Monday, April 20, 2026
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हुज़ूर, ये लखनऊ है… यहां हर गली की अपनी ज़ुबान है, हर मोहल्ले की अपनी दास्तान

कभी आप लखनऊ (Lucknow) नाका हिंडोला से गुज़रे हैं? या बावर्ची टोले की तंग गलियों में खोए हैं? शायद रोज़ गुज़रते होंगे। लेकिन क्या कभी सोचा कि बावर्ची टोला आख़िर बावर्ची टोला क्यों कहलाता है? वहां तो अब न कोई शाही रसोइया दिखता है, न हांडियों की खुशबू आती है।

तो चलिए, आज हम आपको ले चलते हैं पुराने लखनऊ की उन गलियों-कूचों में, जिनके नामों के पीछे छुपी हैं सौ-सौ साल पुरानी कहानियां। कहानियां नवाबों की, अंग्रेज़ों की, कारीगरों की, और कभी-कभी तो… एक गूंगे नवाब की भी!

बारूदख़ाना: जहां नवाबों का बारूद सूखता था

सोचिए, आज जिस बारुदख़ाना चौराहे पर आप गोलगप्पे खा रहे हैं या ऑटो पकड़ रहे हैं, कभी वहां बारूद के ढेर लगा करते थे।

जी हां, ‘बारुदख़ाना’ शुद्ध फ़ारसी शब्द है-बारूद प्लस ख़ाना यानी बारूद का घर। अवध के नवाबों, ख़ासकर आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के दौर में, ये पूरा इलाका सेना का गोला-बारूद जमा करने का गुप्त ठिकाना हुआ करता था। यहीं तोपों का बारूद सूखता था, बंदूकों की गोलियां भरी जाती थीं।

आज वो धमाकों वाला इलाका लखनऊ के सबसे शोरगुल वाले बाज़ारों में से एक है। इतिहास का कैसा करवट लेना है। बारूद की जगह अब चाट-पकौड़ी का धुआं उठता है। 

टकसाल वाली गली: जहां पैसा बनता था… सच्ची में!

चौक की भीड़-भाड़ में एक तंग सी गली है,टकसाल वाली गली। आज यहां मोबाइल रिपेयरिंग की दुकानें हैं, पर कभी यहीं नवाबों के शाही सिक्के ढाले जाते थे।

‘टकसाल’ यानी मिंट, वो जगह जहां सरकारी सिक्के बनते हैं। नवाब आसिफ़-उद-दौला और सआदत अली खान के दौर में ये गली पूरे अवध की अर्थव्यवस्था की धड़कन थी। सोने, चांदी और तांबे के सिक्के यहीं बनते थे, जिन पर नवाबों की मुहर लगती थी।

पुराने लखनऊ की ये खूबी रही है, हर गली का अपना एक पेशा, अपनी एक पहचान। टकसाल वाली गली के अलावा भी हैं कंघी वाली गली, फूलों वाली गली, चूड़ी वाली गली… हर नाम एक पूरी अर्थव्यवस्था की कहानी कहता है।

पीपे वाला पुल: जो हर साल डूबने से बच जाता है

गोमती नदी पर बना पीपे वाला पुल (या कच्चा पुल) लखनऊ की इंजीनियरिंग का एक अनोखा नमूना है। इसे देखकर लगता है जैसे किसी ने नदी पर लोहे के बड़े-बड़े पीपे डालकर उनके ऊपर लकड़ी के तख्ते बिछा दिए हों।

और यकीन मानिए-बिल्कुल ऐसा ही है

अंग्रेज़ों के ज़माने में बना ये पुल असल में एक पोंटून ब्रिज (Pontoon Bridge) है। इसकी सबसे दिलचस्प बात? ये साल में सिर्फ 8 महीने ही चलता है। बरसात में जब गोमती का जलस्तर बढ़ता है, तो इसे खोलकर किनारे कर दिया जाता है। फिर पानी कम होने पर वापस जोड़ दिया जाता है।

पीपे वाला पुल

गऊघाट के पास बना यह पुल पुराने लखनऊ को फैजुल्लागंज और दौलतगंज से जोड़ता है। इसके बिना लोगों को 5-6 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता। तो ये पीपे वाला पुल सिर्फ लकड़ी-लोहे का ढांचा नहीं, हज़ारों लोगों की ज़िंदगी का शॉर्टकट है।

गूंगे नवाब का पुल: जिस नवाब की चुप्पी आज तक गूंज रही

डालीगंज की तरफ जाने पर एक पुराना, खस्ताहाल पुल आता है, गूंगे नवाब का पुल। नाम सुनकर लगता है ज़रूर कोई नवाब साहब गूंगे रहे होंगे। लेकिन कहानी कुछ और ही है।

ये नाम वाजिद अली शाह या उनके आसपास के किसी नवाब के शांत और कम बोलने वाले स्वभाव की वजह से पड़ा। कुछ बुज़ुर्ग बताते हैं कि इस पुल के निर्माण के दौरान नवाब की चुप्पी या प्रशासन की “गूंगी” उदासीनता के चलते जनता ने इसे ये नाम दे दिया।

पक्का पुल

मगर अफसोस की बात ये है, जो पुल कभी अपनी मज़बूती के लिए जाना जाता था, आज वही पुल जर्जर होकर खतरनाक घोषित किया जा चुका है। उसके बगल में अब नया पुल बन गया है, लेकिन नाम आज भी पुराना है, आज भी वही गूंगे नवाब का पुल।

ऐशबाग: जहां नवाब ‘ऐश’ करते थे!

नाम ही सब कुछ बयां कर रहा है, ऐश प्लस बाग यानी ऐश करने का बाग़।

ये इलाका कभी नवाबों का पर्सनल एंजॉयमेंट पार्क हुआ करता था। यहां 500 साल पुरानी जमुना (जमुनिया) झील है, जिसके चारों तरफ कभी जामुन के घने पेड़ों की ठंडी छांव हुआ करती थी। नवाब साहबान यहां बोटिंग के लिए आते, महफिलें सजतीं, शायरी होती और कभी-कभी… तो बस यूं ही सुस्ताने के लिए आ जाते।

ऐशबाग

चारबाग की तरह ही ऐशबाग भी कभी लखनऊ की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक था। अब यह एक व्यस्त आवासीय और व्यावसायिक इलाका बन गया है, लेकिन इसका नाम आज भी उसी ऐशो-आराम की याद दिलाता है।

घसियारी मंडी: जहां बिकती थी घास… हां, घास!

रकाबगंज के पास मौजूद घसियारी मंडी का नाम सुनकर आज की पीढ़ी शायद हंसे। लेकिन नवाबों के ज़माने में ये लखनऊ का सबसे अहम चारा बाज़ार था।

आसपास के गांवों से घास काटकर लाने वाले (घसियारे) यहां बैठते थे। नवाबों के अस्तबलों के लिए घोड़ों का चारा, शाही हाथियों के लिए हरा चारा, सब यहीं से जाता था। ये मंडी पूरे शहर की पशु-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी।

अब वहां न घास है, न घसियारे। मगर नाम आज भी वही है, घसियारी मंडी। जैसे इतिहास मुस्कुराकर कह रहा हो, भूलना मत, कभी यहां घास बिका करती थी।

मार्टिन पुरवा: लखनऊ में बसा एक फ्रांसीसी का गांव

लखनऊ के बीचों-बीच एक इलाका है, मार्टिन पुरवा। ये नाम किसी भारतीय राजा-महाराजा का नहीं, बल्कि एक फ्रांसीसी सिपाही का है।

मेजर-जनरल क्लाउड मार्टिन 18वीं सदी में फ्रांस से भारत आए, और फिर लखनऊ को अपना घर बना लिया। वो अवध के नवाबों के करीबी बन गए और अपनी समझदारी और व्यापारिक सूझबूझ से भारत के सबसे अमीर फ्रांसीसी बने।

ला मार्टिनियर कॉलेज

उन्होंने ही ला मार्टिनियर कॉलेज की इमारत बनवाई (जो पहले उनका निजी महल ‘कॉन्स्टेंशिया’ था)। उनकी ज़मीन पर एक गांव बसा, जिसे लोग मार्टिन का पुरवा यानी मार्टिन पुरवा कहने लगे।

सोचिए, लखनऊ के दिल में आज भी एक फ्रांसीसी का नाम ज़िंदा है। यही तो इस शहर की खूबसूरती है,ये किसी को पराया नहीं मानता।

बावर्ची टोला: जहां रहते थे नवाबों के जादूगर रसोइए

आपने लखनऊ की बिरयानी खाई है? गलावटी कबाब का लुत्फ उठाया है? तो इसका शुक्रिया कीजिए बावर्ची टोले के उन खानसामों का, जिन्होंने सदियों पहले इन पकवानों को जन्म दिया।

नवाबों के दौर में, शाही रसोई में काम करने वाले बावर्ची और रकाबदार (ख़ास रसोइए) इसी मोहल्ले में रहते थे। कहते हैं कि जब कभी कोई नवाब अपने रसोइए से नाराज़ होकर उसे निकाल देता, तो वह यहीं आकर अपनी दुकान खोल लेता। इस तरह यह पूरा इलाका शाही पकवानों की प्रयोगशाला बन गया।

  बिरयानी, शीरमाल, मुरब्बा, निहारी जैसे लज़ीज़ पकवान यहीं से पूरे शहर में मशहूर हुए। आज भी बावर्ची टोले की तंग गलियों में घुसिए—हवा में आज भी घी-मसालों की वही पुरानी खुशबू तैरती मिलेगी।

मशालची टोला: जहां रहते थे रोशनी के सिपाही

नवाबों के ज़माने में बिजली नहीं थी। रात के अंधेरे में जब नवाब का काफिला निकलता, तो सबसे आगे चलते थे मशालची, हाथों में जलती मशालें लिए, रास्ता रोशन करते हुए।

मशालची टोला इन्हीं मशालचियों की बस्ती थी। ये पूरा मोहल्ला उन लोगों का था जिनकी ज़िंदगी का मकसद था- रोशनी फैलाना। नवाब की बारात हो, शाही सवारी हो या कोई त्योहार-ये मशालची हर जगह मौजूद रहते।

अब मशालों की जगह LED लाइट्स ने ले ली है। मगर मशालची टोला आज भी उन गुमनाम रोशनी वालों की याद दिलाता है, जिनके बिना नवाबों की शान-ओ-शौकत अधूरी थी।

 नाका हिंडोला: जहां बनते थे मेलों के झूले

‘नाका हिंडोला  सुनने में लगता है कोई ट्रैफिक प्वाइंट होगा। और है भी। लेकिन इस नाम की जड़ें मेलों और झूलों से जुड़ी हैं।

‘हिंडोला’ यानी झूला। कभी इस इलाके में झूले बनाने वाले कारीगरों की बस्ती थी। यह लोग बांस, रस्सी और लकड़ी से बड़े-बड़े हिंडोले तैयार करते, जिन्हें मेलों-ठेलों में लगाया जाता था।

वक्त गुज़रा, हिंडोला बनाने वाले चले गए। अब नाका हिंडोला इलेक्ट्रॉनिक बाज़ार के तौर पर मशहूर है। लेकिन काश कभी यहां पुराने ज़माने का कोई झूला नज़र आ जाए, बस इतिहास झूमने लगे।

पानदरीबा: जहां पान की हर गिलौरी में इत्र बसता था

लखनऊ और पान,  ये दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। और इस मोहब्बत का सबसे पुराना गवाह है पानदरीबा।

‘दरीबा’ का मतलब है बाज़ार या गली। यानी पानदरीबा। पान की मंडी। नवाबों के ज़माने में ये इलाका पान के थोक व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र था। यहां बनारस, मगही, कलकत्तिया हर किस्म के पान की ढेरियां लगती थीं।

एक मशहूर किस्सा है बशीरन पानवाली का। कहते हैं कि उनकी बेटी ने राजा नसीरुद्दीन हैदर को एक नायाब पान पेश किया। केसर, इत्र और चांदी के वर्क से सजा हुआ। राजा साहब इतने खुश हुए कि उन्होंने बदले में हीरा दे दिया।

आज भी पानदरीबा में पान की कुछ पुरानी दुकानें हैं। वहां जाइए, एक गिलौरी खाइए, स्वाद में इतिहास घुला मिलेगा।

 जनाना पार्क: जो सिर्फ महिलाओं के लिए बना था

1934 में बना जनाना पार्क अपने आप में एक अनोखी मिसाल है। उस दौर में, जब औरतें घर की चारदीवारी से बाहर कम ही निकलती थीं, यह पार्क सिर्फ और सिर्फ महिलाओं के लिए बनाया गया था। इसके पीछे प्रेरणा थी महात्मा गांधी की। 1920 में जब वे लखनऊ आए, तो उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी ज़रूरी है, इसके लिए उन्हें घर से बाहर निकलना होगा।

ज़नाना पार्क

ये बात उस समय के समाजसेवी बाबू गंगा प्रसाद वर्मा के दिल को छू गई। उन्होंने अपने पैसे से ज़मीन खरीदी और बज्म-ए-खवातीन (महिला सभा) को दान कर दी। इसी ज़मीन पर बना जनाना पार्क।

बाद में यह पार्क स्वतंत्रता सेनानियों की गुप्त बैठकों का केंद्र भी बना। क्रांति की ज्वाला यहीं सुलगती थी—चाय की प्यालियों और पान की गिलौरियों के बीच।

ये नाम सिर्फ नाम नहीं हैं…

तो अगली बार जब आप बारुदख़ाना चौराहे पर खड़े हों, या बावर्ची टोले की गली से गुज़रें, या पीपे वाला पुल पार करें—एक पल के लिए रुकिएगा।

ये सिर्फ नाम नहीं हैं। ये लखनऊ की धड़कन हैं, इसकी रूह हैं। हर नाम अपने अंदर सैकड़ों साल का इतिहास समेटे है। नवाबों के ऐशो-आराम की कहानी, कारीगरों के हुनर की दास्तां, और कभी-कभी तो पूरी एक सदी की चुप्पी।

लखनऊ ऐसा ही है। यहां हर चीज़ की एक कहानी है। बस ज़रूरत है तो कान लगाकर सुनने की, आंखें खोलकर देखने की।

और हां, ये तो बस शुरुआत है। आगे हम आपको ले जाएंगे रकाबगंज, चौपटिया, आलमबाग, गोलागंज और न जाने कितने ऐसे मोहल्लों में, जिनके नाम आप रोज़ सुनते हैं, पर कहानी कभी नहीं जान पाए।

बने रहिए हमारे साथ। लखनऊ के बारे में अभी बहुत कुछ बताना बाकी है।

इस बारे में हमने लखनऊ की मशहूर अमीरूद्दौला लाइब्रेरी की पूर्व लाइब्रेरियन नुसरत नाहिद से भी इनपुट लिये हैं।

ये भी पढ़ें: गड़बड़झाले में फंसे तो कहिएगा नहीं, रूमी गेट तो ठीक है,पहले ज़रा बंदरियाबाग़ तो घूम आइये, जब नाम ही बयां करें लखनऊ की दास्तां

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