उर्दू शायरी में शायर अपने अल्फ़ाज़ के ज़रिए इंसान के दिल की उन बातों को सामने लाते हैं, जिन्हें हम अक्सर ख़ुद से भी छिपाते हैं। इरफ़ान सिद्दीक़ी ऐसे ही शायर थे। उनकी शायरी में इश्क़ है, तन्हाई है, बेबसी है और इंसानी फ़ितरत की ऐसी तस्वीर भी
मैं झपटने के लिए ढूंढ रहा हूं मौक़ा
और वो शोख़ समझता है कि शरमाता हूं
इस शेर में शायर ने बड़े दिलचस्प अंदाज़ में इंसान के इरादों और उसके दिखावे के बीच के फ़र्क़ को बयान किया है। कई बार हम अपने दिल में कुछ और सोचते हैं, लेकिन सामने वाले को हमारी ख़ामोशी और झिझक का मतलब कुछ और ही नज़र आता है। इरफ़ान सिद्दीक़ी इस शेर के ज़रिए इंसानी फ़ितरत की उसी विडंबना को सामने लाते हैं। उनकी शायरी की ख़ासियत यही है कि वह रिश्तों की पेचीदगियों को बिना किसी बनावट के बयान करते हैं।
उनके यहां मोहब्बत सिर्फ़ ख़ुशी और ख़ूबसूरत ख़्वाबों का नाम नहीं है। इसमें दर्द है, बेचैनी है और अपने जज़्बात के सामने बेबस हो जाने का एहसास भी है।
अदबी सफ़र और ज़िंदगी
इरफ़ान सिद्दीक़ी की पैदाइश 8 जनवरी 1939 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुयी थी। उन्होंने बदायूं और बरेली में तालीम हासिल की और समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। साल 1962 में उनका चयन सेंट्रल इन्फ़ॉर्मेशन सर्विस में हुआ। उन्होंने प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) में काम किया और 1997 में डिप्टी प्रिंसिपल इन्फ़ॉर्मेशन ऑफ़िसर के पद से रिटायर हुए। 1964 में उनका निकाह सैयदा हबीब से हुआ।
उनका पहला शायरी संग्रह ‘कैनवस’ 1978 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘शब-दर्मियां’, ‘सात समावात’, ‘इश्क़-नामा’ और ‘हवा-ए-दश्त-ए-मारिया’ जैसे संग्रह सामने आए। उनके कलाम के संग्रह ‘दरिया’ और ‘शहर-ए-मलाल’ भी प्रकाशित हुए। शायरी के अलावा उन्होंने तर्जुमे और अदबी लेखन के मैदान में भी काम किया। कालिदास के नाटकों का उर्दू अनुवाद और ‘रोटी की ख़ातिर’ जैसी किताबें उनके इस अदबी सफ़र का हिस्सा हैं।
उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी और ग़ालिब इंस्टीट्यूट, दिल्ली की ओर से सम्मान भी मिला। 15 अप्रैल 2004 को लखनऊ में उनका इंतिक़ाल हो गया।
इरफ़ान सिद्दीक़ी की शायरी आज भी इसलिए दिल को छूती है, क्योंकि उसमें इंसान की कमज़ोरियों को छिपाने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश है। उनके अशआर हमें बताते हैं कि मोहब्बत हो या ज़िंदगी, हर एहसास का अपना एक रंग और हर दर्द की अपनी एक दास्तान होती है। यही वजह है कि उनका कलाम पढ़ते हुए कई बार लगता है, जैसे शायर हमारे ही दिल की बात अपने अल्फ़ाज़ में बयान कर रहा हो।
देखते हैं तो लहू जैसे रगें तोड़ता है
हम तो मर जाएंगे सीने से लगा कर उसको
इन मिसरों में मोहब्बत की शिद्दत महसूस की जा सकती है। किसी को पाने की ख़्वाहिश और उसे अपने क़रीब लाने की तड़प किस तरह इंसान को बेचैन कर देती है, शायर ने उसे बेहद असरदार अंदाज़ में पेश किया है।
होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है
रंज कम सहता है एलान बहुत करता है
यहां इरफ़ान सिद्दीक़ी इंसान के उस मिज़ाज पर चोट करते हैं, जिसमें बातें बड़ी-बड़ी होती हैं, लेकिन उन्हें निभाने का हौसला कम होता है। कई बार हम अपनी समझदारी का ख़ूब दावा करते हैं, मगर दिल के मामलों में वही समझदारी पीछे छूट जाती है।
उनकी शायरी में ख़्वाब देखने और ज़िंदगी को नए नज़रिए से समझने की भी एक ख़ास जगह है।
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
यह शेर बताता है कि ख़्वाब देखने के लिए सिर्फ़ सोना ज़रूरी नहीं है। ज़िंदगी को समझने, कुछ नया सोचने और अपने भीतर उम्मीद जगाने के लिए जागती आंखें भी काफ़ी हैं।
इरफ़ान सिद्दीक़ी की शायरी में दर्द भी है और उस दर्द को सहने का सलीक़ा भी।
तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
आज़ादी के साथ ज़िम्मेदारी और ज़िंदगी की हक़ीक़त का एहसास भी शामिल है। इंसान चाहे जितना आज़ाद होना चाहे, उसकी ज़िंदगी कुछ रिश्तों, ज़िम्मेदारियों और अपनी दुनिया से जुड़ी रहती है।
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