उर्दू अदब की दुनिया में कुछ ऐसे नाम भी हैं जो शोहरत के शोर से दूर रहकर अपने कलाम की ख़ुशबू से लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं। कृष्ण मोहन भी ऐसे ही शायर थे। उनका असली नाम कृष्ण लाल भाटिया था, लेकिन अदबी दुनिया उन्हें “कृष्ण मोहन” के नाम से जानती है।
कृष्ण मोहन की पैदाइश 28 नवंबर 1922 को सियालकोट में हुयी थी। उनके वालिद गणपत राय भाटिया मेरठ ज़िला अदालत में वकील थे। दिलचस्प बात यह है कि उनके पिता ख़ुद भी उर्दू शायरी करते थे और “शाकिर” तख़ल्लुस इस्तेमाल करते थे। शायद यही वजह थी कि अदब और शायरी का ज़ौक़ कृष्ण मोहन को विरासत में मिला।
उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम सियालकोट में हासिल की। इसके बाद सियालकोट से अंग्रेज़ी और फ़ारसी में बी.ए. (ऑनर्स) किया। कॉलेज के दिनों में वह कॉलेज मैगज़ीन के संपादक भी रहे। आगे चलकर उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की डिग्री हासिल की।
सन 1947 के बंटवारे ने लाखों लोगों की तरह कृष्ण मोहन की ज़िंदगी को भी प्रभावित किया। उनका परिवार सियालकोट छोड़कर करनाल आ गया। शुरुआती दिनों में उन्होंने वेलफ़ेयर ऑफ़िसर के तौर पर काम किया। बाद में वह आकाशवाणी की मशहूर पत्रिका “आवाज़” से जुड़े और लखनऊ तथा दिल्ली में सब-एडिटर और असिस्टेंट एडिटर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो में पत्रकारिता की और फिर भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में आयकर अधिकारी बने।
नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद उनका रिश्ता शायरी से कभी नहीं टूटा। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म और अन्य विधाओं में भरपूर लेखन किया। उनके अब तक 28 से ज़्यादा काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें शबनम शबनम, दिल-ए-नादां, तमाशाई, ग़ज़ल, निगाह-ए-नाज़, आहंग-ए-वतन, बैरागी भंवरा, शीराज़ा, मिश्गां, ज्ञान मार्ग की नज़्में, कुफ़्रिस्तान, उदासी के पांच रूप, हरजाई और तेरी ख़ुशबू जैसी किताबें शामिल हैं।
कृष्ण मोहन की शायरी में ज़िंदगी का तजुर्बा, मोहब्बत की नर्मी, तन्हाई का दर्द और इंसानी जज़्बात की गहराई साफ़ दिखाई देती है। उनके अशआर सादगी के साथ दिल पर असर छोड़ते हैं।
“वो क्या ज़िंदगी जिस में जोशिश नहीं,
वो क्या आरज़ू जिस में काविश नहीं।”
यह शेर उनकी ज़िंदगी की फ़लसफ़ियाना सोच को बयान करता है कि कोशिश और जद्दोजहद के बिना न ज़िंदगी मुकम्मल है और न ही ख़्वाहिशें।
“ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे ख़ुशी से भर गया,
एक दिन इतना हंसा वो, हंसते-हंसते मर गया।”
इस शेर में ज़िंदगी और मौत दोनों को एक अनोखे अंदाज़ में पेश किया गया है।
“कृष्ण ‘मोहन’ ये भी है कैसा अकेलापन कि लोग,
मौत से डरते हैं, मैं तो ज़िंदगी से डर गया।”
उनकी शायरी में इश्क़ भी है, उदासी भी और उम्मीद की लौ भी। वह लिखते हैं
“दिल एक सदियों पुराना उदास मंदिर है,
उम्मीद तरसा हुआ प्यार देवदासी का।”
उर्दू ज़बान से उनकी मोहब्बत भी उनके कलाम में बार-बार झलकती है। उर्दू के बारे में उन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से कहा—
“चाहतों का जहान है उर्दू,
राहतों का निशान है उर्दू।”
“इश्क़ का एतिबार और वक़ार,
हुस्न की आन-बान है उर्दू।”
यह अशआर बताते हैं कि कृष्ण मोहन के लिए उर्दू सिर्फ़ एक ज़बान नहीं, बल्कि मोहब्बत, तहज़ीब और ख़ूबसूरती की मिसाल थी।
साल 2004 में दिल्ली में उनका इंतिक़ाल हो गया, लेकिन उनका कलाम आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा है। कृष्ण मोहन उन शायरों में शामिल हैं जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के अपनी शायरी के ज़रिए उर्दू साहित्य को समृद्ध किया और अपनी एक अलग पहचान बनाई।
ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।



