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पुरनम इलाहाबादी: “भर दो झोली मेरी या मुहम्मद” के ख़ालिक़ और मोहब्बत के शायर

उर्दू अदब और सूफ़ियाना शायरी की दुनिया में पुरनम इलाहाबादी का नाम बड़ी मोहब्बत और एहतराम से लिया जाता है। उनकी शायरी में इश्क़ की नर्मी, रूहानियत की ख़ुशबू और इंसानी जज़्बात की गहराई साफ़ महसूस होती है। वे सिर्फ़ एक बेहतरीन शायर ही नहीं, बल्कि एक माहिर मूसीक़ार भी थे। उन्होंने अपनी शायरी और धुनों के ज़रिए ऐसी यादगार रचनाएं दीं जो आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।

पुरनम इलाहाबादी का अस्ल नाम मुहम्मद मूसा था। उनके वालिद का नाम हाजी मुहम्मद इस्हाक़ था। उनकी पैदाइश 1940 में इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुयी। बचपन से ही उन्हें शायरी और अदब का शौक़ था। उन्होंने मशहूर उर्दू शायर क़मर जलालवी की शागिर्दी इख़्तियार की और उन्हीं से शायरी की बारीकियां सीखीं। यही तालीम आगे चलकर उनकी पहचान बनी। 

सन 1947 में बंटवारे के बाद उनका ख़ानदान पाकिस्तान चला गया। शुरू में उन्होंने कराची में अपने अहल-ओ-अयाल के साथ क़याम किया। बाद में वे लाहौर आ गए, जहां सूफ़ी रिवायत और अदबी माहौल ने उनकी फ़िक्र को और निखारा। लाहौर के मशहूर अनारकली बाज़ार में एक सादा से कमरे में रहते हुए उन्होंने अपनी ज़िंदगी अदब, शायरी और मूसीक़ी के नाम कर दी।

पुरनम इलाहाबादी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे शायर होने के साथ-साथ बेहतरीन मूसीक़ार भी थे। वे अपने और दूसरे शायरों के कलाम को ख़ुद धुनों में ढालते थे। उनकी लिखी हुई नातें, मनक़बतें, ग़ज़लें और नग़मे आज भी बड़े शौक़ से सुने जाते हैं। उनकी एक किताब भी शाया हो चुकी है, जिसमें उनकी चुनिंदा रचनाएं भी शामिल हैं।

अगर उनकी पहचान की बात की जाए, तो उनका सबसे मशहूर कलाम “भर दो झोली मेरी या मुहम्मद, लौट कर मैं न जाऊंगा ख़ाली” है। इस कलाम को साबरी ब्रदर्स ने अपनी पुरअसर आवाज़ में पेश किया, जिसके बाद यह दुनिया भर में मक़बूल हो गया। आज भी यह नात महफ़िल-ए-मिलाद, सूफ़ियाना महफ़िलों और दरगाहों में पूरे अकीदत के साथ पढ़ी और सुनी जाती है। इस कलाम ने पुरनमइलाहाबादी को हमेशा के लिए अमर बना दिया।

पुरनमइलाहाबादी की ग़ज़लों में मोहब्बत, जुदाई, उम्मीद और इंसानी एहसासात का बेहद ख़ूबसूरत रंग मिलता है। उनके अशआर दिल को छू लेने वाले होते हैं। 

“मिलने की है ख़ुशी तो बिछड़ने का है मलाल,
दिल मुतमइन भी आप से है बे-क़रार भी।”

इसी तरह उनका यह शेर मोहब्बत की सादगी और वफ़ा का बेहतरीन इज़हार करता है।

“आरज़ू, हसरत, तमन्ना, मुद्दआ कोई नहीं,
जब से तुम हो मेरे दिल में दूसरा कोई नहीं।”

उनकी शायरी में इश्क़ के साथ-साथ दर्द, सब्र और ज़िंदगी के तजुर्बे भी नज़र आते हैं। वे अल्फ़ाज़ को इस तरह पिरोते थे कि हर शेर सीधे दिल में उतर जाता था।

“तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी,
मोहब्बत की राहों में आकर तो देखो।”

आज भी ग़ज़ल और क़व्वाली के चाहने वालों की ज़ुबान पर रहता है। उनके कई अशआर अलग-अलग गायक अपनी आवाज़ में पेश कर चुके हैं और नई नस्ल भी उन्हें उतने ही शौक़ से सुनती है।

29 जून 2009 को लाहौर में पुरनम इलाहाबादी का इंतिक़ाल हो गया। लेकिन उनकी शायरी, नातें और सूफ़ियाना कलाम आज भी उनके नाम को ज़िंदा रखे हुए हैं। उनकी रचनाएं सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का मजमूआ नहीं, बल्कि मोहब्बत, रूहानियत और इंसानियत का पैग़ाम हैं।

पुरनम इलाहाबादी ने अपनी शायरी से यह साबित किया कि सच्चे जज़्बात कभी पुराने नहीं होते। उनकी ग़ज़लों में इश्क़ की मिठास है, नातों में अकीदत की रौशनी है और सूफ़ियाना कलाम में रूह की तसल्ली। यही वजह है कि आज भी उनका नाम उर्दू अदब और क़व्वाली की दुनिया में बड़े एहतराम के साथ लिया जाता है। उनकी आवाज़ भले ही ख़ामोश हो गई हो, लेकिन उनके अल्फ़ाज़ हमेशा लोगों के दिलों में गूंजते रहेंगे।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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