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कैसे बनती है पश्मीना ऊन से बनी कश्मीर की मशहूर कानी शॉल

पश्मीना शब्द फारसी शब्द ‘पश्म’ से लिया गया है जिसका अर्थ है बुनाई योग्य फाइबर जो मुख्य रूप से ऊन है। पश्मीना ऊन (Pashmina Wool) से बनने वाली कानी शॉल कश्मीरी लोग सर्दियों के मौसम में खुद को गर्म रखने के लिए इस्तेमाल करते है। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में तैयार होती है रंग बिरंगी शॉल, जिन्हें कानी शॉल (Kani Shawl) के नाम जाना जाता है।

पश्मीना ऊन से बनने वाली इन शॉल को लकड़ी से बनी सलाइयों के जरिए बनाया जाता है। इन सलाइयों को कानी कहते है। अलग अलग तरह के मौजूद फूलों के डिजाइन को देखते हुए कानी शॉल पर डिजाइन बनाया जाता है। शॉल पर ज्यादातर फूल और पत्तियों का डिजाइन होता है।

इसका इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। मुगल काल में इसे काफी पसंद किया जाता था। इसे बनाने में तकनीक के साथ साथ सब्र की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। ये कला सदियों से देश-दुनिया के राजाओं की पोशाक का एक हिस्सा रहा है।

कैसे बनती है कानी शॉल 

कानी शॉल बनाने के लिए पशमीना ऊन के अलग अलग रंगों को चरखे की मदद से कानी लकड़ियों की मदद से सलाइयों पर लपेटा जाता है। फिर इसे हैंडलूम पर चढ़ाया जाता है। इसके बाद शॉल को बुनने का काम शुरू होता है। अलग अलग रंग के ऊन को चढ़ाने के बाद ये एक तरह से रंगोली की तरह दिखाई देती है। 

सवाल उठता है कि इतनी बारीक कढ़ाई को करने के लिए कारीगर याद कैसे रखते है? इस बुनाई के लिए डिजाइन शॉल पर एक कोडित भाषा में लिखा जाता है, जिसे ‘तालिम’ कहा जाता है। एक ग्राफ पेपर पर मास्टर बुनकर कोडित पैटर्न तैयार करते है।

नेशनल और इंटरनेशनल मंचों पर सम्मानित खान ब्रदर्स 

श्रीनगर के बदाम्वारी इलाके के रहने वाली खान ब्रदर्स निसार अहमद खान और मुशताक अहमद खान अपने कानी शॉल के काम के लिए जाने जाते है। जिन्हें ये कलाकारी विरासत में मिली है। खान ब्रदर्स को इस कला को संजोए रखने के लिए नेशनल और इंटरनेशनल मंचों पर सम्मानित किया गया है। लेकिन इनकी चाहते है कि कानी कलाकारी से बने प्रोडक्ट की मांग और बढ़े जिससे कश्मीर के रिच कल्चर हेरिटेज का सबूत भारत का हर शख्स बने।  

पश्मीना ऊन
निसार अहमद खान. Image source by DNN24

निसार अहमद खान DNN24 बताते है कि “किसी भी कौम का तब तक उसके लिए जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है जब तक वो अपना ट्रडिशन, कल्चर बचा ना सके। पशमीना के लिए निशार अहमद ने वॉलिंट्यर करीब आठ सालों तक काम किया है।” 

कानी शॉल का अपना एक अलग मुकाम रहा है। इसका आईने अकबरी में भी जिक्र मिलता है। जो इस बात का सबूत है कि अकबर भी इस कला का शौकीन था। लोगों का कहना है कि पिछले वक्त में कानी शॉल की लोकप्रियता और मांग इतनी ज्यादा थी कि लोग रईसी की जिंदगी जीते थे। हुक्के में पानी की जगह दूध का इस्तेमाल करते थे।

एक शॉल बनाने में कितना समय लगता है

निशार अहमद बताते है कि अगर पूरा जामा (ऐसी पोशाक जिससे गला, छाती, पीठ एवं पेट ढका हो) बनाया जाए तो करीब छह से नौ महीने का समय लगता है। 20,000 से लेकर 6 लाख रूपये तक शॉल बनाई जाती है। और इसका सालों साल काम किया जाता है। समय के साथ साथ अब कानी शॉल को बनाने के लिए अब बाजारों में मशीने आने लगी है। लेकिन खान ब्रदर्स ने अब तक परंपरागत प्रक्रिया का दामन नहीं छोड़ा। इनका मानना है कि कानी की मदद से की गई कला से ही असल कानी शॉल तैयार होती है। निशार अहमद का मानना है कि हाथ और मशीन का कोई मुकाबला नहीं है।

ये भी पढ़ें: मोहम्मद आशिक और मर्लिन: एक अनोखी कहानी जिसने बदल दिया शिक्षा का परिपेक्ष्य

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