गुरु नानक देव जी ने मानवता, प्रेम और समानता का संदेश फैलाने के लिए अनेक लंबी यात्राएँ कीं, जिन्हें उदासी यात्राएँ कहा जाता है। इन यात्राओं के माध्यम से उन्होंने भारत, तिब्बत, श्रीलंका, अरब और मध्य एशिया तक भ्रमण किया। कहा जाता है कि उनकी पाँच प्रमुख उदासियाँ थीं जिन्हें पूरा करने में उन्हें चौबीस साल लगे। वर्ष 1500 ईस्वी से 1524 ईस्वी के दरम्यान की गईं कोई अट्ठाईस हज़ार किलोमीटर लम्बी इन पैदल इन यात्राओं में उन्होंने पंडितों, फकीरों और आम लोगों से संवाद किया और जाति-पाँति, अंधविश्वास तथा पाखंड का विरोध किया। उनके साथ भाई मर्दाना रहते थे, जो रबाब बजाते थे।
गुरु नानक देव इन यात्राओं में नाम-स्मरण, सत्य और सेवा का संदेश दिया, जिससे सिख धर्म की नींव मजबूत हुई। अपनी तीसरी उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी ने उत्तराखण्ड के रास्ते से कैलाश-मानसरोवर की पवित्र यात्रा की थी। दुर्गम हिमालयी ऊंचाइयों और दर्रों-घाटियों से होकर की गयी उनकी इस यात्रा के निशान उत्तराखण्ड में कुमाऊँ-गढ़वाल के विभिन्न स्थानों पर आज तक मौजूद हैं।
कुमाऊँ में सरयू और गोमती नदियों के संगम पर बसा बागेश्वर नाम का एक पुराना नगर गुरुजी की इस यात्रा का साक्षी रहा है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा से लौटते समय वे जब यहां पहुंचे, इलाके में एक संतानहीन राजा का शासन था। निस्संतान होने की वजह से वह हमेशा व्यथित रहता था। किसी ने उसे सलाह दी कि यदि ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए मानव बलि दी जाय तो उसे पुत्र-प्राप्ति हो सकती है।

बेटा हासिल करने के लिए राजा किसी भी सीमा तक जा सकता था सो प्रतिदिन उसके सैनिक नगर में जाकर किसी एक मनुष्य को पकड़ लाते और बलि के लिए प्रस्तुत कर देते। अंधविश्वास और भय का यह वातावरण धीरे-धीरे नगरवासियों के जीवन पर काल की तरह छा गया। प्रजा भय और असहायता में जीने को विवश बना दी गई थी।
इन्हीं दिनों गुरु नानक देव जी अपने साथियों भाई मर्दाना और भाई बाला के साथ बागेश्वर पहुँचे। परंपरा के अनुसार उन्होंने गोमती नदी के तट पर अपना डेरा किया। स्नान इत्यादि के बाद गुरु जी ने भाई मरदाना से रबाब बजाने को कहा और “वाणी आई है!” का सौम्य उद्घोष करते हुए स्वयं गुरबानी गाना शुरू किया। गुरु नानक देव जी का वह दैवीय गायन स्थानीय जन के कानों में नई आशा का संचार बनकर उतरने लगा।
उसी समय राजा के सैनिक बलि की खोज में निकल आए। लोग भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। सैनिकों ने गुरु जी और भाई मरदाना को बलपूर्वक वहां से उठाकर राजा के दरबार में प्रस्तुत कर दिया। कथा है कि जैसे ही राजा की दृष्टि गुरु जी पर पड़ी, वह उनकी आभा और शांत व्यक्तित्व को देख कर गहरे प्रभावित हो गया। बाद में गुरु जी ने अत्यंत सरल किंतु गूढ़ शब्दों में राजा से कहा कि समस्त सृष्टि एक ही परमात्मा की संतान है। जीवित मनुष्यों की हत्या कर मृत प्रतिमाओं को अर्पित करना ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता। धर्म का मार्ग करुणा, सत्य और प्रेम से होकर जाता है न कि हिंसा और भय से।
राजा का हृदय परिवर्तित हो गया। उसने गुरु जी के चरणों में झुककर अपने कृत्यों के लिए क्षमा माँगी और मार्गदर्शन की याचना की। परंपरा के अनुसार गुरु नानक देव जी ने उसे कुछ दिनों तक प्रतिदिन दीप प्रज्वलित कर सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण करने का उपदेश दिया। राजा ने वैसा ही किया और शीघ्र ही उसे पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। इस घटना को वह गुरु-कृपा का परिणाम मानता था।
कृतज्ञता स्वरूप उसने उस स्थान की भूमि दान कर दी जहाँ गुरु जी ठहरे थे। वही स्थान आगे चलकर गुरुद्वारा थड़ा साहिब के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। गुरु नानक देव जी के आशीष से स्थापित यह गुरुद्वारा आज भी कुमाऊँ के सबसे प्रतिष्ठित पूजास्थलों में गिना जाता है।

बागेश्वर से जुड़ी एक और लोककथा पीपल साहिब के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि गुरु नानक देव जी ने गोमती या सरयू तट के समीप एक सूखे पीपल वृक्ष के नीचे आसन लगाया। उनकी उपस्थिति और कीर्तन से वह सूखा वृक्ष हरा-भरा हो उठा। आज भी श्रद्धालु, खेतों के मध्य विराजमान उस हरे वृक्ष को गुरु का पीपल या पीपल साहिब कहकर स्मरण करते हैं। यह कथा केवल चमत्कार का आख्यान नहीं, बल्कि उस जीवन-दृष्टि का प्रतीक है जिसमें गुरु नानक देव जी ने जड़ और चेतन, मानव और प्रकृति के बीच एकात्मता का भाव स्थापित किया।
उत्तराखंड में गुरु नानक देव जी की यात्राओं का उल्लेख अन्य स्थलों के संदर्भ में भी मिलता है। मिसाल के लिए उधम सिंह नगर में स्थित नानकमत्ता साहिब का संबंध भी उनकी उसी तीसरी उदासी से जोड़ा जाता है, जहाँ पीपल वृक्ष के हरा होने की कथा प्रचलित है। उत्तराखण्ड का हिमालयी क्षेत्र गुरु जी की केवल भौगोलिक यात्रा का ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संवाद का भी केंद्र रहा है।
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