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गिल कलां बना आपसी भाईचारे और एकता की मिसाल

पंजाब इस समय पानी की कमी की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे दौर में बठिंडा ज़िले के रामपुरा ब्लॉक का एक छोटा-सा गांव गिल कलां पूरे मुल्क़ के लिए एक मिसाल बनकर उभरा है। गिल कलां ने लोगों की साझी भागीदारी, ज़िम्मेदारी और बेहतर जल प्रबंधन का ऐसा नमूना पेश किया है, जिसकी तारीफ़ अब राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने गिल कलां को पानी के बेहतर इंतज़ाम के लिए “मॉडल गांव” के तौर पर पहचान दी है। ये सम्मान साबित करता है कि जब गांव के लोग मिलकर काम करते हैं, तो बड़े से बड़ा मक़सद भी हासिल किया जा सकता है।

गिल कलां की इस कामयाबी को “सुजल ग्राम संवाद” के दौरान ख़ास तौर पर सराहा गया। ये वर्चुअल प्रोग्राम जल जीवन मिशन के तहत आयोजित किया गया था, जिसमें देश भर के चुने हुए गांवों और प्रशासनिक अफ़सरों ने हिस्सा लिया। इस पहचान ने न सिर्फ़ गिल कलां गांव का नाम रोशन किया है, बल्कि बठिंडा और पूरे पंजाब को भी पानी के बेहतर प्रबंधन और लोगों की भागीदारी के लिए एक नई पहचान दी है। केंद्र सरकार के वरिष्ठ अफ़सरों ने कहा कि गिल कलां के मॉडल को दूसरे राज्यों के गांवों में भी अपनाया जाना चाहिए।

मज़बूत व्यवस्था और लोगों की साझी ज़िम्मेदारी

गिल कलां की इस कामयाबी के पीछे गांव वालों की मेहनत के साथ-साथ मज़बूत सरकारी ढांचा भी है। गांव में पीने के पानी की सप्लाई ज़्यादातर नहर के पानी पर निर्भर करती है। साल 2020 में गांव की पुरानी जल आपूर्ति योजना को आधुनिक ज़रूरतों के मुताबिक़ बेहतर बनाया गया। इस काम पर करीब 2.96 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए। इसके बाद 2021-22 के दौरान नई पाइपलाइनें बिछाई गई, पानी के टैंकों की मरम्मत की गई और पूरे सिस्टम को और मज़बूत बनाया गया।

Pic Credit: DPRO Bathinda

इस सफ़र में सबसे अहम मोड़ सितंबर 2022 में आया, जब जल आपूर्ति एवं स्वच्छता विभाग ने इस पूरी योजना के इंतज़ाम, संचालन और रख-रखाव की ज़िम्मेदारी गांव की ग्राम पंचायत जल आपूर्ति समिति को सौंप दी। यहीं से गिल कलां के लिए मज़बूत व्यवस्था और अपनी ज़िम्मेदारी से पानी के प्रबंधन का एक नया दौर शुरू हुआ।

मुश्किलों से कामयाबी तक का सफ़र

गिल कलां की ये कामयाबी आसानी से नहीं मिली। गांव में कुल 784 घर हैं। शुरुआत में कई गांव वालों को नहर के पानी पर आधारित सरकारी जल आपूर्ति व्यवस्था पर भरोसा नहीं था। वो सबमर्सिबल पंपों से निकलने वाला ज़मीन के नीचे का पानी इस्तेमाल करना पसंद करते थे, जबकि वो सेहत के लिए पूरी तरह महफ़ूज़ नहीं था। इस सोच को बदलने के लिए पंचायत, जल आपूर्ति समिति और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लगातार जागरूकता मुहिम चलाई। वो घर-घर जाकर लोगों से मिले और उन्हें साफ़ और सुरक्षित पीने के पानी के फ़ायदे समझाए।

लोगों का भरोसा जीतने के लिए पानी की गुणवत्ता की जांच उनके सामने ही फील्ड टेस्टिंग किट के ज़रिए की गई। जब गांव वालों ने अपनी आंखों से जांच की पूरी प्रक्रिया और उसके अच्छे नतीजे देखे, तो सरकारी जल आपूर्ति पर उनका एतमाद बढ़ने लगा। धीरे-धीरे लोगों ने ख़ुद आगे आकर अपने घरों में नल कनेक्शन के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया। आखिरकार गांव के सभी 784 घरों तक नल के ज़रिए पानी पहुंचाया गया और गांव ने 100 फ़ीसदी कवरेज का मक़सद हासिल कर लिया।

Pic Credit: DPRO Bathinda

आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर जल व्यवस्था

गिल कलां मॉडल की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि ये योजना सिर्फ़ पानी की सप्लाई तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक तौर पर भी मज़बूत व्यवस्था है। आज गांव के हर घर तक रोज़ाना बिना किसी रुकावट के चार घंटे साफ़ पीने का पानी पहुंचाया जाता है। पूरे सिस्टम का इंतज़ाम ग्राम पंचायत जल आपूर्ति समिति करती है। तकनीकी कामकाज और रख-रखाव के लिए एक निजी पंप ऑपरेटर रखा गया है। उसकी तनख़्वाह और दूसरे ख़र्चे गांव वालों ने जमा किए जाने वाले मामूली पानी के बिलों से पूरे किए जाते हैं।

गांव के लोग हर महीने वक़्त पर अपने बिल जमा करते हैं। सभी सालाना ख़र्चे पूरे करने के बाद भी समिति को हर साल करीब 2 लाख रुपये की बचत हो जाती है। अब तक समिति के बैंक खाते में करीब 6 लाख रुपये जमा हो चुके हैं। ये रकम आगे चलकर किसी बड़ी मरम्मत, नए काम या जल व्यवस्था के विस्तार में इस्तेमाल की जा सकती है। इससे सरकारी अनुदान या मदद पर निर्भरता भी कम हो जाती है।

लोगों के सहयोग से योजनाएं बनती हैं कामयाब

बठिंडा के डिप्टी कमिश्नर राजेश धीमान ने इस कामयाबी के लिए गांव की पंचायत, जल आपूर्ति समिति, विभाग के इंजीनियरों और पूरे गांव के लोगों की सराहना की। उन्होंने कहा कि गिल कलां ने ये साबित कर दिया है कि जब सरकारी योजनाओं को लोगों का सहयोग मिलता है, तो वो लंबे समय तक सफलतापूर्वक चल सकती हैं। इस गांव ने ज़िम्मेदारी और साफ़-सुथरे कामकाज की एक नई मिसाल पेश की है।

राजेश धीमान के मुताबिक़, नियमित जागरूकता कैंप, सामुदायिक बैठकें और पानी की लगातार जांच ने लोगों को इस मुहिम से जोड़कर रखने में अहम भूमिका निभाई। इसी वजह से गांव वाले जल व्यवस्था में सक्रिय रूप से शामिल रहे और इस योजना को कामयाब बनाया।

Pic Credit: DPRO Bathinda

दूसरे गांवों के लिए एक मिसाल

गिल कलां की कामयाबी सिर्फ़ एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि ये पूरे देश के हज़ारों गांवों के लिए एक राह दिखाने वाली मिसाल है। ये मॉडल बताता है कि गांवों की तरक़्क़ी सिर्फ़ बड़े बजट या सरकारी फंड से नहीं होती। असली फ़र्क़ लोगों की एकजुटता, साफ़ और ईमानदार इंतज़ाम तथा सार्वजनिक सुविधाओं को अपनी साझा ज़िम्मेदारी समझने की सोच से पड़ता है।

आज गिल कलां देश में लोगों की भागीदारी से चलने वाली जल आपूर्ति व्यवस्था के सबसे बेहतरीन उदाहरणों में से एक बन चुका है। उम्मीद की जा रही है कि पंजाब और देश के दूसरे गांव भी गिल कलां से प्रेरणा लेंगे और आत्मनिर्भर, टिकाऊ और बेहतर विकास की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

स्टोरी– गुरप्रीत सिंह

इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें

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