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Punjabi Folk Singer Gurmeet Bawa: इम्तियाज़ अली ने शूटिंग में क्यों बजाया उनका ‘जुगनी’ गाना?

पंजाब के लोकगीतों में एक अलग ही रंग है। कहीं शादियों की रौनक है, कहीं मोहब्बत की कहानियां, तो कहीं अपनी मिट्टी और अपनों से जुड़ी यादें। इन गीतों को अपनी आवाज़ से लोगों के दिलों तक पहुंचाने वाली गायिकाओं में गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) का नाम बेहद ख़ास है। उनकी आवाज़ में पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू थी और गायकी में ऐसा हुनर, जिसने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई।

गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) को ‘लंबी हेक की मलिका’ कहा जाता था। उनकी सबसे बड़ी पहचान थी एक ही सांस में करीब 45 सेकंड तक आवाज़ को खींचकर गाना। उनकी इस अनोखी कला ने उन्हें पंजाबी लोक संगीत की दुनिया में एक अलग मुकाम दिलाया। लेकिन गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की कहानी सिर्फ़ उनकी लंबी हेक तक महदूद नहीं है। ये कहानी है एक ऐसी गायिका की, जिसने पुराने लोकगीतों को सहेजने और पंजाबी तहज़ीब को आगे बढ़ाने में अहम किरदार निभाया।

एक हेक, जिसने बनाई अलग पहचान

गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की पैदाइश साल 1944 में पंजाब के गुरदासपुर ज़िले के कोठे गांव में हुई थी। बचपन से ही उन्हें पढ़ने और पढ़ाने का शौक़ था। वो टीचर बनना चाहती थी, लेकिन ज़िंदगी ने उनके लिए एक अलग रास्ता चुना। उनके पति ने गायकी के लिए उनका हौसला बढ़ाया, जिसके बाद उन्होंने संगीत को अपना पेशा बना लिया। साल 1968 में उन्होंने अपने संगीत करियर की शुरुआत की।

Source: Gurmeet Bawa/FB

धीरे-धीरे उनकी आवाज़ लोगों के दिलों तक पहुंचने लगी। उनकी गायकी का सबसे ख़ास अंदाज़ उनकी लंबी हेक था। पंजाबी लोक संगीत में हेक लगाने का मतलब है आवाज़ को एक लंबी तान में खींचना। गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) इस हुनर में इतनी माहिर थी कि उनकी आवाज़ करीब 45 सेकंड तक लगातार गूंजती रहती थी।

साल 1987 में जॉर्जिया की राजधानी त्बिलिसी में हुए एक इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल में उन्होंने 45 सेकंड लंबी हेक लगाकर अपनी इस ख़ास कला का प्रदर्शन किया। इस महोत्सव में 18 देशों के कलाकारों ने हिस्सा लिया था। अपनी इस काबिलियत के दम पर गुरमीत बावा ने पंजाबी लोक संगीत को इंटरनेशनल मंच पर भी पहचान दिलाई।

‘जुगनी’ ने दिलों में बनाई जगह

गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की गायकी का ज़िक्र हो और ‘जुगनी’ की बात न हो, ऐसा मुमकिन नहीं। पंजाबी लोक संगीत में इस गीत की अपनी एक अलग जगह है। अलम लोहार के बाद ‘जुगनी’ को अपनी आवाज़ देने वाली मशहूर गायिकाओं में गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) भी शामिल थी। उनकी आवाज़ में इस गीत ने लोगों के बीच ख़ास पहचान बनाई।

उनके मशहूर गीतों में ‘कहारों डोली ना चायो, के मेरा बाबुल आया नी’, ‘हरिए नी रस भरिए खजुरे’ और ‘लिआदे चंबा, लावां घर दे कोल’ शामिल हैं। इन गीतों में पंजाब के गांवों की ज़िंदगी, रिश्तों की मिठास और पुरानी रस्मों की झलक मिलती है। उन्होंने पंजाब की शादियों में गाए जाने वाले ‘घोड़ियां’ गीतों को भी अपनी आवाज़ दी। ये गीत शादी-ब्याह की ख़ुशियों और रस्मों से जुड़े होते हैं। इसके अलावा उन्होंने मिर्ज़ा-साहिबा की मशहूर प्रेम कहानी पर लोकगीत ‘मिर्ज़ा’ भी गाया।

Source: Gurmeet Bawa/FB

दूरदर्शन पर गाने वाली पहली पंजाबी महिला गायिका

गुरमीत बावा की कामयाबी का एक अहम पड़ाव दूरदर्शन से भी जुड़ा है। उन्हें दूरदर्शन पर गाने वाली पहली पंजाबी महिला गायिका के तौर पर जाना जाता है। उनकी गायकी की एक और ख़ास बात थी पारंपरिक पंजाबी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल। वो अल्गोज़ा, चिमटा, ढोलकी और तुम्बी की धुनों के साथ गाया करती थी। इन वाद्य यंत्रों की आवाज़ उनके गीतों में पंजाब की मिट्टी से जुड़ा एक ख़ास रंग भर देती थी।

अल्गोज़ा पंजाब और आसपास के इलाकों में इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक वाद्य यंत्र है। जिसमें लकड़ी की दो छोटी बांसुरियों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, चिमटा पंजाबी लोक संगीत का एक मशहूर वाद्य यंत्र है। उनके कई कार्यक्रमों में ‘चाचा चिमटे वाला’ नाम से मशहूर संगीतकार भी साथ रहते थे, जो चिमटा बजाते थे।

गांव-गांव जाकर पुराने लोकगीत सहेजे

गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) सिर्फ़ लोकगीत गाने तक महदूद नहीं थी। उन्हें इस बात का भी एहसास था कि पुराने गीतों में एक पूरे समाज की यादें और उसकी तहज़ीब बसी होती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वो पंजाब के गांवों में घर-घर जाकर पुराने लोकगीत इकट्ठा किया करती थी, ताकि इस अनमोल विरासत को सहेजकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके।

उनकी गायकी का सफ़र पंजाब तक ही महदूद नहीं रहा। उन्होंने भारत की नुमाइंदगी करते हुए तत्कालीन सोवियत संघ, जापान, लीबिया, सीरिया, मलेशिया, फ्रांस, थाईलैंड और पाकिस्तान में हुए संगीत फेस्टिवल में हिस्सा लिया। साल 1988 में एक जापानी कंपनी ने उनकी आवाज़ में पंजाबी लोकगीत रिकॉर्ड करके एक एल्बम भी जारी किया। इससे उनकी गायकी को देश से बाहर भी पहचान मिली।

Source: Imtiyazali/IG

‘पटाखा गुड्डी’ की शूटिंग से जुड़ा दिलचस्प क़िस्सा

गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की आवाज़ का असर आने वाले दौर के संगीत पर भी दिखाई दिया। फ़िल्म ‘हाईवे’ का मशहूर गाना ‘पटाखा गुड्डी’ अपनी एनर्जी और सूफ़ियाना अंदाज़ के लिए जाना जाता है। लेकिन इस गाने की शूटिंग से जुड़ा एक दिलचस्प क़िस्सा गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) के गीत ‘जुगनी’ से जुड़ा है। फ़िल्म के निर्देशक इम्तियाज़ अली ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने ‘पटाखा गुड्डी’ की शूटिंग के दौरान गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) का पंजाबी लोकगीत ‘जुगनी’ चलाया था। शूटिंग के वक़्त रिकॉर्डर पर उनका गाना बजाया गया और उसी के हिसाब से सीन फ़िल्माया गया।

बाद में संगीतकार ए. आर. रहमान ने फ़िल्म के माहौल और सीन को समझते हुए ‘पटाखा गुड्डी’ का आख़िरी वर्ज़न तैयार किया। इस गाने को ज्योति नूरां और सुल्ताना नूरां यानी नूरां सिस्टर्स ने गाया था। ये क़िस्सा बताता है कि गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की आवाज़ का असर किस तरह लोक संगीत से आगे बढ़कर फ़िल्मी दुनिया तक पहुंचा। उनकी गायकी ने पुराने लोकगीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में भी अहम किरदार निभाया।

सम्मानों से नवाज़ी गईं गुरमीत बावा

पंजाबी लोक संगीत में उनके योगदान के लिए गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) को कई सम्मान मिले। साल 1991 में पंजाब सरकार ने उन्हें स्टेट अवॉर्ड से नवाज़ा। इसके अलावा उन्हें पंजाब नाटक अकादमी का संगीत पुरस्कार, साल 2002 में मध्य प्रदेश सरकार का राष्ट्रीय देवी अहिल्या पुरस्कार और साल 2008 में पंजाबी भाषा विभाग का शिरोमणि गायिका पुरस्कार मिला। उन्हें संगीत नाटक अकादमी की ओर से भी सम्मानित किया गया था।

साल 2022 में उन्हें मरणोपरांत पद्म भूषण से नवाज़ा गया। ये देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। उनकी बेटी ग्लोरी बावा ने उनकी ओर से ये सम्मान हासिल किया। ये सम्मान गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) के संगीत और पंजाबी लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने में उनके योगदान की पहचान बना।

Source: Gurmeet Bawa/FB

आवाज़ जो हमेशा गूंजती रहेगी

साल 2021 में 77 साल की उम्र में गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) का इंतकाल हो गया। उनके जाने से पंजाबी लोक संगीत की दुनिया ने एक ऐसी आवाज़ खो दी, जिसकी मिसाल देना आसान नहीं है। लेकिन कुछ आवाज़ें वक़्त के साथ ख़ामोश नहीं होती। वो अपने गीतों, यादों और लोगों के दिलों में ज़िंदा रहती हैं। गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की 45 सेकंड लंबी हेक, उनकी ‘जुगनी’ और पंजाब की मिट्टी से जुड़े उनके लोकगीत हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे।

उन्होंने अपनी गायकी से साबित किया कि लोक संगीत सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि किसी समाज की यादों, तहज़ीब और पहचान को सहेजने का ज़रिया भी है। गुरमीत बावा (Gurmeet Bawa) की आवाज़ में बसता पंजाब आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी मिट्टी, अपनी भाषा और अपनी विरासत से जोड़ता रहेगा।

ये भी पढ़ें: कचौड़ी गली के बाद कितनी बदली Utpal Udit की ज़िंदगी? बिहार से Coke Studio Bharat तक का सफ़र 

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