्श में झलकती है। ये सिर्फ़ आभूषण नहीं, ये वक्त को क़ैद करने का एक फ़न है, जो हर शादी की रंगत को सदियों तक महकाता रहेगा।

Image- in.pinterest.com

आख़िरी बात: जब ‘रूह’ और ‘मिट्टी’ का रिश्ता अटूट हो

ये पिछोड़ा, नाथ, मांगटीका, गलोबंद और पहुंची… ये सब मिलकर उत्तराखंड की उस मज़बूत पहचान को बुनते हैं, जिसे कोई फैशन का ट्रेंड नहीं हरा सकता। ये सिर्फ़ उंगलियों या गले की सजावट नहीं हैं, ये यादों के ख़ज़ाने हैं, विरासत की दौलत है, और पहाड़ की आज़ाद हवा का वो झोंका है, जो शहरों की धूल में भी दम तोड़ने नहीं देता।

आज जब दुनिया रेज़ा-रेज़ा टुकड़ों में बंटती जा रही है, ये पोशाकें हमें एक-जुट करने का पैग़ाम देती हैं। ये हमें याद दिलाती हैं कि हम कोई भी कपड़ा पहन लें, लेकिन अपनी मिट्टी और अपने बुज़ुर्गों की दी हुई ये जमात हमारा ताज है, और ये ज़ाहिर है कि ये तोहफा किसी भी मौसम में अपनी नज़ाकत और तेज़ी नहीं खोएगा।

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