तुंगभद्रा नदी जब कर्नाटक की धरती से गुज़रती है, तो अपने साथ अनगिनत कहानियां बहा लाती है। इसी नदी के पश्चिमी तट पर, कोप्पल ज़िले में बसा है एक छोटा-सा गांव- किन्हाल। दूर से देखो तो ये कोई आम सा पोस्टकार्ड विलेज लगता है, हरे-भरे खेत, झूलते ताड़ के पत्ते और धूप में नहाया सन्नाटा। लेकिन इस शांत चेहरे के पीछे एक अलग ही तराना गूंजता है छेनी की खरखराहट और हथौड़े की थाप का संगीत। यही वो आवाज़ें हैं जो किन्हाल के खिलौनों (Kinhal toys) को ज़िंदगी बख़्शती हैं।

तारीख़ के आईने में किन्हाल
किन्हाल की हुनरमंदी कोई नई पौध नहीं है। इसकी जड़ें कन्नड़ मिट्टी में गहरी धंसी हैं, जो सीधे विजयनगर साम्राज्य से जुड़ी हैं। वो दौर जो 14वीं से 17वीं सदी तक फलता-फूलता रहा। यानी किन्हाल के खिलौने कम से कम 500 साल पुराने हैं। विजयनगर के राजाओं के ज़माने में इन्हें शाही सरपरस्ती हासिल थी। हम्पी के पंपापथेश्वर मंदिर और आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी मंदिर की भव्य भित्तिचित्रों से प्रेरणा लेकर कारीगरों ने लकड़ी में देवताओं और पुराणों की कहानियां उकेरीं। इनकी बनाई नक़्क़ाशीदार खिलौनों, रंग-बिरंगी मूर्तियों और महलों-रथों के टुकड़ों ने उन्हें बेहिसाब इज़्ज़त दिलाई। राजाओं ने ख़ुश होकर किन्हाल गांव को इनाम के तौर पर कारीगरों को बख़्श दिया यानी जागीर।
1665 में विजयनगर के ज़वाल के बाद भी यह फ़न मरा नहीं। कोप्पल के नवाब, किन्हाल के देसाई और हैदराबाद के नवाब सलार जंग जैसे सरपरस्तों ने इसे संभाला। उनकी मदद से चित्रगारों का ये हुनर ज़िंदा रहा और रिवायत की लौ बुझने नहीं दी।

चित्रगार समुदाय के हुनर की बारीकियां
किन्हाल के खिलौने बेल्लारी और कोप्पल के चित्रगार समुदाय की दिमाग़ी विरासत हैं। ये लोग वैष्णव और शैव परंपरा के देवी-देवताओं की हाथ से रंगी लकड़ी की चीज़ें बनाते हैं। नरम लकड़ियों सफ़ेद कैटामरन, आइवरी वुड और सहजन के साथ-साथ नीम, आम और इमली जैसी सख़्त लकड़ियां भी इस्तेमाल होती हैं।

इनके जोड़ने के लिए ख़ास पेस्ट बनाए जाते हैं, वो भी माहौल के लिहाज़ से सेफ़। सारी- इमली के बीज पीसकर बनाया गया गोंद। किट्टा- सारी, लकड़ी का बुरादा और जूट के टुकड़ों से बनता है, जो खामियां दुरुस्त करता है। गचु-पिसे पत्थर, तरल गोंद और सरेस से तैयार होता है, जिससे ज़ेवरात उभारे जाते हैं। फिर चटक रंगों की बहार, और आख़िर में वार्निश की परत, जो रंगों को बचाए रखती है और चमक भी देती है।

हर घर के लिए एक किन्हाल
किन्हाल के खिलौने सैलानियों और कलेक्टरों की पुरानी दिलकशी रहे हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां, पालकियां, जानवर, फल-सब्ज़ियों के मॉडल, स्टूल, मुखौटे, पालने और बुत। ये सब इस फ़ेहरिस्त का हिस्सा हैं। 2012 में इन्हें GI टैग मिला, जिसने चित्रगारों की इस अमानत को क़ानूनी हिफ़ाज़त दी। एक किन्हाल अपने घर ले जाना यानी उम्र भर की निशानी इस मोहब्बत भरी धरती की एक शानदार याद।
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