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मऊ साड़ी: ज़री में लिपटी परंपरा,जिसका हर धागा कहानी कहता है

उत्तर प्रदेश, जो भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक है,अपनी रिच हैरिटेज और कई पारंपरिक वस्त्रों (Traditional garments) के लिए दुनियाभर में मशहूर है। बनारसी साड़ियों के बारें में सभी जानते हैं, लेकिन सूबे के अलग-अलग कोने से निकलकर कुछ ऐसी भी साड़ियां हैं जिन्होंने लोगों का दिल जीता है। इन्हीं में से एक है मऊ की साड़ी। यूपी का एक छोटा-सा नगर मऊ,अपनी साड़ियों,ज़री के काम और कशीदाकारी के लिए मशहूर है। इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश का ‘बुनकरों का पावरहाउस’ कहा जाता है।

Image Credit: incredibleindia.gov.in

सदियों पुरानी हुनरमंदी

उत्तर प्रदेश की ज़्यादातर कलाओं की तरह मऊ साड़ी का इतिहास भी सोलहवीं सदी के मुग़ल दौर तक जाता है। माना जाता है कि इस फ़न को शाहजहां की सबसे बड़ी बेटी जहांआरा बेगम का शाही तहफ्फुज़ मिला हुआ थ। बेहतरीन रेशम से बुनी जाने वाली ये नौ गज़ का फ़लसफ़ा अपने गहरे रंगों और बारीक ज़री के काम के लिए संजोया जाता है। एक साड़ी बनाने में कई कारीगरों की महारत लगती है। पहले बेहतरीन रेशम का सिलेक्शन, फिर बुनाई उसके बाद नैचुरल कलर्स में रंगाई, धूप में सुखाना और आख़िर में ज़री का काम, जिसमें एक ख़ास सुई से मैटेलिक धागे को नक़्शों में पिरोया जाता है।

Image Credit: incredibleindia.gov.in

एक लाजवाब क्लासिक

मऊ साड़ी वक़्त की कसौटी पर खरी उतरी एक लाजवाब क्लासिक है। ये साड़ियां कारीगरों की मेहनत और मुहब्बत का नतीजा हैं, जिन्होंने सालों तक अपने हुनर को तराशा है। शादी-ब्याह और धार्मिक त्योहारों में पहनी जाने वाली ये साड़ियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजी जाने वाली विरासत हैं। ये शुभ और समृद्धि के साथ सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। ये साड़ी हर महिला की अलमारी की शान हैं।

Image Credit: Social Media

विरासत की हिफ़ाज़त

मऊ साड़ी सिर्फ़ एक लिबास नहीं, बल्कि देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का आइना भी है। सरकारी और ग़ैर-सरकारी संगठनों ने स्थानीय बुनकरों को प्रोत्साहित करके इस हुनर को ज़िंदा रखा है। बुनकरों को काम करते देखना अपने आप में एक नज़ारा है। इन साड़ियों में उनकी लगन और महारत बारीक नक़्शों में झलकती है। लोकल बाज़ारों में आप तरह-तरह के डिज़ाइन चुन सकते हैं। इन साड़ियों को ख़रीदकर आप न केवल यहां के कारीगरों का हौसला बढ़ाते हैं, बल्कि एक सदियों पुरानी बुनाई संस्कृति को सहेजने में भी अपना योगदान देते हैं।

ये भी पढ़ें- लाहौली बुने मोज़े और दस्ताने: हिमालय की वादियों से निकली एक अनमोल विरासत

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