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गंडिकोटा-दिगुवापट्टनम की गुफाओं में मिला 10 लाख साल पुराना रहस्य,मद्रास यूनिवर्सिटी के छात्र की चौंकाने वाली खोज 

 क्या आप जानते हैं कि आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) के एक सुदूर इलाके में इंसानी सभ्यता के 10 लाख साल पुराने सबूत मिले हैं? जी हां, ये कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि हाल ही में हुई एक चौंकाने वाली खोज है। गंडिकोटा-दिगुवापट्टनम क्षेत्र (Gandikota-Diguvapatnam area) में पुरातत्वविदों को ऐसे प्रमाण मिले हैं जो दक्षिण भारत के इतिहास को पूरी तरह से बदल सकते हैं।

कैसे हुई ये बड़ी खोज?

ये ऐतिहासिक खोज मद्रास यूनिवर्सिटी (University of Madras) के प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग के छात्र सुदर्शन आर ने अपनी पोस्टग्रेजुएट पढ़ाई के दौरान की। उन्हें इस क्षेत्र में कुछ असामान्य चीज़ें दिखीं, जिन्होंने उनको इसमें आगे बढ़ने को मजबूर किया। धीरे-धीरे जब उन्होंने इस इलाके की बारीकी से जांच शुरू की तो एक के बाद एक चौंकाने वाले सबूत मिलते गए।

35 गुफाएं, हजारों साल का इतिहास

लेकिन सबसे ख़ास बात यह है कि ये पेंटिंग एक साथ नहीं बनाई गईं। एक ही दीवार पर अलग-अलग समय की पेंटिंग एक-दूसरे के ऊपर बनी हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हजारों सालों तक लोग इन गुफाओं में आते रहे और अपनी कला को यहां पेश करते रहे। ये उस वक्त की सोशल मीडिया जैसा था, जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग अपने अनुभवों को चित्रों के रूप में छोड़ते गए।

क्या-क्या दिखता है इन चित्रों में?

इन प्राचीन चित्रों में आप देख सकते हैं:

 रोजमर्रा की जिंदगी :- लोग कैसे रहते थे, क्या खाते-पीते थे

 जंगली जानवर :- हाथी, बाघ, हिरण जैसे जानवरों के चित्र

 जलीय प्रजातियां :- मछलियां और दूसरे जलीय जीव

शिकार के सीन :- कैसे प्राचीन मानव शिकार करते थे

हस्तरेखा के निशान:- मानो अपनी पहचान छोड़ी हो

खगोलीय संकेत:- सूर्य, चांद और सितारों के चक्र

सबसे दिलचस्प बात ये है कि इन चित्रों में मौसम और खगोलीय चक्रों के संकेत मिले हैं। इसका मतलब प्राचीन मानव इतना बुद्धिमान था कि वो सूर्य, चांद और मौसमों के बदलाव को समझता था और उसे अपनी कला में दिखाता था।

मद्रास यूनिवर्सिटी (Image-wikipedia)

Lower Palaeolithic Period  से शुरू होता है सफ़र

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र में निचले पुरापाषाण काल (Lower Palaeolithic Period) से लेकर ऐतिहासिक काल तक लगातार मानव बस्ती के सबूत मिले हैं। यानी यहां करीब 10 लाख साल पहले से लेकर आज तक इंसान रहते आए हैं।  ये दक्षिण भारत के इतिहास को समझने के लिए एक सुनहरा मौका है।

शोधकर्ताओं को यहां बड़ी मात्रा में पत्थर के औजार भी मिले हैं। ये औजार बताते हैं कि कैसे प्राचीन मानव ने शिकार करना, खाना पकाना और दूसरे काम करना सीखा।

किसके मार्गदर्शन में हुई ये खोज?

इस पूरे अभियान को मद्रास विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग की डॉ. जिनु कोशी (Dr. Jinu Koshy of the Department of Ancient History and Archaeology, University of Madras) ने लीड किया है। वे इस खुदाई की प्रभारी थीं। सुदर्शन आर ने इस डिस्कवरी और डॉक्युमेंटेशन प्रोग्राम को ऑपरेट किया।

उनकी टीम में शामिल थे:

  • पुरातत्वविद् सासिधरन आर
  • संजय एस
  • भारत के
  • पार्थिबन
  • जीवा

इन सभी ने मिलकर इस ऐतिहासिक खोज को संभव बनाया।

अभी और बाकी है शोध

ये खोज तो शुरुआत है। अभी बहुत कुछ बाकी है। सुधर्षन और उनकी टीम इस क्षेत्र की गहन वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं। इस पर Comprehensive academic research paper भी तैयार किए जा रहे हैं।

क्यों ज़रूरी है इसका संरक्षण?

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को तुरंत संरक्षित करने की ज़रूरत है। ये क्षेत्र दक्षिण भारत के प्रागैतिहासिक इतिहास को समझने का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है। लेकिन बिना संरक्षण के ये निशान मिट सकते हैं।

गंडिकोटा-दिगुवापट्टनम की ये खोज Indian Archaeology के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। ये हमें बताती है कि हमारे पूर्वज कितने बुद्धिमान, कलाप्रेमी और वैज्ञानिक सोच वाले थे। ये हमारी जिम्मेदारी है कि इस अनमोल धरोहर को बचाकर रखें और आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत से रूबरू कराएं।

ये भी पढ़ें:   ‘ऐब-ए-रवां’ से ‘बाफ़्त-हवा’ तक : वो भारतीय शान जिसने मुगलों को दीवाना बनाया, मलमल जिसे देख यूरोप हैरान रह गया

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