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शिक्षा की अलख जगाते सलामुल हक़

जिन लोगों ने अपनी ज़िंदगी में अभाव देखा है वो दर्द की टीस को बखूबी समझते हैं। ऐसी ही एक शख़्सियत हैं सलामुल हक़। बचपन से ही गरीबी देखी और तभी से ही वो समझ गए कि जिंदगी गुज़ारने के लिए शिक्षा बहुत ज़रूरी है। सलामुल हक़ का जन्म झारखंड के रामगढ़ ज़िले के मगनपुर के एक बेहद ग़रीब परिवार में हुआ था।

सलामुल हक़ ने भी राजकीय विद्यालय से पढ़ाई शुरू की थी और फिर रांची विश्वविद्यालय से मास्टर्स की डिग्री ली। सलामुल हक़ के लिए बच्चों को पढ़ाना सिर्फ़ रोज़ी रोटी कमाने का ज़रिया नहीं है, बल्कि इसके ज़रिए वो ज़रूरतमंद बच्चों वो फ़्री में पढ़ाते हैं और गरीब परिवारों के बच्चों को राजकीय विद्यालय में दाखिला दिलाने के लिए प्रेरित करते हैं।

साल 2002 में उनका ट्रांसफ़र रामगढ़ ज़िले के गोला के उत्क्रमिक मध्य विद्यालय चाड़ी उर्दू कन्या में हुआ। यहां उन्हें बतौरप्रिंसिपल विद्यालय की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उस समय स्कूल की हालत बहुत ख़राब थी। बच्चे खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ते थे। स्कूल में पीने का पानी और शौचालय का भी इंतज़ाम नहीं था, जिसके कारण बच्चों को काफ़ी दिक्कत होती थी। बच्चों की इन परेशानियों को सलामुल हक़ ने देखा और गांव के लोगों से मदद मांगी। उनकी कोशिशों से स्कूल में दो कमरें बनाए गए।

झारखंड शिक्षा परियोजना के तहत स्कूल में शौचालय, फ़र्नीचर और पीने के पानी का भी इंतज़ाम करवाया गया। स्कूल के विकास का ये सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर चल पढ़ा। आज स्कूल में 12 कमरे हैं और तकरीबन 200 लड़कियां तालीम हासिल कर रही हैं। 

वो कहते हैं कि तालीम के ज़रिये ही एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है। बेटों के साथ-साथ बेटियों को शिक्षा दिलाना भी बेहद ज़रूरी है क्योंकि शिक्षा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

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ये भी पढ़ें: ‘उम्मीद’ अकादमी के वली रहमानी गरीब बच्चों के बने शिक्षक

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