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गुरु अमर दास जी: वो सिख गुरु जिन्होंने बराबरी का संदेश देकर जाती व्यवस्था की दीवारें तोड़ीं

गुरु अमर दास जी की पैदाइश 1479 में पंजाब के अमृतसर ज़िले के बासरके गांव में तेज भान और माता लखमी के घर हुई थी। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 60 से ज़्यादा साल वैष्णव परंपराओं का पालन करते हुए बिताए। हर साल वो नंगे पैर हरिद्वार की यात्रा करते, व्रत रखते और अपने धर्म से जुड़ी तमाम रस्में निभाते थे। लोगों की नज़र में वो एक बेहद धार्मिक और नेक इंसान थे।

लेकिन उनके दिल में एक कमी थी, जिसे वो खुद भी पूरी तरह समझ नहीं पाए थे। एक बार हरिद्वार से लौटते वक़्त एक साधु ने उन्हें “निगुरा” कहा, यानी ऐसा शख़्स जिसका कोई रूहानी गुरु न हो। ये लफ़्ज़ उनके दिल को छू गया। उन्हें महसूस हुआ कि वो जिस सच्चाई और सुकून की तलाश में हैं, वो अभी अधूरी है।

फिर एक सुबह उनकी ज़िंदगी ने नया मोड़ लिया। उन्होंने अपने घर में बीबी अमरो जी की आवाज़ सुनी। बीबी अमरो, दूसरे सिख गुरु गुरु अंगद देव जी की बेटी और उनके भतीजे की पत्नी थी। वो गुरु नानक देव जी की वाणी का पाठ कर रही थी। उन अल्फ़ाज़ में ऐसी मिठास, ऐसी रूहानियत थी कि गुरु अमर दास जी का दिल ठहर-सा गया। उन्होंने तुरंत पूछा कि ये वाणी किसकी है और उन्हें उन शब्दों के स्रोत तक ले चलने को कहा। जब गुरु अमर दास जी खडूर साहिब पहुंचे और गुरु अंगद देव जी के सामने बैठे, तब उनकी उम्र 61 साल थी।

Pic Credit: SikhiWiki

12 साल की लगातार सेवा

सिख धर्म से जुड़ने के बाद गुरु अमर दास जी की ज़िंदगी सिर्फ़ आस्था तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सेवा को अपना मक़सद बना लिया। ये ऐसी रोज़ाना की मेहनत और लगन थी, जिसे उनकी आधी उम्र का इंसान भी निभाने में मुश्किल महसूस करता।

हर सुबह अंधेरा रहते ही गुरु अमर दास जी करीब तीन मील पैदल चलकर ब्यास नदी तक जाते। वहां से पानी भरकर लाते ताकि गुरु अंगद देव जी स्नान कर सकें। तेज़ बारिश हो, ठंडी हवा चले या कड़ाके की सर्दी पड़े, उनकी ये दिनचर्या कभी नहीं टूटी।

इसके अलावा वो लंगर के लिए लकड़ियां इकट्ठा करते, बर्तन साफ़ करते और संगत के हर छोटे-बड़े काम को पूरी ख़ामोशी और ख़ुलूस के साथ अंजाम देते। उन्होंने कभी किसी से शिकायत नहीं की और न ही अपनी सेवा के बदले किसी तारीफ़ या पहचान की उम्मीद रखी।

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ये सिलसिला लगातार 12 साल तक चलता रहा

उनकी इसी बेमिसाल सेवा और समर्पण को देखते हुए गुरु अंगद देव जी ने उन्हें कई सम्मानजनक उपाधियां दी। उन्होंने गुरु अमर दास जी को “बेइज़्ज़त लोगों की इज़्ज़त”, “कमज़ोरों की ताक़त” और “बेबसों का सहारा” कहा। आख़िरकार 1552 में गुरु अमर दास जी को सिख धर्म का तीसरा गुरु बनाया गया। गुरु अमर दास जी ने इस जीवन-दर्शन को अपनी बाणी में भी बयान किया है—

“गुर की कार कमावणी भाई, आपु छोड़ चित लाई।
सदा सहज फिर दुख न लगई भाई, हर आप वसै मन आई।”

इसका मतलब है कि जो इंसान अपने अहंकार को छोड़कर पूरे दिल से सेवा करता है, उसके दिल में सुकून बस जाता है। जब इंसान का “मैं” कम हो जाता है, तो दुख और बेचैनी भी कम होने लगती है। ऐसे सुकून भरे दिल में ही रब का नूर बसता है।

गुरु अमर दास जी की ज़िंदगी हमें सिखाती है कि सच्ची इबादत सिर्फ़ पूजा या रस्मों में नहीं, बल्कि ख़ामोशी से की गई सेवा और इंसानियत में होती है।

Pic Credit: SikhiWiki

लंगर और बादशाह अकबर: बराबरी की एक मिसाल

लंगर की शुरुआत गुरु नानक देव जी ने की थी, लेकिन गुरु अमर दास जी ने इसे एक मज़बूत व्यवस्था और गहरे सामाजिक पैग़ाम के साथ आगे बढ़ाया। गोइंदवाल साहिब, जो उस समय उनका प्रमुख केंद्र था, वहां गुरु अमर दास जी ने एक सख़्त लेकिन बेहद अहम नियम बनाया। उन्होंने कहा कि जो भी उनसे मिलने आएगा, उसे पहले लंगर में बैठकर सबके साथ खाना खाना होगा। इसके बाद ही वो गुरु जी से मुलाक़ात कर सकेगा।

इस नियम में किसी के लिए कोई छूट नहीं थी। किसान हो या ज़मींदार, अमीर हो या ग़रीब, सभी एक ही जगह बैठकर, एक ही रसोई का खाना खाते थे। इसी वजह से यह मशहूर उसूल बना— “पहले पंगत, फिर संगत” यानी पहले सबके साथ बैठकर भोजन करो, फिर गुरु की संगत में शामिल हो। मुग़ल बादशाह अकबर जब गुरु अमर दास जी से मिलने गोइंदवाल पहुंचे, तो उसे भी यही नियम मानना पड़ा।

बादशाह होने के बावजूद अकबर आम लोगों के साथ ज़मीन पर बैठा। उसने लंगर में मक्के की रोटी और काली दाल खाई, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई आम मुसाफ़िर खाता। कहा जाता है कि इस तजुर्बे से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उसने लंगर के लिए बड़ी ज़मीन दान करने की पेशकश की। लेकिन गुरु अमर दास जी ने ये पेशकश ठुकरा दी।

उन्होंने कहा कि लंगर लोगों की मेहनत की कमाई और उनकी ख़ुशी से दी गई मदद से चलता है। इसकी असल ताक़त यही है, इसलिए इसे किसी बादशाह की जागीर या एहसान नहीं बनना चाहिए। गुरु अमर दास जी का ये फ़ैसला महज़ एक इंकार नहीं था, बल्कि एक गहरा सामाजिक पैग़ाम था।

Pic Credit: Social Media

उनका मानना था कि अगर लंगर किसी बादशाह के दान से चलेगा, तो वो बादशाह की ख़ैरात कहलाएगा। लेकिन अगर वो आम लोगों की मेहनत और योगदान से चले, तो वो पूरी संगत का होगा। 16वीं सदी के भारत में, जहां समाज जात-पात और ऊंच-नीच में बंटा हुआ था, ये सोच बेहद क्रांतिकारी थी। उस दौर में जाति के आधार पर तय होता था कि कौन किसके साथ बैठ सकता है, किसके हाथ का खाना खा सकता है और किसके साथ एक बर्तन साझा कर सकता है। लेकिन लंगर ने इन तमाम दीवारों को चुनौती दी।

जब अलग-अलग जातियों, तबकों और हैसियत के लोग एक ही कतार में बैठकर खाना खाने लगे, तो समाज में बराबरी का एक नया पैग़ाम फैला। यही वजह है कि “पहले पंगत, फिर संगत” सिर्फ़ एक परंपरा नहीं थी, बल्कि जात-पात के ख़िलाफ़ एक ख़ामोश इंक़लाब था, जिसने लोगों को ये एहसास कराया कि इंसान की असली पहचान उसकी इंसानियत है, न कि उसकी जाति या दौलत।

महिलाओं के हक़ और समाज सुधार की आवाज़

गुरु अमर दास जी जिस दौर में पैदा हुए थे, उस समय समाज में महिलाओं के साथ कई तरह की नाइंसाफ़ियां होती थी। सती प्रथा प्रचलित थी, जिसमें पति की मौत के बाद पत्नी को उसकी चिता पर ज़िंदा जला दिया जाता था। इसके अलावा पर्दा प्रथा भी आम थी और महिलाओं को धार्मिक शिक्षा या नेतृत्व में कोई जगह नहीं दी जाती थी। गुरु अमर दास जी ने इन सभी रिवाज़ों को खुलकर चुनौती दी। सती प्रथा के बारे में उन्होंने साफ़ कहा कि किसी महिला की अच्छाई, वफ़ादारी या इज़्ज़त उसकी जान देने में नहीं, बल्कि मुश्किल हालात में हिम्मत और अच्छे किरदार के साथ ज़िंदगी जीने में है।

उनका मानना था कि अगर किसी औरत को अपने पति के प्रति वफ़ादारी साबित करने के लिए अपनी जान देनी पड़े, तो ये धर्म नहीं बल्कि एक ज़ुल्म है, जिसे इज़्ज़त और परंपरा का नाम दे दिया गया है। गुरु अमर दास जी ने अपनी संगत में पर्दा प्रथा को भी मंज़ूरी नहीं दी। महिलाओं को पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि खुले तौर पर समाज और धार्मिक सभाओं में शामिल होने का हक़ मिला। लेकिन उनका सबसे बड़ा क़दम इससे भी आगे था।

सिख धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने “मंजी व्यवस्था” शुरू की, जिसके तहत अलग-अलग इलाकों में धार्मिक केंद्र बनाए गए। पूरे क्षेत्र को 22 हिस्सों में बांटा गया और वहां प्रचार और शिक्षा की ज़िम्मेदारी लोगों को सौंपी गई।

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इनमें कई महिलाओं को भी धार्मिक उपदेशक और प्रचारक बनाया गया। वे लोगों को सिख धर्म की शिक्षाएं देती थीं और समुदाय का मार्गदर्शन करती थी। 16वीं सदी के उस दौर में, जब महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखा जाता था, उन्हें धार्मिक नेतृत्व की ज़िम्मेदारी देना एक बेहद बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव था। गुरु अमर दास जी ने सिर्फ़ महिलाओं के सम्मान की बात नहीं की, बल्कि उन्हें समाज और धर्म में बराबरी की जगह देकर उसे हक़ीक़त में भी बदलकर दिखाया।

मंजी व्यवस्था और बावली साहिब

गुरु अमर दास जी की सबसे अहम और लंबे समय तक असर डालने वाली कोशिशों में से एक थी मंजी व्यवस्था। ये एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसने सिख धर्म के संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने अलग-अलग इलाकों को 22 हिस्सों में बांटा और हर इलाके की ज़िम्मेदारी ऐसे सिखों को सौंपी, जिनका किरदार अच्छा था और जो लोगों का भरोसा जीत चुके थे। उनका काम लोगों को सिख धर्म की शिक्षाएं देना, समुदाय के अंदर होने वाले विवादों को सुलझाना और गोइंदवाल साहिब से संपर्क बनाए रखना था।

उस दौर में न तो आज जैसी संचार व्यवस्था थी और न ही आसान सफ़र के साधन। फिर भी मंजी व्यवस्था ने अलग-अलग इलाकों में सिख समुदाय को एक-दूसरे से जोड़े रखा और संगठन को मज़बूती दी। गोइंदवाल साहिब में गुरु अमर दास जी ने बावली साहिब का निर्माण भी करवाया। ये एक सीढ़ीदार कुआं था, जिसमें पानी तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां बनाई गई थी। इसका मक़सद सिर्फ़ पानी उपलब्ध कराना नहीं था। इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक पैग़ाम भी छिपा था।

Pic Credit: SikhNet

उस समय समाज में जात-पात का असर इतना गहरा था कि लोगों को उनकी जाति के आधार पर अलग-अलग कुओं और पानी के स्रोतों तक सीमित कर दिया जाता था। कई लोगों को कुछ कुओं से पानी लेने की भी इजाज़त नहीं होती थी। लेकिन बावली साहिब सभी के लिए खुली थी। यहां हर जाति, हर वर्ग और हर तबके के लोग एक ही जगह से पानी भरते थे और एक साथ स्नान करते थे। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। इस तरह बावली साहिब सिर्फ़ पानी का स्रोत नहीं थी, बल्कि बराबरी, भाईचारे और इंसानियत की एक ज़िंदा मिसाल थी, जिसने उस दौर की सामाजिक दीवारों को चुनौती दी।

आनंद साहिब और रूहानी संदेश

गुरु अमर दास जी ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ, श्री गुरु ग्रंथ साहिब में 907 बाणियों का योगदान दिया। उनकी रचनाएं 17 अलग-अलग रागों में लिखी गई हैं। इनमें सबसे मशहूर रचना आनंद साहिब है, जो रामकली राग में लिखी गई है। आनंद साहिब की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है—

“आनंद भइआ मेरी माए, सतिगुरु मैं पाइआ।”

यानी, “हे मां! मुझे सच्चे गुरु की प्राप्ति हुई है और मेरे दिल में आनंद भर गया है।”

ये बाणी उस खुशी और सुकून की बात करती है, जो दुनिया की दौलत, शोहरत या हालात पर निर्भर नहीं होती। ये वो अंदरूनी खुशी है, जो गुरु की शिक्षा को अपनाने और रब के रास्ते पर चलने से हासिल होती है। गुरु अमर दास जी का संदेश था कि जब इंसान अपने अहंकार को छोड़कर गुरु की सीख को दिल से कबूल कर लेता है, तब उसके अंदर एक ऐसा सुकून पैदा होता है, जिसे कोई मुश्किल या परेशानी छीन नहीं सकती।

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आज भी आनंद साहिब सिख धर्म की सबसे अहम बाणियों में से एक मानी जाती है। जन्म, विवाह, अंतिम संस्कार, अरदास और अन्य धार्मिक मौकों पर इसका पाठ किया जाता है। यूं कहें तो सिख ज़िंदगी के हर अहम मोड़ पर आनंद साहिब मौजूद रहती है। खुशी के लम्हों में भी और ग़म के वक़्त भी, ये बाणी लोगों को सब्र, सुकून और रूहानी ताक़त देने का काम करती है।

विनम्रता की एक बेमिसाल मिसाल

गुरु अमर दास जी की ज़िंदगी से जुड़ा एक वाक़या उनकी सादगी, सब्र और विनम्रता को बहुत खूबसूरती से दिखाता है। कहा जाता है कि एक दिन गोइंदवाल में संगत लगी हुई थी। उसी दौरान गुरु अंगद देव जी के पुत्र दातू वहां पहुंचे। वो ईर्ष्या और गुस्से से भरे हुए थे। गुस्से में उन्होंने गुरु अमर दास जी को सीने पर लात मार दी, जिससे वो अपनी जगह से नीचे गिर पड़े।

लेकिन जो हुआ, उसने वहां मौजूद सभी लोगों को हैरान कर दिया। गुरु अमर दास जी ने न तो गुस्सा किया, न कोई शिकायत की और न ही दातू को डांटा। इसके बजाय वे उठे, दातू का पैर अपने हाथों में लिया और बड़े प्यार से कहा— “मेरी बूढ़ी हड्डियों से कहीं आपके पैर को चोट तो नहीं लग गई?”

उनके इस जवाब में न नाराज़गी थी, न बदले की भावना और न ही अपने अपमान का कोई ज़िक्र। संगत में मौजूद लोगों ने उस पल एक ऐसे इंसान को देखा, जिसकी शख्सियत इतनी बुलंद थी कि उसे अपनी इज़्ज़त साबित करने या अपना बचाव करने की ज़रूरत ही नहीं थी।

चाहे इसे रूहानी बुलंदी कहें या अपने गुस्से और अहंकार पर पूरी पकड़, लेकिन इस घटना का असर बहुत गहरा था। गुरु अमर दास जी की ख़ामोशी और सब्र ने दातू के गुस्से को छोटा कर दिया, जबकि उनके अपने किरदार को और भी ऊंचा बना दिया। ये घटना आज भी हमें सिखाती है कि असली ताक़त गुस्से में जवाब देने में नहीं, बल्कि सब्र, विनम्रता और बड़े दिल का परिचय देने में होती है।

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आज भी ज़िंदा है उनका पैग़ाम

हर साल नानकशाही कैलेंडर के मुताबिक़ 23 मई को गुरु अमर दास जी का प्रकाश पर्व मनाया जाता है। ये दिन उस महान शख्सियत की याद दिलाता है, जिसने सिख समाज को रूहानी, सामाजिक और संगठनात्मक स्तर पर नई दिशा दी।

गुरु अमर दास जी ने लंगर को सिर्फ़ भोजन की व्यवस्था नहीं रहने दिया, बल्कि उसे बराबरी और इंसानियत की पहचान बना दिया। उन्होंने ऐसी व्यवस्था खड़ी की, जिसमें महिलाओं को भी नेतृत्व और धार्मिक शिक्षा देने की ज़िम्मेदारी मिली। उन्होंने सती प्रथा और उन रिवाज़ों का विरोध किया, जो महिलाओं की इज़्ज़त और ज़िंदगी को नुकसान पहुंचाते थे।

वहीं दूसरी तरफ़, गुरु बनने से पहले उन्होंने 12 साल तक हर सुबह अपने गुरु के लिए ब्यास नदी से पानी लाकर सेवा की मिसाल कायम की। गुरु अमर दास जी की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि उनकी पहचान किसी चमत्कार, सत्ता या फ़तह से नहीं जुड़ी। उनकी असली पहचान निस्वार्थ सेवा, विनम्रता और इंसानियत है।

उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी ये दिखाकर गुज़ारी कि बिना किसी शोहरत, इनाम या ऊंचे दर्जे की चाहत के की गई सेवा इंसान को छोटा नहीं बनाती, बल्कि उसके किरदार को और बुलंद करती है। इसी वजह से गुरु अमर दास जी का संदेश आज भी उतना ही अहम है जितना सदियों पहले था। एक ऐसा संदेश, जो हमें बराबरी, सेवा, मोहब्बत और इंसानियत की राह पर चलने की दावत देता है। शायद यही वजह है कि उनकी दी हुई सीख आज भी हर दौर और हर पीढ़ी के लिए मायने रखती है।

स्टोरी– हरविंदर कौर

इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें

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