जिस खेल का नाम तक उन्होंने कभी नहीं सुना था, आज उसी खेल में वो भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। Salman Khan (सलमान ख़ान) की कहानी सिर्फ़ एक खिलाड़ी बनने की कहानी नहीं, बल्कि ज़िंदगी के बदलते रास्तों की कहानी है। उत्तर प्रदेश के अमेठी से निकले Salman (सलमान) ने परिवार की ज़िम्मेदारियां संभालने के लिए Uber Cab चलाई। फिर इंडियन आर्मी में भर्ती हुए और यहीं उनकी ज़िंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी। उनकी लंबी कद-काठी देखकर कोचिस ने उन्हें Rowing के लिए चुना। शुरुआत में Salman (सलमान) ने इस खेल को अपनाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें Rowing के बारे में कुछ पता ही नहीं था।
लेकिन जिस खेल से वो अनजान थे, उसी में उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पहचान बना ली। नेशनल गेम्स से लेकर इंटरेशनल लेवल तक का सफ़र तय करने के बाद, Asian Games 2026 में उन्होंने सतनाम सिंह के साथ Men’s Double Sculls में ब्रोंज मेडल जीता।

Uber से आर्मी तक कैसे पहुंचे सलमान ?
Salman Khan (सलमान ख़ान) उत्तर प्रदेश के अमेठी से हैं। उनके पिता ट्रक बॉडी का काम करते थे। परिवार मेवात, हरियाणा में रहता था और वहीं उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। साल 2016 में डेंगू की वजह से उनके पिता का इंतकाल हो गया। परिवार में चार भाई और दो बहनें थी। ऐसे में घर की ज़िम्मेदारियां भी Salman (सलमान) के सामने थी। पिता के इंतकाल के बाद Salman Khan (सलमान ख़ान) ने Uber पर अपनी प्रोफ़ाइल बनाई और करीब डेढ़ साल तक Uber Cab चलाई।
इसी दौरान उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें इंडियन आर्मी में जाने की सलाह दी। और इसके बाद उन्होंने आर्मी की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने किसी बड़ी कोचिंग का सहारा नहीं लिया। उन्होंने मेहनत की, रनिंग और एग्ज़ाम की तैयारी की और आख़िरकार 2018 में उनका आर्मी में सिलेक्शन हो गया।
आर्मी में आए तो पहली बार रोइंग का नाम सुना
आर्मी में भर्ती होने के बाद Salman (सलमान) का ट्रेनिंग सेंटर बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप, खड़की, पुणे था। वहां कई तरह के स्पोर्ट्स होते थे। Salman (सलमान)की लंबी हाइट देखकर कोचिस को लगा कि वो रोइंग के लिए अच्छे खिलाड़ी बन सकते हैं। लेकिन Salman Khan (सलमान ख़ान) ने शुरुआत में रोइंग करने से साफ़ मना कर दिया। उन्हें इस खेल के बारे में कुछ पता नहीं था।

Salman (सलमान) के कई बार मना करने के बावजूद उनके कोचिस ने उन्हें समझाया कि रोइंग में उनका अच्छा फ्यूचर हो सकता है। कई कोशिशों के बाद Salman (सलमान) ने ट्रेनिंग शुरू कर दी। साल 2019 में उन्होंने पहली बार एक कॉम्पीटिशन में हिस्सा लिया और सिल्वर मेडल जीता। लेकिन कोरोना माहमारी की वजह से ट्रेनिग रूक गई।
कई बार लगा कि रोइंग छोड़ देनी चाहिए
Salman (सलमान) का सफ़र आसान नहीं था। कई बार उन्होंने रोइंग छोड़ने का मन बनाया। इसकी एक बड़ी वजह घर की ज़िम्मेदारियां थी। उनके चार भाई और दो बहनें थी और परिवार के लिए भी उन्हें कुछ करना था। Salman Khan (सलमान ख़ान) को लगता था कि स्पोर्ट में वक़्त देने से बेहतर है कि वो अपनी नौकरी और परिवार पर ध्यान दें। लेकिन उनके कोचिस ने उन्हें हौसला दिया। आख़िरकार Salman (सलमान)ने एक बार फिर रोइंग को मौका दिया।
2022 में उत्तराखंड में हुए National Games, Salman के लिए बड़ा मोड़ साबित हुए। उन्होंने पहली बार National Games में हिस्सा लिया और गोल्ड मेडल जीता। फिर 2023 में सीनियर नेशनल में भी गोल्ड अपने नाम किया। फिर 2024 में साउथ कोरिया में इंटरनेशनल गोल्ड और 2025 में दो सिल्वल मेडल के जीते।

सतनाम सिंह के साथ बनी ख़ास जोड़ी
Asian Games 2026 में Salman ने सतनाम सिंह के साथ Men’s Double Sculls में हिस्सा लिया। Salman बताते हैं कि शुरुआत में वो एक अलग बोट में थे, लेकिन बाद में क्रू में बदलाव हुआ और उन्हें सतनाम सिंह के साथ Double Sculls में रखा गया। दोनों का मक़सद साफ़ था—देश के लिए मेडल जीतना। रेस से पहले उन्हें भरोसा था कि अगर दोनों अपनी पूरी ताकत लगाएंगे तो गोल्ड के लिए भी लड़ सकते हैं। फाइनल रेस में दोनों ने पूरी जान लगा दी और भारत के लिए ब्रोंज मेडल जीता। लेकिन सलमान का ख़्वाब था कि वो गोल्ड मेडल जीते और इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर भारत का तिरंगा लहराया जाए और राष्ट्रगान बजे।
अब सपना ओलंपिक का
Salman Khan (सलमान ख़ान) अपनी कामयाबी का क्रेडिट अपने परिवार, इंडियन आर्मी, स्पोर्ट्स अथॉरिटी और अपने सपोर्ट स्टाफ का शुक्रिया अदा करते हैं। उनके मुताबिक, खिलाड़ी की कामयाबी के पीछे बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनका नाम शायद कभी सामने नहीं आता। Asian Games में मेडल जीतने के बाद Salman की नज़र अब विश्व चैंपियनशिप पर है। Salman का सपना अब Los Angeles Olympics तक पहुंचना है।

जिस शख़्स ने कभी परिवार की ज़िम्मेदारियों के लिए Uber Cab चलाई, फिर आर्मी में भर्ती हुआ और जिसे रोइंग के बारे में कुछ पता तक नहीं था, आज वही खिलाड़ी देश के लिए ओलंपिक का सपना देख रहा है। उनकी कहानी बताती है कि रास्ता चाहे कितना भी मुश्किल हो, अगर जज़्बा बना रहे और सही लोगों का साथ मिले, तो ज़िंदगी की राह कभी भी बदल सकती है।
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