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Begums of Bhopal ने ऐसा क्या किया कि 150 साल पुराना इतिहास फिर चर्चा में आ गया?

भोपाल को यूं ही “बेगमों का शहर” नहीं कहा जाता। इस शहर की फिज़ाओं में आज भी तहज़ीब, अपनापन और गंगा-जमुनी संस्कृति की ख़ुशबू महसूस होती है। रानी कमलापति से लेकर भोपाल की बेगमात तक, इस शहर ने हमेशा ऐसी महिलाओं को देखा जिन्होंने अपने हौसले, समझदारी और लीडरशिप से समाज को नई दिशा दी। इसी विरासत को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है “Begums of Bhopal – The Ladies Club”। ये सिर्फ़ एक क्लब नहीं, बल्कि भोपाल की तहज़ीब, महिलाओं की ताक़त और खोती हुई कलाओं को बचाने की एक ख़ूबसूरत कोशिश है।

एक सोच, जिसने बदल दी कई ज़िंदगियां

इस पहल की शुरुआत Women Education Empowerment Society (WEES) से हुई। साल 2017 में इस संस्था को बनाया गया, जिसका मक़सद उन महिलाओं तक मदद पहुंचाना था जो हुनर होने के बावजूद मौकों से दूर थी। बरखेड़ी में संस्था का एक सेंटर शुरू किया गया, जहां अंडरप्रिविलेज महिलाओं को मुफ़्त में स्किल डेवलपमेंट और वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाने लगी। यहां महिलाओं को ज़री-ज़रदोजी, सिलाई, क्रोशिया वर्क, ब्लॉक प्रिंटिंग, मेहंदी और कई तरह के हुनर सिखाए जाते हैं।

WEES के ज़रिए अब तक 450 से ज़्यादा महिला उद्यमियों ने अपने स्टार्टअप शुरू किए हैं। 750 महिलाओं को वोकेशनल और स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग दी जा चुकी है। वहीं 2000 से ज़्यादा महिलाओं और लोगों को एजुकेशन और ट्रेनिंग के ज़रिए फायदा पहुंचा है। कई ऐसी लड़कियां, जो कभी घर से बाहर निकलने में भी झिझकती थी, आज अपने हुनर के दम पर कमाई कर रही हैं। कुछ महिलाएं अब घर से छोटे कारोबार चला रही हैं, तो कुछ दूसरी लड़कियों को भी ट्रेनिंग दे रही हैं।

भोपाल की तहज़ीब को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश

इस पहल के पीछे एक गहरी सोच थी। भोपाल की पहचान सिर्फ़ झीलों या पुरानी इमारतों से नहीं, बल्कि यहां की गंगा-जमुनी तहज़ीब और महिलाओं की मज़बूत विरासत से भी है। रानी कमलापति से लेकर बेगमात के दौर तक, महिलाओं ने भोपाल को सिर्फ़ संभाला ही नहीं बल्कि उसे नई पहचान भी दी। यही वजह है कि आज भी यहां महिलाओं की ताक़त को एक विरासत की तरह देखा जाता है। इसी सोच के साथ 15 दिसंबर 2019 को “Begums of Bhopal – The Ladies Club” की शुरुआत हुई। आज इस क्लब के 6 देशों में ब्रांड एंबेसडर है।

“बेगम” सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक एहसास

WEES और Begums of Bhopal की फाउंडर Rakhshan Shamim Zahid बताती हैं कि ये पहल पहले “Princess of Wales” के नाम से शुरू हुई थी। उस दौर में इसका मक़सद महिलाओं के हुनर को आगे बढ़ाना था। उस समय “परी बाज़ार” लगाया जाता था, जहां सामान बेचने वाली और खरीदने वाली सिर्फ़ महिलाएं होती थी। यहां तक कि सात-आठ साल से बड़े लड़कों की एंट्री भी नहीं होती थी।

बाद में जब Begums of Bhopal – The Ladies Club ने इस परंपरा को दोबारा शुरू किया, तो समय के साथ आए बदलाव को भी समझा गया। महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों का योगदान भी समाज और संस्कृति में अहम था, इसलिए “परी बाज़ार” को फैमिली ओरिएंटेड हेरिटेज फेस्टिवल का रूप दिया गया। Rakhshan Shamim Zahid कहती हैं कि भोपाल में “बेगम” शब्द सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि इज़्ज़त, शान और ताक़त की पहचान है। इसलिए इस मंच का नाम “Begums of Bhopal” रखा गया।

150 साल पुराना “परी बाज़ार” फिर लौटा

आज “परी बाज़ार” Begums of Bhopal – The Ladies Club की सबसे ख़ास पहचान बन चुका है। करीब 150 साल पुरानी इस परंपरा को फिर से ज़िंदा किया गया है। यहां महिलाएं अपने हाथों का हुनर लोगों तक पहुंचाती हैं। ज़रदोजी के बटुए, हैंडमेड जूलरी, कपड़े, क्राफ्ट और कई तरह की कलाएं यहां देखने को मिलती हैं। 2020 से अब तक “परी बाज़ार” के छह सीजन आयोजित किए जा चुके हैं। ये सिर्फ़ एक बाज़ार नहीं, बल्कि भोपाल का बड़ा हेरिटेज फेस्टिवल बन चुका है, जहां कला, संस्कृति और महिलाओं के हुनर का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता है।

Source: Begum of Bhopal – The Ladies Club

खोती कलाओं को बचाने की मुहिम

भोपाल की कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही हैं। नई पीढ़ी इन कलाओं से दूर होती जा रही है। ऐसे में Begums of Bhopal – The Ladies Club इन कलाओं को बचाने की कोशिश कर रहा है। ये मंच सिर्फ़ आर्टिज़न्स को जगह नहीं देता, बल्कि लोगों को उनसे जोड़ने का भी काम करता है। यहां पुराने हुनर को नए अंदाज़ में पेश किया जाता है, ताकि आज का यूथ भी अपनी विरासत से जुड़ सके।

फायरलेस कुकिंग, कैलीग्राफ़ी प्रतियोगिता, मुशायरा, ओपन माइक और मेहंदी प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम इसी सोच का हिस्सा हैं। स्कूल और कॉलेज के स्टूडेंट्स इनमें हिस्सा लेते हैं और अपनी संस्कृति को करीब से महसूस करते हैं। Begums of Bhopal – The Ladies Club की एक और ख़ास पहल है हेरिटेज कार रैली “आगाज़”। ये रैली साल में एक बार आयोजित की जाती है। इसका मक़सद महिलाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में आगे बढ़ाना है। हर साल ये रैली किसी ख़ास सामाजिक संदेश के साथ निकाली जाती है। कभी इसका थीम डिजिटलीकरण होता है, तो कभी नशामुक्त भोपाल जैसे मुद्दों पर फोकस किया जाता है।

आंगनवाड़ी से महिलाओं तक मदद का सफ़र

बाणगंगा बाल विकास परियोजना से जुड़ी कल्पना इंदुलकर बताती हैं कि पिछले छह महीनों से वो इस परियोजना से जुड़ी हैं। इस परियोजना के तहत सात WEES संस्था ने आंगनबाड़ियों को गोद लिया गया है। संस्था ने बच्चों के लिए खेलने का मैदान और बगीचा बनवाया। यहां साथ ही महिलाओं और किशोरी लड़कियों को समय-समय पर ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और आत्मनिर्भर बनें।

Begums of Bhopal – The Ladies Club की सबसे ख़ूबसूरत बात है कि ये किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यहां मुस्लिम, पंजाबी, गुजराती, राजपूत और अलग-अलग समुदायों की महिलाएं एक साथ काम करती हैं। यहां दिवाली मिलन भी होता है, ईद मिलन भी। होली भी मनाई जाती है और हरियाली तीज भी। यही भोपाल की असली पहचान है एक ऐसा शहर जहां अलग-अलग रंग मिलकर एक ख़ूबसूरत तस्वीर बनाते हैं।

भोपाल से दुनिया तक पहुंचने का सपना

आज Begums of Bhopal – The Ladies Club सिर्फ़ भोपाल तक सीमित नहीं रहना चाहता। सपना ये है कि “परी बाज़ार” और भोपाल की ये विरासत देश और दुनिया तक पहुंचे। आने वाले वक़्त में इस फेस्टिवल को अलग-अलग राज्यों और देशों में ले जाने की तैयारी है, ताकि दुनिया भोपाल की तहज़ीब, यहां की कला और महिलाओं के हुनर को करीब से देख सके। क्योंकि भोपाल की परंपरा यही कहती है हर सशक्त महिला एक “बेगम” है।

ये भी पढ़ें: Fatima Bano: भोपाल के गप्पू उस्ताद अखाड़े से निकली कुश्ती और बराबरी की कहानी

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