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वली दक्कनी: फ़ारसी के दौर में उर्दू का परचम बुलंद करने वाले शायर 

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका ज़िक्र किए बिना इस ज़बान की कहानी अधूरी लगती है। ऐसा ही एक नाम है वली दक्कनी का, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल का बानी (जनक) भी कहा जाता है। वली ने उस दौर में उर्दू को शायरी की ज़बान बनाया, उस दौर में फ़ारसी को शायरी और अदब की सबसे मुअतबर ज़बान समझा जाता था।

वली दक्कनी का पूरा नाम वली मुहम्मद वली था। उनकी पैदाइश करीब 1667 में औरंगाबाद में हुयी मानी जाती है। कुछ इतिहासकार उन्हें गुजरात से भी जोड़ते हैं, इसलिए उन्हें वली गुजराती भी कहा जाता है। उन्होंने अपने ज़िंदगी में दिल्ली, सूरत, बुरहानपुर, मक्का और मदीना तक का सफ़र किया। वली का मानना था कि सफ़र इंसान को इल्म और तजुर्बा दोनों देता है।

उस समय ग़ज़लें ज़्यादातर फ़ारसी में लिखी जाती थीं। लेकिन वली ने आम लोगों की बोली, यानी रेख़्ता या शुरुआती उर्दू को अपनी शायरी का ज़रिया बनाया। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में हिंदुस्तान की मिट्टी की ख़ुशबू, स्थानीय मुहावरे, प्रेम, प्रकृति और सूफ़ियाना एहसास को जगह दी। यही वजह है कि उनकी शायरी सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचती थी।

साल 1700 में वली की दिल्ली यात्रा उर्दू साहित्य के इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुई। जब उनका दीवान दिल्ली पहुंचा तो वहां के फ़ारसी पसंद शायर हैरान रह गए। उन्होंने देखा कि उर्दू जैसी आम बोलचाल की भाषा में भी बेहद ख़ूबसूरत और असरदार शायरी की जा सकती है। कहा जाता है कि वली की शायरी ने आगे चलकर मीर, सौदा और ज़ौक़ जैसे महान शायरों को मुत्तासिर किया।

वली की शायरी का सबसे बड़ा मौज़ू इश्क़ था। लेकिन उनके इश्क़ में सूफ़ियाना रंग भी था, जहां आशिक़ और माशूक़ के रिश्ते में रूहानी मायने छिपे होते थे। उनकी ग़ज़लों में दर्द भी है, मोहब्बत भी, और ज़िंदगी को क़बूल करने का हौसला भी।

उनका एक मशहूर शेर है

“जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे,
उसे ज़िंदगी क्यों न भारी लगे।”

वली दक्कनी

इस एक शेर में मोहब्बत की पूरी कैफ़ियत समा जाती है। इश्क़ इंसान को बदल देता है और उसकी दुनिया को नया रंग दे देता है।

वली की भाषा उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी। उन्होंने फ़ारसी अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल किया, लेकिन साथ ही हिंदुस्तानी ज़बान की सादगी और मिठास भी बरक़रार रखी। यही वजह है कि उनकी शायरी में एक अलग ही लुत्फ़ महसूस होता है।

“याद करना हर घड़ी तुझ यार का,
है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का।”

वली दक्कनी

इस शेर में मोहब्बत की वह तड़प दिखाई देती है जो आशिक़ को हर पल अपने महबूब की याद में डुबोए रखती है।

वली सिर्फ़ ग़ज़ल तक महदूद नहीं रहे। उन्होंने मसनवी, रुबाई, क़सीदा और मुख़म्मस जैसी कई काव्य विधाओं में भी लेखन किया। लेकिन उनकी असली पहचान ग़ज़ल ही बनी। उनके दीवान में करीब 473 ग़ज़लें और तीन हज़ार से ज़्यादा अशआर मिलते हैं।

1707 में अहमदाबाद में उनका इंतकाल हुआ और वहीं उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनकी मज़ार लंबे समय तक अदब प्रेमियों के लिए एक अहम निशानी रही। हालांकि 2002 के गुजरात दंगों में उनकी मज़ार को नुक़सान पहुंचाया गया, जिसने साहित्य जगत को गहरा दुख पहुंचाया।

गुल हुए ग़र्क़ आब-ए-शबनम में
देख उस साहिब-ए-हया की अदा

वली दक्कनी

उर्दू ग़ज़ल की दुनिया में वली दक्कनी एक ऐसे चराग़ हैं, जिसकी रौशनी आज भी नई नस्लों को राह दिखा रही है। अगर मीर को उर्दू ग़ज़ल का ख़ुदा-ए-सुख़न कहा जाता है, तो वली दक्कनी वह शख़्स हैं जिन्होंने इस बाग़ की पहली कली खिलाई थी।

ये भी पढ़ें: मीर अनीस: मर्सिया का बादशाह और उर्दू शायरी का एक नायाब सितारा

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