भारत की आज़ादी की जंग में ग़दर पार्टी का नाम बेहद इज़्ज़त और फ़ख्र के साथ लिया जाता है। ये सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सोच थी, जिसने लोगों को अपने मुल्क़ के लिए सब कुछ क़ुर्बान करने की ताक़त दी। Ghadar Movement के क्रांतिकारी सिर्फ अंग्रेज़ हुक़ूमत को ख़त्म करना नहीं चाहते थे, बल्कि एक ऐसा हिंदुस्तान बनाना चाहते थे जहां हर इंसान को बराबरी का हक़ मिले, जहां किसी के साथ नाइंसाफ़ी न हो।
बराबरी और इंसाफ़ का ख़्वाब
ग़दर पार्टी की सोच अपने वक़्त से बहुत आगे थी। उनका मानना था कि असली आज़ादी सिर्फ अंग्रेज़ों से छुटकारा पाने से नहीं मिलेगी, बल्कि तब मिलेगी जब समाज में इंसाफ़ और बराबरी होगी। उनका ख़्वाब था एक ऐसा हिंदुस्तान, जहां अमीर और ग़रीब के बीच की दीवारें गिर जाएं। वो चाहते थे कि मज़दूरों को उनकी मेहनत का पूरा हक़ मिले, उन्हें इज़्ज़त के साथ जीने का मौक़ा मिले। जो लोग दूसरों के लिए आलीशान महल बनाते हैं, उनके पास खुद के लिए एक छोटा लेकिन इज़्ज़त वाला घर तो हो।
Ghadar Movement के क्रांतिकारियों का दिल किसानों के लिए भी धड़कता था। उनका कहना था कि जो किसान पूरे मुल्क़ का पेट भरते हैं, उन्हें खुद भूखा नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें खुशहाल ज़िंदगी मिलनी चाहिए। आज जब हम अपने चारों तरफ देखते हैं, तो महसूस होता है कि ग़दर की ये सोच आज भी उतनी ही ज़रूरी है, जितनी उस दौर में थी।

ग़दर पार्टी की बुनियाद और अख़बार
ग़दर पार्टी की बुनियाद 21 अप्रैल 1913 को अमेरिका के एस्टोरिया में रखी गई थी। उस वक़्त इसका नाम “हिंदी पैसिफिक एसोसिएशन” था। अपने ख़्यालात को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने “ग़दर” नाम का अख़बार शुरू किया। ये अख़बार सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा नहीं था, बल्कि इंक़लाब की आवाज़ था। इस अख़बार ने विदेशों में रह रहे भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की आग जला दी। धीरे-धीरे इसकी इतनी पहचान बन गई कि लोग ग़दर पार्टी के नाम से जानने लगे।
ग़दर पार्टी की कामयाबी के पीछे उसके मज़बूत और समर्पित रहनुमा थे। बाबा सोहन सिंह भकना इसके अध्यक्ष थे, जबकि बाबा ठाकुर केसरी सिंह बारहठ उपाध्यक्ष बने। लाला हरदयाल महासचिव थे, जिनकी सोच और लीडरशिप ने इस आंदोलन को मज़बूती दी। इसके अलावा लाला ठाकुर दास धूरी, पंडित कांशीराम मादरोली और बाद में भाई जवाला सिंह जैसे लोग भी अहम ज़िम्मेदारियों में थे। करतार सिंह सराभा जैसे नौजवान क्रांतिकारी इस तहरीक की जान थे। उनके अंदर जो जज़्बा था, वो आज भी युवाओं को प्रेरित करता है।
संगठित योजना और ज़िम्मेदारियों का बंटवारा
ग़दर पार्टी का काम करने का तरीका बेहद ऑर्गनाइज़ (organized) था। हर शख़्स को उसकी ज़िम्मेदारी साफ़ तौर पर दी गई थी। बाबा सोहन सिंह भकना को योकोहामा भेजा गया, ताकि वो कोमागाटा मारू जहाज़ के यात्रियों में जागरूकता फैला सकें। करतार सिंह सराभा ने विमानन और इंजीनियरिंग सीखी, ताकि वो तहरीक को तकनीकी तौर पर मज़बूत कर सकें। उधम सिंह कसेल को फ़ौजी ट्रेनिंग की ज़िम्मेदारी दी गई, वही भाई हरनाम सिंह कोटला बम बनाने में माहिर थे।
पंडित सोहन लाल पाठक बर्मा और सियाम (थाईलैंड) से काम संभाल रहे थे, जबकि मौलवी बरकतुल्लाह को अफ़ग़ानिस्तान भेजा गया, ताकि वहां के बादशाह से मदद ली जा सके। इन तमाम कोशिशों से साफ है कि ग़दर पार्टी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक इंटरनेशनल नेटवर्क तैयार कर लिया था।

पहला विश्व युद्ध और बगावत की कोशिश
जब पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो ग़दर के क्रांतिकारियों को लगा कि यही सही वक़्त है अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बगावत का। उन्हें यक़ीन था कि जंग की वजह से अंग्रेज़ कमज़ोर हो जाएंगे। इसी उम्मीद के साथ हज़ारों ग़दरी विदेशों से हिंदुस्तान लौटने लगे। लेकिन अंग्रेज़ हुक़ूमत बहुत शातिर थी। उन्हें इस प्लान की ख़बर लग गई और कई क्रांतिकारियों को बंदरगाहों पर ही गिरफ़्तार कर लिया गया।
इसके बावजूद करतार सिंह सराभा और उनके साथियों ने हार नहीं मानी। वो हिंदुस्तान पहुंचे और सेना की छावनियों में अपने लोगों से संपर्क बनाना शुरू किया। 19 फरवरी 1915 को बगावत की तारीख़ तय हुई, लेकिन कुछ गद्दारों ने ये राज अंग्रेज़ों को बता दिया। इसके बाद अंग्रेज़ों ने सख़्त कार्रवाई करते हुए सैकड़ों क्रांतिकारियों को पकड़ लिया।

202 कुर्बानियों की दास्तान
अंग्रेज़ों ने इस बग़ावत का जवाब बहुत ही बेरहमी से दिया। करीब 202 क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। 316 लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा देकर काला पानी भेज दिया गया। सैकड़ों लोगों की जायदाद छीन ली गई। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर एक नंबर के पीछे एक कहानी है एक ऐसा घर, जो उजड़ गया, एक ऐसी मां, जिसने अपने बेटे को खो दिया, और एक ऐसा नौजवान, जिसने अपने मुल्क़ के लिए हंसते-हंसते जान दे दी। इन कुर्बानियों ने आगे चलकर भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को भी प्रेरित किया और आज़ादी की लड़ाई को और तेज़ कर दिया।

आज़ाद भारत और अधूरा सपना
Ghadar Movement भले ही उस वक़्त पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया, लेकिन इसने आज़ादी की जो चिंगारी जलाई, वो कभी बुझी नहीं। ये एक ऐसी चिंगारी थी, जिसने पूरे मुल्क़ को जगा दिया। लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि आज़ादी के बाद हम कहीं न कहीं ग़दर के उस असली ख़्वाब को भूल गए। उनका सपना सिर्फ सियासी आज़ादी नहीं था, बल्कि एक ऐसा समाज बनाना था जहां हर इंसान बराबर हो।
आज भी हमारे समाज में अमीर और ग़रीब के बीच फासला बढ़ता जा रहा है। किसान परेशान हैं, मज़दूर अपने हक़ के लिए जूझ रहे हैं। ये सब देखकर लगता है कि Ghadar Movement के क्रांतिकारियों का सपना अभी भी अधूरा है। Ghadar Movement हमें एक बहुत बड़ी सीख देता है देशभक्ति सिर्फ नारे लगाने से नहीं होती, बल्कि इंसानियत की खिदमत करने से होती है। जब तक हर इंसान को बराबरी का हक़ नहीं मिलेगा, जब तक हर मज़दूर को उसकी मेहनत का सही हक़ नहीं मिलेगा, तब तक असली आज़ादी अधूरी रहेगी।
लेख: Gurpreet Singh
इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें
ये भी पढ़ें: 5000 साल पुराना पंजाब: हड़प्पा के उस पार की अनकही दास्तान
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।


