5 अगस्त का दिन अलग-अलग तरह की यादों और दावों का दिन है। भारत में, ये दिन आर्टिकल 370 (Article 370) को हटाने की सालगिरह के तौर पर मनाया जाता है। नई दिल्ली इसे जम्मू-कश्मीर के लिए एक नए दौर की शुरुआत मानती है-एक ऐसा दौर जो एकीकरण, निवेश और विकास (Integration, Investment, and Development) से जुड़ा है। वहीं, लाइन ऑफ़ कंट्रोल के दूसरी तरफ, पाकिस्तान इसी दिन को ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ या ‘शोषण का दिन’ कहता है और इस कदम को दमनकारी कार्रवाई बताता है। हालांकि, भारत के अधिकार वाले जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के अधिकार वाले कश्मीर (PoJK) के हालात की तुलना करने पर विरोधी नारों से कहीं ज़्यादा साफ़ तस्वीर सामने आती है।
जम्मू-कश्मीर में कामकाज के तरीके को देखें तो ज़मीनी स्तर पर लोगों की भागीदारी बढ़ी है। 2020 में ज़िला विकास परिषद (District Development Council) के चुनाव हुए और पंचायतें व शहरी निकाय ज़्यादा एक्टिव हुए हैं। केंद्र सरकार की योजनाएं अब सीधे गांवों तक पहुंच रही हैं। इसके उलट, PoJK संवैधानिक रूप से इस्लामाबाद के अधीन है और वहां राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखने के कारण लगातार विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। बिजली बिल और महंगाई को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों पर हुई सख़्त कार्रवाई ने वहां के प्रशासन और आर्थिक मुश्किलों को लेकर लोगों की गहरी निराशा को उजागर किया है।

बुनियादी ढांचे के विकास की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जम्मू-कश्मीर में बड़े बदलाव वाले इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (Infrastructure Projects) देखे गए हैं,जैसे चेनानी-नाशरी टनल, निर्माणाधीन ज़ोजिला टनल, चिनाब रेल ब्रिज और उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (जिसने घाटी को रेल नेटवर्क से जोड़ा है)। साथ ही श्रीनगर और जम्मू एयरपोर्ट पर रिकॉर्ड हवाई यातायात भी देखा गया है। स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ी हैं। एम्स जम्मू (अवंतीपोरा में एक और बन रहा है) और नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं, जिन्हें आयुष्मान भारत बीमा योजना का सहारा मिला है। वहीं, IIT जम्मू, IIM जम्मू और नए स्किल सेंटर्स ने शिक्षा तक पहुंच बढ़ाई है। PoJK में स्वास्थ्य सेवा, उच्च शिक्षा और उद्योग में निवेश सीमित रहा है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था संघीय मदद, विदेशों से आने वाले पैसे (रेमिटेंस) और सरकारी नौकरियों पर निर्भर है, और बेरोज़गारी के कारण युवा विदेश जाने को मजबूर हैं।
जम्मू-कश्मीर में बिजली परियोजनाओं और ग्रिड क्षमता (Power projects and grid capacity) का विस्तार हुआ है, जबकि PoJK में बिजली की लगातार कमी बनी हुई है। जहां जम्मू-कश्मीर में 5G नेटवर्क और कल्याणकारी भुगतान के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) शुरू हुए हैं, वहीं PoJK में अशांति के टाइम इंटरनेट और मीडिया पर पाबंदियां लगाई जाती रही हैं।
इन सब बातों का मतलब यह नहीं है कि जम्मू-कश्मीर के सामने अब कोई चुनौती नहीं बची है, प्रशासन और कामकाज के तरीकों पर ईमानदार बहस जारी रहनी चाहिए। लेकिन अगर हम राजनीतिक बयानों को ठोस नतीजों – जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याण, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और कनेक्टिविटी से अलग करके देखें, तो एक तरफ़ ऐसा इलाका दिखता है जो एकीकरण और निवेश को प्राथमिकता दे रहा है। दूसरी तरफ़ ऐसा इलाका जो सीमित ऑटोनॉमी और आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। इतिहास आयोजनों या सरकारी बयानों को याद नहीं रखेगा। वो सिर्फ़ यह देखेगा कि आम लोगों को बेहतर अवसर और जीवन की बेहतर क्वालिटी मिली या नहीं और इसी पैमाने पर दोनों कश्मीर के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है।
ये भी पढ़ें- Himalayan Diamond: 15 साल बाद खिलने वाला ‘केन्ज़ो फूल’, कुदरत का अज़ीब करिश्मा
ये भी पढ़ें- चिड़िया टापू: प्रकृति का वो हसीन ख्वाब जहां परिंदे बयां करते हैं यहां के राज़
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते है।



