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Gilbert Hill: मुंबई का वो अनमोल रत्न जो डायनासोर के ज़माने का गवाह है

आपने ऊंची-ऊंची बिल्डिंगें देखी हैं, शॉपिंग मॉल देखे हैं, लेकिन क्या आपने 66 करोड़ साल पुराना ‘Skyscraper’ देखा है? वो भी मुंबई के बीचों-बीच? जी हां, ये है Gilbert Hill- अंधेरी वेस्ट में मौजूद एक काला, विशालकाय चट्टानी स्तंभ जो लगभग 200 फीट ऊंचा है और उस ज़माने से खड़ा है जब धरती पर डायनासोर सांस ले रहे थे।

कैसे बना ये अजूबा?

तसव्वुर कीजिए, 66 से 67 करोड़ साल पहले, जब इंडिया अभी एक टापू की तरह southern hemisphere में तैर रहा था। उस दौर में west-central भारत में भयंकर ज्वालामुखी फट रहे थे। पिघला हुआ लावा (magma) ऊपर आया, ठंडा हुआ, और जम गया। लेकिन ख़ास बात ये कि इसने खड़े-खड़े स्तंभ (columnar basalt) बना दिए, जैसे किसी ने चट्टान को चीरकर सीधा खड़ा कर दिया हो। इसे भू-विज्ञान में लैकोलिथ (laccolith in geology) कहते हैं।

दुनिया में ऐसी बनावट बिरले ही मिलती है। अमेरिका का Devil’s Tower, Devil’s Postpile और आयरलैंड (Ireland) का Giant’s Causeway। और मुंबई का गिल्बर्ट हिल।

गिलबर्ट हिल- (Image-amusingplanet)

डायनासोर के मिटने से जुड़ा राज़

यही वो दौर था जब धरती से डायनासोर हमेशा के लिए गायब हो गए। वैज्ञानिक अभी भी बहस करते हैं। क्या उल्कापिंड की चोट ने डायनासोर मिटाए या इन्हीं ज्वालामुखियों (Deccan Traps) के धधकते लावे और ज़हरीली गैसों ने? गिल्बर्ट हिल ख़ुद चुपचाप खड़ी है जैसे कह रही हो- ‘मैं देख रही थी सब।’

मंदिर, सीढ़ियां और अद्भुत नज़ारा

इस चट्टान की चोटी पर दो छोटे हिंदू मंदिर हैं। गावदेवी और दुर्गामाता। चट्टान को ही तराशकर सीढ़ियां बनाई गई हैं। ऊपर चढ़ते ही दिखता है पूरा अंधेरी। ऊंची बिल्डिंगें, झुग्गियां, एयरपोर्ट, और साफ़ दिन में समंदर तक। जैसे बीते ज़माने और आधुनिक मुंबई ने एक-दूसरे को गले लगा लिया हो।

लेकिन… ये अनमोल विरासत ख़तरे में है

गिल्बर्ट हिल सिर्फ़ एक पहाड़ी नहीं, बल्कि नेशनल पार्क (1952) और ग्रेड II हेरिटेज स्ट्रक्चर (2007) है। लेकिन हक़ीक़त कुछ और है।

  • इसके आसपास गगनचुंबी इमारतें खड़ी कर दी गई हैं।
  • नीचे की तरफ़ क्वारी (पत्थर काटने) से इसकी बुनियाद कमज़ोर हुई है।
  • स्लम और कचरा इसकी रौनक घटा रहे हैं।
  • जागरूकता की कमी, स्कूलों में न पढ़ाया जाता, न सैलानियों को दिखाया जाता।
गिलबर्ट हिल (Image- Wikipedia)

क्यों है ये बेहद ख़ास?

भू-विज्ञानी बताते हैं कि आज दुनिया में कहीं कोलुमनार बेसाल्ट नहीं बन रहा। यानी ये एक जीवित अवशेष है। अगर ये टूट गया या गिर गया, तो ये हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा। और फिर ये सिर्फ़ पत्थर नहीं। ये धरती के उस दौर की इबारत है जब महाद्वीप टकरा रहे थे, हिमालय का जन्म हो रहा था, और जीवन बिल्कुल अलग था।

क्या हो रही है सुरक्षा की कोशिशें?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशासन ने योजनाएं बनाई हैं-

  • ब्यूटीफिकेशन और इंडिकेशन लगाने की।
  • केप्सूल लिफ्ट लगाने की ताकि बुज़ुर्ग और बच्चे भी चढ़ सकें, बिना चट्टान को नुक़सान पहुंचाए।
  • आसपास की गैरकानूनी बिल्डिंगों पर लगाम।

लेकिन अफ़सोस, ये सब कागज़ों तक सीमित है।

आख़िर इसका नाम “गिल्बर्ट” कैसे पड़ा? दो कहानियां हैं

  1. एक अमेरिकी भू-वैज्ञानिक ग्रोव कार्ल गिल्बर्ट के नाम पर, जिन्होंने ‘लैकोलिथ’ शब्द गढ़ा।
  2. या फिर उस ब्रिटिश अफ़सर के नाम पर जो कभी अंधेरी तालुका के इंचार्ज थे।

सच जो भी हो, ये नाम इस चट्टान की पहचान बन गया है।

गिलबर्ट हिल (Image-localsamosa)

हम सब की ज़िम्मेदारी

गिल्बर्ट हिल सिर्फ़ मुंबई का नहीं, पूरी इंसानियत का धरोहर है। ये हमें याद दिलाता है कि शहर भले ही पक्के हो जाएं, लेकिन ज़मीन की कहानी बहुत पुरानी है, बहुत गहरी है। अगर आज हमने इसे बचाने की फ़िक्र नहीं की, तो कल सिर्फ़ तस्वीरें बाकी रह जाएगी और एक कहानी कि ‘मुंबई में कभी एक चट्टान हुआ करती थी जो डायनासोर के ज़माने की थी।’

तो अगली बार जब अंधेरी जाइए, तो गर्दन ऊपर उठाकर ज़रूर देखिए-वो काला पहरेदार खड़ा है, चुपचाप, लेकिन बुलंद।

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