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नाज़ुक धागों से पिरोई और नफ़ासत से महकती लखनऊ चिकनकारी  

भारत का सबसे नज़ाकत और नफ़ासत से भरा शहर लखनऊ जो अपनी शानदार विरासत के लिए जाना जाता है। नवाबों और बेगमों की शान-ए-शौक की कहानियां शाम-ए-अवध के कोनों-कोनों में बसी हैं। चिकनकारी कला शहर की तहजीब और विरासत का एक ख़ास हिस्सा है।

हर दिल अज़ीज़ चिकनकारी हैंडवर्क इंडियन फैशन में ख़ास मुकाम रखता है। नवाबों के शहर लखनऊ से शुरू हुए इस बेहतरीन आर्ट वर्क ने अपने पेचीदा डिजाइनों और बेजोड़ शान से दुनिया भर के लोगों के दिलों में जगह बनाई है।  

लखनऊ अपनी अमीर सख़ावति ताने-बाने और हुनरमंद कारीगरों के साथ चिकनकारी का प्रोडक्शन हब है। चिकनकारी और कामदानी अपने पेचीदा काम और शान के लिए जाना जाता है। चिकनकारी के साथ सोने और चांदी के तारों से कामदानी जिसे मुकेश का काम भी कहते हैं फैशन इंडस्ट्री में छाया हुआ है। देश-विदेश के बड़े-बड़े डिजाइनर आज चिकनकारी और मुकेश की कला को दोबारा से जिंदा करने में लगे हैं। आज के वक्त में लखनऊ चिकनकारी और कामदानी हैंडवर्क का प्रोडक्शन हब बन चुका है।

लखनऊ चिकनकारी

नवाबी शान वाली चिकनकारी जो ‘शहर-ए-अदब’ की पहचान है इसकी शुरुआत के बारें में मशहूर फैशन डिजाइनर असमा हुसैन ने बताया कि सफ़ेद मलमल के ऊपर सफेद कच्चे धागे से एंब्रॉयडरी की जाती है। कहते हैं कि नूरजहां जब यहां आई तो उन्हीं ने अपने जमाने में दिल्ली में इसकी शुरुआत की थी। लेकिन उसके बाद इसका कहीं पता नहीं चलता। कहीं भी आपको कोई लिबास नजर नहीं आते हैं।

जब तक आप 18वीं सदी में नहीं आ जाते तो 18वीं सदी में जब लखनऊ अवध दोबारा से मशहूर हुआ यहां पर जब नवाब बुरहानुल मुल्क और शिजाउद्दौला, आसफ उद्दौला के आने के बाद से जो थोड़ा सा जो रुझान था वो आर्ट क्राफ्ट आर्किटेक्चर की तरफ बढ़ाया। यहीं से चिकनकारी की शायद कहीं शुरुआत हुई।  लेकिन जो उसकी जिस तरह से हम शान और शौकत कह सकते हैं वो 18वीं सदी के बिल्कुल आखिर में और 19वीं सदी की शुरुआत में हुई जब नसीरुद्दीन हैदर गाजउद्दीन हैदर आए।  

कहां से आई चिकनकारी ?

असमा हुसैन चिकनकारी कहां से आई इस पर बताती हैं कि कहा जाता है कि ये पर्शिया से आई लेकिन मुझे थोड़ा डाउट है कि पर्शिया से आई होगी क्योंकि पर्शिया में आज भी कोई ऐसा कुछ नहीं है अगर वहां से आई होती तो आज के जमाने में वहां कोई सफेद पर एंब्रॉयडरी होती लेकिन ऐसी कोई चीज हमको पर्शिया में नहीं मिलती हालांकि हमें तुर्की में मिलती है तुर्की में शीक नाम का वर्ड भी होता है जिसको कशीदाकारी जैसे कहते हैं। 

फैशन डिजाइनर असमा हुसैन बताती हैं कि लखनऊ में जब बुरहान मुल्क आए तो उनकी एक लाइन पर्शियन थी और एक लाइन टर्किश थी और शादियां हुई तो टर्किश इन्फ्लुएंस पर्शिया के साथ-साथ बहुत ज्यादा दिखाई देता है। लखनऊ में तो हो सकता है वहां से कोई लाया हो बहरहाल इसको पाला पोसा बड़ा किया नवाबों ने तो आज उसको सिर्फ हम लोग एक लक्जरी एंब्रॉयडरी की तरह यूज करते हैं। 

लखनऊ में चिकनकारी की कैसे हुई शुरूआत

वर्ल्ड फेमस अमीरुद्दौला लाइब्रेरी की रिटायर्ड लाइब्रेरियन और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान पाने वाली साहित्यकार नुसरत नाहिद ने लखनऊ चिकन और हैंडवर्क पर बात की और कई बारीक बातें डीएनएन 24 के साथ शेयर की।

नुसरत बताती हैं कि मुर्शिदाबाद में जिस वक्त शुजाउद्दौला थे, लड़कियों को शादी में जैसे लौटा, कटोरा जैसी ज़रूरी चीजें दी जाती थी तो साथ में एक तीलेदानी भी दी। उस तीलेदानी जो झोले टाइप होता था लेकिन उसमें गर्म कपड़े, सुइयां होती थी। बटन होते थे और धागे होते थे हर तरह के और उस वक्त सुइया जो थी वो चांदी की बनती थी। इसलिए चांदी की बनती थी कि उंगली में लगे तो कोई इंफेक्शन ना हो।

शुजाउद्दौला की पत्नी रुखसाना बेगम ने नवाब साहब को खुश करने के लिए एक टोपी कच्चे धागे से बनाना शुरू की।  इस तरह से पहला चिकन का काम अवध में शुरू हुआ। महल की कनीज़ों ने भी देख कर ये काम सीख लिया। चिकन को अच्छे से अच्छा काम में तमाम टाके बनते चले गए। इस तरह चिकन महल से निकल कर सड़कों पर आई और पूरे अवध में फैल गई।  नवाबों ने उसको खूब  सराहा । नुसरत नाहिद बताती हैं कि चिकन इतनी मशहूर हुई कि यूके, फ्रांस हर जगह भेजी जाती थी।  

साहित्यकार नुसरत नाहिद चिकन की कढ़ाई के काम पर आगे कहती हैं  कि ये काम बादशाहों को इतना पसंद था कि कारीगरों को इनकरेज किया कि वो अच्छे से अच्छी चीज़ बनाएं।  आज कारीगरी और हस्तकला की बदौलत दुनिया में लखनऊ चिकनकारी का प्रमुख प्रोडक्शन हब बन चुका हैै।  यहां की तंग गलियों और कारीगर बस्तियों में बसने वाले शिल्पकार पीढ़ियों से इस प्राचीन कला को निखते आ रहे हैं। 

लखनऊ में कामदानी

लखनऊ में कामदानी का काम काफी फेमस है जिसे मुकेश का काम भी कहते हैं। इसके बारें में फैशन डिजाइनर असमा हुसैन ने बताया कि कामदानी एक आम लफ्ज़ है। इसके मुकेश कहते हैं जो तार होता है मेटल का तार होता है और यूजुअली सिल्वर कलर का होता था। सिल्वर कलर के असली चांदी का मुखहैश कहते थे और उससे जो काम बनता है उससे जो कढ़ाई करते हैं उसको मुकेश की कढ़ाई कहते हैं। कामदानी वो इस तरह कहलाने लगा कि उससे जो छोटे-छोटे महीन- महीन दाने स्पॉट्स डाले जाते थे। वो दानी हो गया और काम जैसे काम मुकेश का काम या चिकन का काम कहते हैं तो वो उससे कामदानी हो गया। 

वो बताती हैं कि मुकेश बेसिकली जरदोजी का पार्ट होता था। इसके तार से  जरदोजी बनती थी लेकिन लखनऊ में नवाबों के वक्त गर्मियों में जरदोजी नहीं पहनी जा सकती थी  तब हल्के कपड़ो पर चमकदार कढ़ाई की शुरूआत हुई। जरदोजी सर्दियों में पहनी जाती थी और गर्मियों में मुकेश का काम पहना जाता था।  

आज के वक्त में किसी भी दूसरी रिवायती दस्तकारी की तरह ही चिकनकारी कढ़ाई में भी चुनौतियां भरी हुई हैं। मशीन की कढ़ाई,अच्छे कारीगर और सरकारी मदद  की कमी, ये सभी इस शिल्प के लिए एक चुनौती है।

ये भी पढ़ें: लखनऊ का क़दीमी उर्दू कुतुबखाना ‘दानिश महल’, जहां आते थे जोश मलीहाबादी से लेकर फ़िराक़ गोरखपुरी तक

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