हिन्दी भाषा के महानतम समकालीन साहित्यकारों में शुमार किए जाने वाले बाबा नागार्जुन 1940 के दशक की शुरुआत में सिंध प्रांत की यात्रा पर निकले थे। इस लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने वहां के जीवन को नज़दीक से देखा-परखा और जीविका के लिए थोड़ा बहुत काम भी किया।
नागार्जुन सत्रह महीनों तक वहां रहे थे। वहां की एक सारस्वत ब्राह्मण पाठशाला में उन्होंने कुछ दिन प्रधानाध्यापक पद पर काम किया। बाद में वे वहीं सिंध की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मुख्य पत्रा ‘कौमी बोली’ के संपादक रूप में नियुक्त हुए।
उन्होंने अपनी स्मृतियों को एक शानदार यात्रावृत्त के रूप में लिखा भी जिसका प्रकाशन ‘हुंकार’ नाम के समाचारपत्र में 23 एवं 30 दिसंबर 1945 को हुआ था। इस महत्वपूर्ण गद्य में बाबा उस समय के सिंध के बारे में अनेक अन्तरंग और महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज कर गए हैं. लिखते हैं – “1941 की मर्दुमशुमारी के अनुसार सिंध प्रांत की जनसंख्या 45 लाख है, जिसमें 11 लाख हिंदू है. जनता की धार्मिक मनोवृत्ति सूफ़ी और नानकपंथी है। आठवीं सदी के शाहनमाह के अरबी लेख से पता चलता है कि उस समय वहां बौद्ध और ब्राह्मण दोनों ही संस्कृति के लोग रहते थे। सिंध पर अरबी आक्रमण मुहम्मद-बिन-कासिम द्वारा 692 ई. में हुआ. तब से इस भूमि में इस्लामी भावनाओं का प्राधान्य चला आ रहा है। मीरों, कलहारों और नवाबों की सामंतशाही से ऊबकर स्थानीय जनता राजपूताना, गुजरात और पंजाब में जा बसी और सिंधुनद के उपजाऊ इलाकों को आगंतुकों के लिए खाली कर गयी. उन्हें तलवार छोड़कर तराजू का सहारा लेना पड़ा। इसी से सिंध का नागरिक जीवन आज हिंदू-प्रधान हो गया।”
उस समय के सिंध में गुरु नानक की वाणी सिखों और हिन्दुओं के अलावा दूसरे मजहबों के लोगों के बीच भी वैसी सी सहजता से गुंजायमान रहती थी। सिंध की धरती की विस्तृत सूफी परम्परा के चलते अधिकतर सिंधी लोग उसी उदारवादी मानसिकता के हो चुके थे जिसकी पैरवी सूफीवाद की बुनियाद करती आई है।
बाबा नागार्जुन के मुताबिक़ यदि किसी सिंधी से यह पूछा जाता कि वह किसे अधिक मानता है तो इसके उत्तर में वह व्यक्ति आपको गुरु नानक का एक पद सुनाने के तुरंत बाद शाह अब्दुल लतीफ़ की दो पंक्तियाँ पेश कर देता। सिंध में शाह अब्दुल लतीफ़ की ख्याति वैसी ही है जैसी उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास की।
इस यात्रावृत्त में बताया गया है किस तरह सिंधी मुसलमान मंदिरों, वरुण चैत्य और गुरुद्वारों के आगे सिर झुकाते थे, और सिंधी हिंदू पीरों की दरगाहों पर उतनी ही श्रद्धा से नतमस्तक होते थे। सिंध में मज़हब दीवार नहीं खड़ी करता था, बल्कि रास्ते खोलता था। बाबा आगे अठारहवीं सदी के मस्त फ़कीर सचल सरमस्त के एक दोहे को याद करते हैं—
आहि रूहु मुंही जो अरब जो ऐं खाकि हिंदूजी
अहमद मिल्यों हुते त हिति श्याम मिल्यो अहि
यानी मेरी आत्मा अरब की है, तो शरीर हिंदू का है; वहां मुझे अगर मुहम्मद मिले तो यहां श्याम मिले हैं।
उस ज़माने का सिंध एक ऐसा इलाका था जहां सांप्रदायिक दंगे सिंध में वैसा उग्र रूप नहीं लिया करते थे जैसा भारत के अन्य प्रांतों में होता था. पीरों की दरगाहों पर होने वाले मेलों में कई बार शामिल होकर बाबा नागार्जुन ने कितनी ही बार इकतारे पर पीरों के गुणगान करने वाले हिंदू भगतों को झूमते देखा। मुल्तान कभी सिंध के अंतर्गत था।
सिंध के महात्मा उडेरो यानी लाल को वरुण के अवतार माना जाता है और वरुण असुर सभ्यता का उतना ही पूज्य देवता है, जितना कि इंद्र वैदिक सभ्यता का। असुर सभ्यता के अवशेष सिंध के मोहन-जोदड़ो और पंजाब के हड़प्पा में समान रूप से पाये गये हैं। उन सभ्यताओं की जल-पूजन परंपरा को बाबा नागार्जुन ने नज़दीकी मुल्तान इलाकों में प्रचलित देखा और खोजबीन के बाद पता लगाया कि सिंध में जलपूजकों का एक पूरा संप्रदाय ही अस्तित्व में आ चुका था जिसे दरियापंथ कहा जाता था।
मज़े की बात यह थी कि अनेक मुसलमान भी वरुण की उपासना में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी किया करते थे। उनके बीच सिन्धु नदी को दरियाशाह जैसे महामान्य नाम से संबोधित किये जाने की सम्मोहक परम्परा भी थी।
अधिकतर पाठकों के बीच केवल एक बड़े कवि माने जाने वाले बाबा नागार्जुन के यात्रावृत्त और संस्मरण उन्हें एक बड़ा घुमक्कड़ और उससे भी बड़ा शोधार्थी सिद्ध करते हैं जिन के भीतर हमारे महादेश के एक से एक निराले आख्यान पढ़ने को मिलते हैं। सिंध पर लिखा उनका यह लेख भी उनकी काव्य-रचनाओं जैसा मोहक और ज़रूरी है।
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