भारत के कई शहरों और राज्यों के नाम वक़्त के साथ बदलते रहे हैं, लेकिन उनके पुराने नाम आज भी उनके इतिहास और तहज़ीब की कहानी बयान करते हैं। किसी जगह का नाम सिर्फ़ उसकी पहचान नहीं होता, बल्कि उस दौर की संस्कृति, हुक़ूमत और लोगों की ज़िंदगी की झलक भी दिखाता है।
जैसे आज जिसे प्रयागराज कहा जाता है, उसे लंबे समय तक इलाहाबाद के नाम से जाना गया। लेकिन पुराने धार्मिक ग्रंथों में उसका नाम “प्रयाग” मिलता है। नाम बदल गए, मगर पुराने नाम आज भी लोगों की यादों और इतिहास में ज़िंदा हैं।
इसी तरह हिमालय की ख़ूबसूरत वादियों में बसा Uttarakhand भी अपने अंदर सदियों पुराना इतिहास समेटे हुए है। आज ये राज्य “देवभूमि” यानी भगवानों की धरती के नाम से मशहूर है, लेकिन इसकी पहचान और पुराने नाम इससे भी कहीं ज़्यादा पुराने हैं।
Uttarakhand का पुराना नाम क्या था?
Uttarakhand बनने से पहले इस इलाके को अलग-अलग दौर में कई नामों से जाना जाता था। पुराने हिंदू ग्रंथों में इस क्षेत्र का ज़िक्र अलग-अलग हिस्सों के तौर पर मिलता है। स्कंद पुराण के मुताबिक गढ़वाल इलाके को “केदारखंड” कहा गया है, जबकि कुमाऊं क्षेत्र “मानसखंड” के नाम से जाना जाता था। कुछ प्राचीन ग्रंथों में इस इलाके का नाम “उत्तरकुरु” भी मिलता है। वहीं बौद्ध साहित्य में इसे “हिमवंत” कहा गया है। लोग इस इलाके को “देवभूमि” भी कहते हैं, क्योंकि यहां सदियों से धार्मिक और रूहानी परंपराएं जुड़ी रही हैं।

उत्तरांचल से उत्तराखंड बनने तक का सफ़र
9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर ये नया राज्य बना। उस वक़्त इसका ऑफ़िशियली नाम “उत्तरांचल” रखा गया था। लेकिन यहां के लोगों का मानना था कि “Uttarakhand” नाम इस इलाके की असली सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को बेहतर तरीके से पेश करता है। लंबे समय तक चली मांग के बाद 1 जनवरी 2007 को राज्य का नाम बदलकर ऑफ़िशियली तौर पर Uttarakhand कर दिया गया। “Uttarakhand” शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है “उत्तर” मतलब उत्तर दिशा और “खंड” यानी ज़मीन या इलाका।
उत्तराखंड से जुड़े कुछ ख़ास और कम मशहूर फैक्ट
Uttarakhand सिर्फ़ अपनी ख़ूबसूरत वादियों और धार्मिक जगहों के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि इसका इतिहास और प्राकृतिक विरासत भी बेहद दिलचस्प है। वैज्ञानिकों को यहां हिमालय की चट्टानों में समुद्री जीवों के निशान मिले हैं। इससे माना जाता है कि करोड़ों साल पहले ये इलाका समुद्र के नीचे हुआ करता था। उत्तराखंड के हिमालय दुनिया की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं में गिने जाते हैं और आज भी धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे हैं। पुराने दौर में यहां छोटे-छोटे जनपद मौजूद थे, जो अपने तरीके से शासन चलाते थे।
रुद्रप्रयाग में मौजूद तुंगनाथ मंदिर को दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बना शिव मंदिर माना जाता है। वहीं देहरादून के कालसी में सम्राट अशोक का शिलालेख मिला है, जो इस बात का सबूत है कि मौर्य साम्राज्य का असर इन पहाड़ी इलाकों तक पहुंच चुका था।
Uttarakhand अपनी दुर्लभ जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। यहां मिलने वाले कई पौधों को औषधीय खूबियों के लिए ख़ास माना जाता है। “गढ़वाल” नाम भी अपने अंदर इतिहास समेटे हुए है। माना जाता है कि ये नाम यहां के 52 पुराने गढ़ों यानी किलों से निकला है, जिन पर अलग-अलग स्थानीय शासकों का राज था।
माना गांव की एक गुफा को लेकर ये मान्यता भी मशहूर है कि महर्षि वेदव्यास ने वहीं बैठकर महाभारत की रचना की थी। इसके अलावा फूलों की घाटी दुनियाभर में अपनी ख़ूबसूरती के लिए जानी जाती है। UNESCO ने इसे World Heritage Site में शामिल किया है और यहां 500 से ज़्यादा तरह के जंगली फूल पाए जाते हैं। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों का उद्गम भी उत्तराखंड से ही होता है, इसलिए इसे “भारत का वाटर टॉवर” कहा जाता है।

उत्तराखंड को क्यों ख़ास माना जाता है?
Uttarakhand की दो ऑफ़िशियली राजधानियां हैं। देहरादून को शीतकालीन राजधानी कहा जाता है और वहीं गैरसैंण के भराड़ीसैंण इलाके को साल 2020 में ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया। इसका मक़सद पहाड़ी और मैदानी इलाकों के बीच प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना था। Uttarakhand को भारत का आध्यात्मिक द्वार भी कहा जाता है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां चार धाम यात्रा के लिए पहुंचते हैं। इनमें यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ शामिल हैं। ऋषिकेश दुनियाभर में “योग की राजधानी” के तौर पर मशहूर है। वहीं फूलों की घाटी अपनी ख़ूबसूरत वादियों और दुर्लभ पौधों की वजह से लोगों को अपनी तरफ खींचती है।
भाषा, त्योहार और संस्कृति
Uttarakhand में गढ़वाली और कुमाऊंनी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली स्थानीय भाषाएं हैं। प्रशासन और पढ़ाई के लिए हिन्दी का इस्तेमाल होता है। दिलचस्प बात ये है कि उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने संस्कृत को दूसरी ऑफ़िशियली भाषा का दर्जा दिया। इसके अलावा जौनसारी जैसी कई स्थानीय बोलियां भी यहां बोली जाती हैं।
Uttarakhand में दशहरा, दिवाली, होली और शिवरात्रि जैसे त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। यहां होली भी ख़ास अंदाज़ में मनाई जाती है। कुमाऊं इलाके की “बैठकी होली” और “खड़ी होली” अपनी संगीत परंपरा के लिए काफी मशहूर हैं, जहां लोग ढोलक, हारमोनियम और लोकगीतों के साथ त्योहार का जश्न मनाते हैं।

उत्तराखंड की संस्कृति सिर्फ़ त्योहारों तक सीमित नहीं है। यहां के लोक नृत्य और लोक संगीत भी लोगों की पहचान का अहम हिस्सा हैं। कुमाऊं और गढ़वाल इलाकों में झोड़ा, छोलिया और लोकगीतों की ख़ास परंपरा देखने को मिलती है। मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर नाच-गाना करते हैं।
ये राज्य अपनी प्राकृतिक ख़ूबसूरती और धार्मिक महत्व के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है। फूलों की घाटी, नंदा देवी नेशनल पार्क, राजाजी नेशनल पार्क और जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क यहां के बड़े आकर्षण माने जाते हैं। वहीं मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, कौसानी और औली जैसे पहाड़ी इलाके हर साल बड़ी तादाद में सैलानियों को अपनी तरफ खींचते हैं।
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