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Basta Ghar: रुपिंदर कौर की वो पहल, जो पंजाबी भाषा और महिलाओं को दे रही है नई उड़ान

Basta Ghar एक ऐसी पहल है, जो पंजाबी भाषा को सिर्फ़ ज़िंदा ही नहीं रख रही, बल्कि उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से भी जोड़ रही है। पंजाबी भाषा सिर्फ़ बातचीत का ज़रिया नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारी रूह की आवाज़ है। ऐसे दौर में, जब लोग अपनी मातृभाषाओं को भूलते जा रहे हैं, पंजाब के संगरूर ज़िले के दयालगढ़ गांव से ताल्लुक़ रखने वाली रुपिंदर कौर ने पंजाबी को बचाने और आगे बढ़ाने की एक अनोखी पहल की है। फिलहाल पटियाला में अपने स्टार्टअप ‘Basta Ghar’ के ज़रिए रुपिंदर कौर कला के ज़रिए से पंजाबी भाषा और संस्कृति को सहेजने का काम कर रही हैं।

बचपन और काम के प्रति सोच

रुपिंदर कौर बताती हैं कि उनका बचपन बहुत सादगी और मेहनत में बीता। उनकी मां सिलाई का काम करती थी और घर चलाने के लिए दिन-रात मेहनत करती थी। मां को काम करते देखकर रुपिंदर को भी सिलाई और कढ़ाई में दिलचस्पी हुई। घर की हालत ठीक नहीं थी, इसलिए रुपिंदर ने छोटी उम्र में ही पढ़ाई के साथ-साथ काम करना शुरू कर दिया। इसी समय ने उन्हें मेहनती, आत्मनिर्भर और काम को ईमानदारी से करने वाला इंसान बनाया।

पंजाब यूनिवर्सिटी से मिली प्रेरणा

पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला में पढ़ाई के दौरान 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर एक प्रोग्राम का आयोजन हुआ। इस प्रोग्राम ने रुपिंदर कौर की सोच को नया रास्ता दिखाया। वहां स्पीकर्स ने बताया कि पंजाबी भाषा धीरे-धीरे पीछे होती जा रही है। ये बात रुपिंदर के दिल को लग गई और उन्होंने सोचना शुरू किया कि वो अपनी तरफ़ से पंजाबी के लिए क्या कर सकती हैं। यहीं से पंजाबी भाषा को बचाने की उनकी सोच ने शेप लेना शुरू किया।

गुरमुखी अक्षरों से हुई शुरुआत

रुपिंदर कौर को कढ़ाई का काम पहले से आता था, इसलिए उन्होंने मशीन से कपड़े पर गुरमुखी अक्षर उकेरने शुरू किए। सबसे पहले उन्होंने एक साधारण सा झोला बनाया। लोगों को उनका काम बहुत पसंद आया और उन्हें खूब प्यार मिला। इसी हौसले ने रुपिंदर कौर को ‘Basta Ghar’ की शुरुआत करने के लिए मोटिवेट किया।

साल 2021 में रुपिंदर कौर ने अपने स्टार्टअप की ऑफ़िशियल शुरुआत की। लेबर डे यानी 1 मई को लुधियाना में हुए एक इवेंट में उन्होंने अपना पहला स्टॉल लगाया। उनके मुताबिक उस समय वो काफी घबराई हुई थी और उनके पास कोई स्टेबल बिज़नेस प्लान भी नहीं था। शुरुआत में लोग बस उनका काम देखते रहे, लेकिन इवेंट ख़त्म होते-होते सारे बैग बिक गए। इस एक्सपीरियंस ने उनके हौसले को और मज़बूत कर दिया।

‘Basta Ghar’: नाम और सोच

रुपिंदर कौर बताती हैं कि “Basta” एक पुराना शब्द है, जिसका मतलब स्कूल बैग होता है, और “Ghar” उनके लिए अपनापन और सुकून की पहचान है। उनके लिए ‘Basta Ghar’ वो जगह है, जहां वो अपने सपनों को उड़ान दे सकती हैं। वो कहती हैं कि ये जगह किसी ऑफ़िस या दुकान जैसी नहीं है, बल्कि एक घर जैसी है। यहां न कोई बॉस है और न ही किसी तरह का दबाव, सभी लोग मिलकर प्यार और आज़ादी के साथ काम करते हैं।

‘Basta Ghar’ में ज़्यादातर खादी कपड़े का इस्तेमाल होता है। खादी पंजाब के गांवों से जुड़ा पारंपरिक कपड़ा है, लेकिन आजकल इसका चलन कम होता जा रहा है। हर बैग पर गुरमुखी के अक्षर बनाए जाते हैं। रुपिंदर कौर का मानना है कि पंजाबी ऐसी भाषा है, जिसमें वो अपने दिल की बात अच्छे से ज़ाहिर कर सकती हैं। पंजाब में बने ये बैग अब कनाडा और ऑस्ट्रेलिया तक भेजे जा रहे हैं। विदेशों में रहने वाले पंजाबी लोगों के लिए ये प्रोडक्ट अपने वतन और अपनी भाषा से जुड़ने का एक ज़रिया बनते जा रहे हैं।

परिवार का साथ और भरोसा

रुपिंदर कौर मानती हैं कि अक्सर लड़कियों को बिज़नेस शुरू करते समय पूरा साथ नहीं मिलता, लेकिन उनके परिवार ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। वो कहती हैं कि जो मेहनत करता है, भगवान भी उसी का साथ देता है। ये बात उन्होंने अपनी मां को मेहनत करते हुए देखकर सीखी। रुपिंदर कौर ने MA और B.Ed. की पढ़ाई की है। इसके अलावा उन्होंने NET और PSTET जैसे एग्ज़ाम भी पास किए हैं। वो समाज की उस सोच पर भी बात करती हैं, जहां अक्सर लड़कियों के बिज़नेस को कमतर देखा जाता है। उनका कहना है कि अपनी मेहनत से कमाई गई छोटी-सी चीज़ की ख़ुशी किसी बड़े तोहफ़े से कहीं ज़्यादा होती है।

महिलाओं के लिए अवसर और हौसला

इस समय ‘Basta Ghar’ से 15 से 20 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। यहां काम करते हुए कई ऐसी महिलाएं, जिन्होंने 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, दोबारा पढ़ने के लिए मोटिवेट हुई। इनमें से कई महिलाओं ने काम के साथ-साथ 12वीं और BA तक की पढ़ाई पूरी की। ‘Basta Ghar’ उनके लिए सिर्फ़ काम की जगह नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की हिम्मत देने वाला एक प्लेटफ़ॉर्म बन गया है। रुपिंदर कौर कहती हैं कि वो दूसरी लड़कियों के लिए एक मिसाल बनना चाहती हैं। उनका मानना है कि अगर उनका काम सिर्फ़ दस लड़कियों को भी अपना खुद का काम शुरू करने की प्रेरणा दे सके, तो वही उनकी सबसे बड़ी कामयाबी होगी।

रुपिंदर कौर सभी लड़कियों को यही मैसेज देती हैं कि कभी हार न मानें, खुद पर भरोसा रखें और अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करती रहें। आज ‘Basta Ghar’ एक ऐसी ख़ास पहल बन चुका है, जहां पंजाबी भाषा और महिलाओं की ताक़त एक साथ जुड़कर आगे बढ़ रही है।

इस लेख को अंग्रेज़ी और पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: ‘Kashmir Ki Kali’: सुजाता की पहल जो कश्मीर की महिलाओं को हुनर, पहचान और रोज़गार से जोड़ रही है

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