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‘अंजुमन-ए-इस्लाम’ बना गरीब छात्रों के लिए मसीहा

आज से लगभग 150 साल पहले मुंबई के कुछ बुद्धिजीवियों ने मिलकर ‘अंजुमन-ए-इस्लाम’ उर्दू स्कूल की स्थापना की। ‘अंजुमन-ए-इस्लाम’ (Anjuman-I-Islam) की स्थापना अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना से एक साल पहले हुई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले भारतीय बैरिस्टर बदरूद्दीन तैयबजी, (Badruddin Tyabji) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीसरे अध्यक्ष कमरूद्दीन तैयबजी, वकील नाखुश मोहम्मद अलगी रोगे, व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता गुलाम मोहम्मद मुंशी जैसी शख्सियतों की पहल से अंजुमन की नींव रखी गई।

साल 1893 में अंजुमन को विक्टोरिया टर्मिनल्स के सामने बनी एक इमारत में ट्रांसफ़र कर दिया गया और आज भी ये यहीं से संचालित होता है। स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों के लिए उस समय कई सुविधांए मुहैया की गई थी जैसे छात्रों को स्कॉलरशिप देने से लेकर आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों को दोपहर का खाना बांटना।

अंजुमन’ का बीज जहां बोया गया था, आज उसी जगह संस्था का मुख्य प्रशासनिक कार्यालय है। संस्थान के तीन एकड़ परिसर में पांच कॉलेज- दो कैटरिंग कॉलेज, एक बिज़नेस-मैनेजमेंट कॉलेज, एक होम साइंस कॉलेज और एक लॉ कॉलेज बने हुए। इसके अलावा, महिलाओं के लिए एक पॉलिटेक्निक, एक जूनियर कॉलेज, और उर्दू दोनों माध्यम के दो स्कूल हैं। इस परिसर में एक बड़ा पुस्तकालय और एक रिसर्च सेंटर भी है। अंजुमन के दो मुख्य उद्देश्य हैं, पहला- ‘न्यूनतम लागत पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना’ और दूसरा- ‘पैसे की कमी के कारण किसी भी छात्र को शिक्षा से वंचित होने से रोकना।’

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ये भी पढ़ें: ‘तहकीक-ए-हिंद’: उज़्बेकिस्तान में जन्मे अल-बीरूनी का हिंदुस्तान की सरज़मीं से ख़ास रिश्ता

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