तस्वीरें तो हज़ारों खिंचवा लीं बड़े इमामबाड़े और रूमी दरवाज़े के साथ, लेकिन लखनऊ की असली ‘घुमक्कड़ी’ तो तब शुरू होती है जब आप सुनते हैं- ‘भइया, हम गड़बड़झाला उतरेंगे!’ या ‘चलिए ज़रा सरकटा नाला होते हुए टेढ़ी पुलिया तक टहल आते हैं।’
ये नाम सुनकर पहली बार में लगता है शायद किसी ने मज़ाक किया होगा। आखिर किसी शहर के पॉश इलाकों के बीच ‘गड़बड़झाला’ (Gadbad jhala) कैसा? या फिर चौक जैसे पुराने इलाके में ‘सरकटा नाला’ कौन सी बला है? लेकिन जनाब, यही तो लखनऊ का असली अंदाज़ है। यहां के लोगों ने नक्शों और किताबों के उलझे हुए नामों की परवाह नहीं की। उन्होंने तो जो देखा, वैसा ही नाम रख दिया। अगर पुलिया टेढ़ी थी तो इलाका हो गया ‘टेढ़ी पुलिया’, और अगर चिड़ियाघर में बंदरों का आतंक था तो पूरा एरिया हो गया ‘बंदरियाबाग़’।

ये कहानियां लखनऊ की उस ज़ुबान की तरह हैं जो सुनने में नर्म है लेकिन असल में बड़ी चुटीली और सटीक है। लखनऊ की मशहूर अमीरूद्दौला लाइब्रेरी की पूर्व लाइब्रेरियन नुसरत नाहिद से भी जब हमने इन अजीबोगरीब नामों की वजह पूछी तो वो हंस पड़ीं और बोलीं, “यहां तो नाम ही किस्सागोई हैं असमा!’
तो चलिए,आज छोड़िए गूगल मैप के सीधे-सपाट रास्ते और हमारे साथ निकलिए लखनऊ की उन गलियों में जिनके नामों में ही अतीत का खौफ, हंसी-मजाक और अनोखी तारीख़ समाई हुई है। आइए जानते हैं बंदरियाबाग़ से लेकर सरकटा नाले तक के पीछे का सच जो आपको कोई ट्रैवल गाइड नहीं बताएगा। लखनऊ के जुड़ी गलियों से लेकर किस्सों तक हम बताते जाएंगे, पहले ये Fist Part पढ़ें और असली लखनऊ के बारें में जानें।

बंदरियाबाग़: जब बंदरों की बहुतायत ने रख दिया पूरे इलाके का नाम
सोचिए, एक शानदार बाग़, जिसे अंग्रेज़ों ने ‘प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन’ जैसा रौबदार नाम दिया, वो आज पूरे शहर में ‘बंदरियाबाग़’ के नाम से मशहूर है। है ना दिलचस्प? इसकी वजह भी बड़ी आसान है। चिड़ियाघर में बंदरों की तादाद इतनी ज़्यादा थी और उनकी शैतानियां इतनी मशहूर थीं कि लोग उस पूरे इलाके को ही ‘बंदरिया’ (यानी बंदरों की जगह) और ‘बाग़’ (बगीचा) मिलाकर बंदरियाबाग़ बुलाने लगे। ये वो लखनवी अंदाज़ है, जहां अंग्रेज़ी नामों की जगह लोगों की ज़बान पर चढ़ा सरल और सटीक शब्द ही राज करता है। आज भले ही वो नाम आधिकारिक तौर पर ‘लखनऊ चिड़ियाघर’ हो गया हो, लेकिन रिक्शे वाले से लेकर कैब ड्राइवर तक, सब इस इलाके को बंदरियाबाग़ के नाम से ही जानते हैं।

सरकटा नाला: एक नाम जिसके पीछे छुपा है डरावना इतिहास
ये कोई आम नाला नहीं, बल्कि लखनऊ के इतिहास के सबसे स्याह अध्याय का गवाह है। अकबरी गेट के पास मौजूद ये ‘सरकटा नाला’ अपने नाम की तरह ही ख़ौफनाक कहानी समेटे हुए है। इस नाम के पीछे एक नहीं, बल्कि दो मान्यताएं प्रचलित हैं। एक कहानी के मुताबिक, प्राचीन काल में इसी जगह पर राजा लाखन पासी और सैयद सालार मसूद गाजी के बीच भीषण युद्ध हुआ था। कहा जाता है कि युद्ध में राजा लाखन का सिर काट दिए जाने के बाद भी उनका धड़ तलवार चलाता रहा, जिसके बाद ये जगह ‘सरकटा’ कहलाने लगी।

वहीं दूसरी, और जो ज्यादा प्रचलित कहानी 1857 के गदर से जुड़ी है। माना जाता है कि विद्रोह के दौरान और उसके बाद, क्रूर अंग्रेज़ अधिकारी स्वतंत्रता सेनानियों के सिर काटकर इसी नाले में फेंक दिया करते थे। यही वजह है कि ये जगह हमेशा के लिए ‘सरकटा नाला’ के नाम से मशहूर हो गई। आज भले ही ये एक साधारण नाला बनकर रह गया हो, लेकिन इसका नाम सुनते ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और ये हमें उस दौर की वीभत्सता की याद दिलाता है।
मामा-भांजा की कब्र: वो दरगाह जहां रिश्ते की मिलती है मिसाल
लखनऊ में एक ऐसी भी जगह है जिसका नाम आपसी रिश्ते की मिसाल पेश करता है, ‘मामा-भांजा की कब्र’। ये नाम सैयद सालार मसूद गाजी (भांजा) और उनके मामा से जुड़ी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के कारण पड़ा। कहा जाता है कि ये कब्र इस रिश्ते की निशानी है, जहां दोनों ने साथ में कई अभियानों में हिस्सा लिया था। ये जगह आज भी सांप्रदायिक सौहार्द और आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां हर धर्म और वर्ग के लोग सजदा करने आते हैं।

गड़बड़झाला बाज़ार: नाम ही काफी है जिसकी पहचान के लिए
अमीनाबाद की तंग गलियों में बसा ‘गड़बड़झाला’ सुनने में भले ही थोड़ा अजीब लगे, लेकिन ये नाम इस बाज़ार की रूह को बखूबी बयां करता है। इस नाम के पीछे की कहानी उतनी ही मजेदार है जितना कि यहां का माहौल। आजादी के बाद पाकिस्तान से आए विस्थापितों ने जब यहां बिना किसी योजना के अपनी दुकानें सजानी शुरू कीं, तो ये इलाका पूरी तरह से अव्यवस्थित यानी ‘गड़बड़’ हो गया। यहां गलियां इस कदर उलझी हुई हैं कि पुराने लोग भी कई बार रास्ता भटक जाते हैं। बस यहीं से इसका नाम ‘गड़बड़झाला’ पड़ गया। आज ये बाज़ार लेडीज स्ट्रीट के नाम से भी मशहूर है, जहां सस्ते और ट्रेंडी सामान के लिए महिलाओं की खासी भीड़ लगी रहती है। नाम भले ही गड़बड़ हो, लेकिन यहां की रौनक़ और शॉपिंग का मज़ा ही कुछ और है।
तोप दरवाज़ा और टेढ़ी पुलिया: नाम ही बयां करते हैं इतिहास और भूगोल
लखनऊ में ‘तोप दरवाज़ा’ एक नहीं, बल्कि कई हैं। लेकिन बालागंज में स्थित यह दरवाज़ा नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने का है, जब यहां शाही तोपखाना हुआ करता था। ये दरवाजा उसी कारखाने का मेन गेट था, इसलिए इसका नाम ‘तोप दरवाज़ा’ पड़ गया । इसी तरह, शहर के दूसरे हिस्से में ‘टेढ़ी पुलिया’ का नाम भी बिना किसी लाग-लपेट के इसके बनावट पर ही रख दिया गया। पुराने समय में यहां कुकरैल नाले पर एक पुलिया बनी थी, जो किसी कारणवश सीधी नहीं, बल्कि थोड़ी टेढ़ी थी। बस फिर क्या था, लोगों ने पूरे इलाके को ही ‘टेढ़ी पुलिया’ कहना शुरू कर दिया। यही है लखनऊ की खासियत, जहां इतिहास, भूगोल और लोगों की बोलचाल मिलकर एक नई ही पहचान गढ़ देते हैं।

तो ये थीं लखनऊ की कुछ अनसुनी, अनकही और मजेदार कहानियां। यह शहर सिर्फ इमारतों और बाज़ारों का संग्रह नहीं है, बल्कि हर गली, हर मोहल्ला, हर नाला और हर पुलिया अपने आप में एक जिंदा इतिहास समेटे हुए है। अगली बार जब आप इन जगहों से गुज़रें, तो ज़रा इनके नाम के पीछे छुपी रूहानी दास्तां को याद कीजिएगा। यही वो धड़कन है जो लखनऊ को सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक जिंदा दिल महबूब बनाती है।
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