Friday, March 6, 2026
22.4 C
Delhi

शिक्षा की अलख जगाते सलामुल हक़

जिन लोगों ने अपनी ज़िंदगी में अभाव देखा है वो दर्द की टीस को बखूबी समझते हैं। ऐसी ही एक शख़्सियत हैं सलामुल हक़। बचपन से ही गरीबी देखी और तभी से ही वो समझ गए कि जिंदगी गुज़ारने के लिए शिक्षा बहुत ज़रूरी है। सलामुल हक़ का जन्म झारखंड के रामगढ़ ज़िले के मगनपुर के एक बेहद ग़रीब परिवार में हुआ था।

सलामुल हक़ ने भी राजकीय विद्यालय से पढ़ाई शुरू की थी और फिर रांची विश्वविद्यालय से मास्टर्स की डिग्री ली। सलामुल हक़ के लिए बच्चों को पढ़ाना सिर्फ़ रोज़ी रोटी कमाने का ज़रिया नहीं है, बल्कि इसके ज़रिए वो ज़रूरतमंद बच्चों वो फ़्री में पढ़ाते हैं और गरीब परिवारों के बच्चों को राजकीय विद्यालय में दाखिला दिलाने के लिए प्रेरित करते हैं।

साल 2002 में उनका ट्रांसफ़र रामगढ़ ज़िले के गोला के उत्क्रमिक मध्य विद्यालय चाड़ी उर्दू कन्या में हुआ। यहां उन्हें बतौरप्रिंसिपल विद्यालय की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उस समय स्कूल की हालत बहुत ख़राब थी। बच्चे खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ते थे। स्कूल में पीने का पानी और शौचालय का भी इंतज़ाम नहीं था, जिसके कारण बच्चों को काफ़ी दिक्कत होती थी। बच्चों की इन परेशानियों को सलामुल हक़ ने देखा और गांव के लोगों से मदद मांगी। उनकी कोशिशों से स्कूल में दो कमरें बनाए गए।

झारखंड शिक्षा परियोजना के तहत स्कूल में शौचालय, फ़र्नीचर और पीने के पानी का भी इंतज़ाम करवाया गया। स्कूल के विकास का ये सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर चल पढ़ा। आज स्कूल में 12 कमरे हैं और तकरीबन 200 लड़कियां तालीम हासिल कर रही हैं। 

वो कहते हैं कि तालीम के ज़रिये ही एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है। बेटों के साथ-साथ बेटियों को शिक्षा दिलाना भी बेहद ज़रूरी है क्योंकि शिक्षा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

इस ख़बर को पूरा पढ़ने के लिए hindi.awazthevoice.in पर जाएं।

ये भी पढ़ें: ‘उम्मीद’ अकादमी के वली रहमानी गरीब बच्चों के बने शिक्षक

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

कैफ़ अहमद सिद्दीकी: मास्टर साहब बच्चों के दिल के शायर और समाज का आईना

कभी-कभी बड़े शहरों की चकाचौंध से दूर, छोटे कस्बों...

ज़ायके का सफ़रनामा: दम पुख़्त से दिल की बात, पुरानी रसोई का नया ज़माना

दम पुख़्त: इंडियन फूड लवर्स अब सिर्फ विदेशी व्यंजनों (Exotic recipes) का स्वाद नहीं लेना चाहते, बल्कि अपनी पुरानी रसोई की ओर लौटने लगे हैं। 'रूट्स की तरफ वापसी' (Return to the roots) का ये ट्रेंड न सिर्फ खाने के स्वाद को बदल रहा है, बल्कि हमारी सेहत को भी नया आयाम दे रहा है।

अमेरिका और भारत की रक्षा साझेदारी को हकीकत में बदलना

U.S.-इंडिया मेजर डिफेंस पार्टनरशिप का फ्रेमवर्क U.S.-इंडिया सिक्योरिटी कोऑपरेशन को तेज़ करेगा, इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ाएगा और इंडस्ट्रीज़ को जोड़ेगा।

Topics

कैफ़ अहमद सिद्दीकी: मास्टर साहब बच्चों के दिल के शायर और समाज का आईना

कभी-कभी बड़े शहरों की चकाचौंध से दूर, छोटे कस्बों...

ज़ायके का सफ़रनामा: दम पुख़्त से दिल की बात, पुरानी रसोई का नया ज़माना

दम पुख़्त: इंडियन फूड लवर्स अब सिर्फ विदेशी व्यंजनों (Exotic recipes) का स्वाद नहीं लेना चाहते, बल्कि अपनी पुरानी रसोई की ओर लौटने लगे हैं। 'रूट्स की तरफ वापसी' (Return to the roots) का ये ट्रेंड न सिर्फ खाने के स्वाद को बदल रहा है, बल्कि हमारी सेहत को भी नया आयाम दे रहा है।

अमेरिका और भारत की रक्षा साझेदारी को हकीकत में बदलना

U.S.-इंडिया मेजर डिफेंस पार्टनरशिप का फ्रेमवर्क U.S.-इंडिया सिक्योरिटी कोऑपरेशन को तेज़ करेगा, इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ाएगा और इंडस्ट्रीज़ को जोड़ेगा।

शहंशाहों का कारवां और रेशमी धागों का जादू: Parsi Gara, जब फ़ारस के फूल हिंदुस्तान की मिट्टी में मुस्कुराए

‘गारा’ फारसी लैंग्वेज का लफ्ज़ (‘Gara’ is a Persian word) है, जिसका मतलब होता है ‘सुई से काम करना’ या ‘सिलाई। लेकिन पारसी गारा में ये सिलाई जादू में बदल गई।

आख़िर पंजाब में माइग्रेंट वर्कर्स का विरोध क्यों हो रहा है?

माइग्रेंट वर्कर्स का विरोध करने वाले लोग दावा करते हैं कि पंजाब में 70 लाख से 1.5 करोड़ के बीच माइग्रेंट वर्कर्स रहते हैं। लेकिन सच तो ये है कि किसी के पास साफ़, वेरिफाइड नंबर नहीं हैं। वे जो आंकड़े बताते हैं, वे असलियत से बहुत दूर लगते हैं।

Related Articles

Popular Categories